(पूर्व प्रकाशित कहानी का संशोधित रूप) यह पुस्तक राज्य संदभ केंद्र दिल्‍ली, यूनिसेफ एवं नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया के संयुक्‍त तत्वावधान में आयोजित कार्यशिविर में तैयार की गयी थी।

]5छाप 8]-237-0939-0 पहला संस्करण : ]990 आठवीं आवृत्ति : 200] (शक 923)

(5 नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, 990

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रू. 7.00

निदेशक, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, ए-5 ग्रीन पार्क नयी दिल्‍ली-।0 046 द्वारा प्रकाशित

नवस्ताक्षर साहित्यमाला

पिंजरा

द्रोगजीर कोहली चित्रकार

चित्रक

| एक लूले सकलम |

नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया

] एक बार मैंने एक तोता पाला था। मगर एक दिन जाने केसे, पिंजरे का दरवाज़ा खुला रह गया। एक काली बिल्ली आई ओर तोते को मुंह में लेकर भाग गई। मैं तो बेबस-सा खड़ा देखता रह गया था। इस घटना से में बड़ा दुखी हुआ। अफसोस इस बात का था कि हम लोगों की चूक से ही तोते की जान॑ गईं थी। अभी कुछ ही दिन तो हुए थे, यह तोता हमने पाला था। देखते ही देखते वह सबसे हिल-मिल गया था। बड़ी मीठी-मीठी बातें करता था। मेरे छोटे भाई गोपी ने तो उसे कई दोहे याद करवा दिए थे। फिर यह दोहा तो वह बड़े मज़े से बोलता था.

चटपट पेंची, चतुर सुजान। सबके दाता श्री भगवान॥ तोता जब यह दोहा बोलता तो मेरा छोटा भाई गोपी लोट-पोट हो जाता। तोते के चले जाने से सारा घर ही उदास हो गया था। उस दिन मैंने, और ही गोपी ने खाना खाया।

सूने पिंजरे को देखकर मेरा मन रो उठता था। आखिर, ॥॥7

मुझसे यह सब देखा नहीं गया। मैंने पिंजरे को बेरी की

॥॥

[| 7

हा शाप |॥।

डाल से उतारा ओर एक कोने में डाल दिया। फिर वहीं।जहँ कि

हम खड़े-खड़े मैंने यह तय किया: तोता तो क्या, अब कभी डा कोई जीव-जंतु भी नहीं पालूंगा।... | हमारे घर के आंगन के ऊपर से ही रोज़ तोते उड़ कर जाते थे। सांझ होते ही तोतों के झुंड आते और बोलते हुए निकल जाते। शाम होते ही मैं आंगन में खाट डाल कर लेट जाता ओर तोतों को उड़कर जाते हुए देखता रहता। पहले दूर से उनकी घीमी, मीठी आवाज़ सुनाई पड़ती। फिर ढेर सारे तोते उड़ते हुए आते ओर निकल जाते। पलक झपकने की देर में आकाश खाली हो जाता। लेकिन थोड़ी ही देर बाद एक ओर झुंड उड़ता हुआ निकल जाता। इन्हें देख-देखकर मुझे तोते की याद सताती और मैं उदास हो जाता। असल में सांझ होते-होते तोतों की वापसी शुरू होती थी। झुटपुटा होने से पहले वे अपने-अपने घोसलों में लोट जाते थे। गांव के बाहर एक नदी थी। उसके किनारे बड़े-बड़े बट, पीपल और सेमल के पेड़ 5... थ। उन्हीं पर तोतों ने अपने घर बना रखे थे। वहीं पर ॥॥ ये रैन-बसेरा करते थे। मैंने एक खास बात देखी थी।

वह यह कि अंधेरा घिरने के बाद कोई तोता आकाश में दिखाई नहीं पड़ता था। यह देखकर में हमेशा अचरज किया करता। तोते नियम से समय पर आते थे और समय पर.घरों को लोट जाते थे। ओर हम लोग हैं कि कोई काम समय पर नहीं करते।

2

अब एक दिन बड़ी अजीब बात हुई।

सांझ की बेला थी। में आंगन में खाट पर लेटा सुस्ता रहा था। अंधेरे की काली चादर धीर-धीर फेल रही थी। थोड़ी ही देर पहले तोतों के झुंड निकल कर जा चुके थे। हवा में छोटे-छोट चमगादड पंख फड़फड़ा कर उड़ते दिखाई पड़ते थे। आंगन में एक तरफ भैंस और गाय बेठी जुगाली कर रही थीं। बीच-बीच में उनकी गलघंटियों की हलकी आवाज सुनाई पड़ जाती। या फिर कोई चील, कोवा या कबूतर...“ 2+ किडिल) . काली छाया की तरह चुपचाप आकाश में तेरता हुआ 7 कई: निकल जाता। कप |

में लेट-लेटा यह सब टेख ही रहा था कि अचानक एक तोते की आवाज़ सुनाई पड़ी। में चॉका ओर उठ कर बैठ गया। मुझे लगा कि आसपास ही कहीं कोई रा बोला है। पहले तो में समझा कि यह मेरा भरम

|

मुझे तोतों को देखते हुए इतने दिन हो गए थे। मगर अंधेरा घिरने के बाद मैंने आकाश में तोतों की आवाज़ कभी नहीं सुनी थी। मैं चकित-सा बैठा देख ही रहा था कि एक बार फिर तोते की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।

मैं चौकन्ना होकर देखने लगा। तभी क्या देखता हूं कि एक तोता ऊपर से निकलकर जा रहा है। मगर आगे जाकर वह जल्दी ही लौट आया। थोड़ी देर आंगन पर मंडराया और फिर बेरी पर जाकर बैठ गया। बैठते ही वह दो-तीन बार बोला। एक बार उसने पंख भी फड़फड़ाए। फिर एकदम सन्नाटा छा गया | हवा जैसे एकदम थम गई थी। पत्ता तक नहीं हिल रहा था।

में आंखें फाड़े बेरी की तरफ देख रहा था। फिर अचानक यह बात मेरे मन में आईं। हो-न-हो, कोई तोता अपने झुंड से बिछुड़ कर भटक गया है या थक कर हमारी बेरी पर बेठा है।

तब तक घना अंधेरा घिर आया था। अब तोते की भी आवाज़ सुनाई नहीं पड़ रही थी। इसलिए मैं चुपचाप उठा और भीतर गया। पता नहीं क्यों, मुझे भरोसा था कि बेरी पर बैठा तोता रात यहीं बिताएगा। इसलिए में उसके खाने के लिए थोड़ी-सी रोटी ले आया। ऊपर बेरी की तरफ देखते हुए मैंने रोटी के टुकड़े पेड़ के तने के साथ बिखेर दिए। एक कसोरा पानी का भर कर भी साथ रख दिया।

यह सब करके में भीतर गया ओर अपने बिस्तर पर लेट गया।

लेकिन मेरी आंखों में नींद नहीं थी। रह-रह कर एक सुंदर तोते की छवि मेरी आंखों के आगे नाच उठती। इसके साथ ही मुझे अपने उस तोते की भी याद हो आई जिसे काली बिल्ली उठा कर ले गई थी। इस घटना को इतने बरस बीत चुके थे। मगर उस वक्त भी मैं अपने तोते को बिल्ली के जबड़े में फंसा देख रहा था। इसी सोच-विचार में पता नहीं कब मेरी आंख लग गई।

6

सुबह हुई, तो में सबसे पहले आंगन में गया। यह देखकर मैं चकित और खुश भी हुआ कि तोता बेरी के नीचे बेठा था। मैं रात को जो रोटी वहां डाल गया था, उसे वह मज़े से खा रहा था। बीच-बीच में वह कसोरे में से पानी पी लेता। मैं जैसे मुग्ध-सा खड़ा तोते को देख रहा था। यह तोता कितना सुंदर है ! केसा चमकीला हरा रंग है! चोंच भी कैसी लाल-लाल है ! और इसकी कंठी तो देखो--गुलाबी भी हैं ओर लाल भी!

“हाय, इतना सुंदर तोता !'' एकाएक मेरे मुंह से यह बात निकली। फिर अपना प्रण भूल कर में ललचाई आंखों से तोते को देखने लगा। मैं सोच रहा

“क्यों इस तोते को पाल लूं।'

बस, यह बात मन में आते ही मेंने एक कपड़ा लिया ओर दबे पांव तोते की तरफ बढ़ा। तोता था कि चेन से बेठा रोटी कुतर रहा था। बिल्कुल नहीं जानता था कि उसके सिर पर केसी बिपदा खड़ी हैं। मगर ज्योंही में निकट गया कि वह चोंक कर मेरी तरफ देखने लगा। फिर टांय-टांय भी करने लगा। एक बार उसने उड़ने की भी कोशिश की। मगर धरती से चार-पांच हाथ ऊपर उठ कर वह नीचे बेठ गया। फिर चलते हए पेड़ के तने के साथ जा चिपका।

यह बात मेरी समझ में नहीं आई | लगता था जैसे तोता उड ही नहीं पा रहा था। यह तो बड़ी हैरानी की बात थी। रात को मैने इसे उड़ कर आते हुए देखा था। रात-रात में ही इसे क्‍या हो गया?

बस, मैंने चील की तरह झपट्टा मारा और तोते को पकड़ लिया। इस पर वह कपड़े के भीतर टांय-टांय करके चीखने लगा। मैंने हाथ डाल कर उसे पकड़ा, तो वह ओर ज़ोर से चीखा। उसकी आवाज़ ऐसी थी कि मेरा तो दिल ही दहल गया। एक बार तो मुझे लगा कि मेरा पहला पालतू तोता बिल्ली के चंगुल में छटपटा रहा है।

ग॥

फिर थोड़ी ही देर में वह शांत हो गया। मगर जब मैंने उसके पंखों को सहलाना चाहा, तो वह एकदम छटपटा उठा। तब मुझे पता चला कि उसके पंख पर चोट लगी थी।

अब सारी बात मेरी समझ में आई कि रात को वह लोट कर क्‍यों बेरी पर बैठा था। हो हो, किसी ने इस पर हमला किया होगा | या कोई ओर बात हुई होगी। नहीं तो इस तरह अंधेरे में यह अकेला उड़ता फिरता !

लेकिन यह सोच कर मुझे अच्छा लगा कि रात को मेंने तोते के लिए रोटी-पानी रख दिया था।

मगर तोता रह-रह कर मेरे हाथों में कांप उठता था। इस पर मेंने तोते को पुचकारते हुए कहा, “मियां मिट्ठू ! तू डर मत। मैं तुझे बड़े प्यार से रखूंगा।

मेरे पास बहुत बढ़िया पिंजरा है। रोज़ तुझे हरी-हरी मिर्च खिलाऊंगा। सुबह-शाम चने ओर रोटी खिलाऊंगा | हो सका, तो अनार भी खिलाऊंगा। तुझे अच्छी-अच्छी बातें सिखाऊंगा। और फिर एक-एक बिल्ली को खदेड़ कर गांव से बाहर कर दूंगा...

मगर इस तरह मैं तोते पर कोई दया नहीं कर रहा था। असल में में अपनी ही बात सोच रहा था। में एक बार फिर तोता पालना चाहता था-- हालांकि मैंने कभी ऐसा करने का प्रण किया था।

बस, मेंने वही किया जो मुझे करना चाहिए था। आंगन में रखे पिंजरे का रंग धूप, पानी ओर हवा से खराब हो गया था। उसे झाड़-पोंछ कर मेंने उसे बेरी की डाल से लटकाया ओर तोते को उसमें बंद कर दिया। पिंजरे में पड़ते ही तोते ने तो जेसे सारा घर सिर पर उठा लिया।

मगर में खुश था। थोड़ी देर में मेरा छोटा भाई गोपी आया, तो इतना सुंदर तोता देखकर खुश हो गया। उसे यह तोता भा गया था। इसलिए पिंजरे की तरफ टकटकी लगाकर देखते हुए बोलां, “भेया! इतना '* & सुंदर तोता कहां से लाए।'

मेंने उसे डपट दिया, “इस तरह आंख भर कर तोते को नहीं देखते। नज़र लग जाती है। चल, जाकर अपना काम देख।”

इस पर गोपी मेरी खिल्ली उड़ाते हुए बोला,

“भैया! इतने बड़े होकर भी वहम करते हो ।!''

तोता अब भी शोर मचा रहा था। शायद समझ गया था कि अब इस केद से छुटकारा नहीं मिलेगा। मगर वह जितना चिल्लाता, उतना ही में खुश होता पिंजरे की सलाखें पकड़ कर मैंने कहा, “मियां मिट॒ठू ! शोर मचाने का अब कोई फायदा नहीं तू खुश हो कि मैंने तुझे मरने से बचा लिया। अगर रात को कोई बिल्ली इधर जाती, तो मुझे जीवित छोड़ती अब चुपचाप बेठ। | तूने अच्छे काम किए थे कि तू हमारे आंगन में उतरा। नहीं तो जान से हाथ धो बेठता। अच्छा, तुम्हारे लिए हरी मिर्च लेकर आता हूं।''

घर से में एक-दो हरी मिर्चे ले आया। पिंजरे में मिर्च रख कर मेंने पानी वाली कटोरी में पानी भी भर दिया। मगर तोते ने आंख उठा कर भी इन चीजों की तरफ नहीं देखा | जेसे यह जतलाना चाहता हो कि केद में सोने की चीजें भी मिलें तो में उन्हें हाथ भी नहीं लगाऊंगा।

मैंने कहा, “मियां मिट॒ठटू, खाएगा नहीं तो जिएगा केसे ? मिर्च खा ओर बोल-राम-राम ! ''

लेकिन तोता जैसे बुत बन बेठा था। मैंने मान-मनुहार करते हुए कहा, “गंगाराम! मेरे साथ बोल---

“चटपट पेैंची, चतुर सुजान। सबके दाता श्री भगवान।॥।”

मगर तोता तो उस लड़की की तरह मन मारे बेठा था जो पहली बाए ससुराल आई हो। मेंने उसे बहुतेरा पुचकारा। दिलासा दिया। मगर ताते ने आंख उठा कर तो मेरी तरफ देखा, मिर्चों ओर पानी की तरफ। हां, बीच-बीच में वह आकाश की तरफ मुंह उठा कर बोलने ज़रूर लगता था। जैसे किसी की राह देख रहा हो। मानो कोई आएगा ओर उसे ले जाएगा।

उसकी यह हालत देख कर में थोड़ा उदास हो गया। मगर मेंने

सोचा अभी नया-नया ही तो आया है! जल्दी ही हिल-मिल जाएगा।

मगर दिन ढलने के साथ ही तोते की बेचेनी बढ़ने लगी। पिंजरे -की सलाखों को चोंच में भर कर उलझ रहा था। कभी ऊपर देख कर बोलने लगता कभी चोंच में सलाख पकड़ कर कलाबाज़ी खाता | कभी पंख फड़फड़ाता | यह सब देखकर मुझे तोते पर दया भी आती ओर खुशी भी होती।

4

देखते ही देखते सांझ घिर आईं। यह समय था तोतों के लोटने का। मैं डेवढ़ी में खड़ा देख रहा था। तभी तोतों का एक झुंड शोर मचाता हुआ आया ओर आंगन की बेरी पर उतर पड़ा। सारे आंगन में चिल्ल-पों मच गई। उन तोतों के साथ पिंजरे में केद तोता भी बोलने लगा। फिर वह सलाखों को चोंच में पकड़ कर जेसे जूझने लगा।.

यह देख कर मैंने कहा, 'सुग्गे राजा! ऐसा मत कर। इतना ज़ोर मत लगा। कहीं ऐसा हो कि तेरी चॉच चटक जाए। यह पिंजरा करीमा लुहार ने टोंक-पीट कर तैयार किया है। इतनी-सी तो जान हे तेरी! बेकार लोहे की सलाखों से उलझ रहा हे!”

फिर जाने मुझे क्या सूझी कि मैं हंसता-खिलखिलाता हुआ गया ओर पिंजरा उतार कर डेवढ़ी की तरफ बढ़ा। यह देखते ही सारे तोते मेरे सिर पर मंडराने ओर शोर मचाने लगे।

मुझे लगा कि एकदम मेंने पिंजरा नीचे रख नहीं दिया, तो तोते मुझे नोच डालेंगे। कहीं आंख ही फोड़ दें। कान ही कुतर खाएं। बस, इस बात से में इतना डरा कि मैंने पिंजरा वहीं छोड़ा और दोड़कर डेवढी में घुस गया। वहां हांफते हुए मैं बाहर देख रहा था। ढेर सारे तोते पिंजरे पर बैठ कर सलाखों से जूझ रहे थे। लगता था जैसे पिंजरा तोड़ कर वे अपने तोते को छुड़ा कर ले जाएंगे।

|

इतना मज़ेदार खेल मैंने पहले कभी नहीं देखा था। फिर जाने क्या सोच कर मेंने तोतों को जैसे चिढ़ाने के लिए कहा, “अरे, मूर्खो ! कभी चोचों से भी पिंजरे टूटे हे

खूब घना अंधेरा घिर आया था। आखिर, तोते थक-हार गए तो टांय-टांय करते हुए उड़े ओर देखते ही देखते आंखों से ओझल हो गए। कुछ देर तक दूर कहीं उनकी आवाज़ सुनाई पड़ती रही। फिर वह भी गायब हो गई पिंजरे वाला तोता भी जेसे निराश होकर बेठ गया था।

इस पर मैंने भी चेन की सांस ली। सब तातों ने कितना शोर मचाया था! तोबा-तोबा ! !

देर हो चुकी थी। इसलिए आंगन में से पिंजरा उठाकर मैंने डेवढ़ी की छत की कड़ी से लटकती रस्सी से टांग दिया। फिर सावधानी से किवाड़ बंद करके मैं खुशी-खुशी भीतर चला गया। खा-पीकर जब में अपने बिस्तर पर लेटा, तो दुनिया में मुझसे खुश इंसान कोई नहीं था।

इसी में जाने कब मेरी आंख लग गईं।

5

लेकिन रात को मैंने एक अद्भुत सपना देखा..... क्या देखता हूं कि.... हमारा सारा गांव बैलगाड़ियों पर सवार होकर किसी घने जंगल में से गुज़र रहा है।

घनघोर अंधेरी रात हे। सरदी का मौसम है। दांत से दांत बज रहे हैं। ओर बैलगाड़ियों की पता नहीं कितनी लंबी कतार चली जा रही है।

अब, एकाएक जाने क्या हुआ कि गाड़ियों में जूते बेल-सबके सब-एकदम भड़के। फिर घुटने टेक कर वहीं बैठ गए। यह देखकर हम सब इतने डरे कि झट बैलगाड़ियों से उतर पड़े। मगर उतरने की देर थी कि सारे बेल मुस्तैदी से उठ कर खड़े हो गए। फिर इससे भी अद्भुत बात हुई। एकाएक बैलगाड़ियां ज़मीन से दो-तीन हाथ ऊपर उठ कर अधर में लटक गई। ओर फिर देखते ही देखते एकदम फिसलती हुई दू...र आकाश में ओझल हो गई। ऐसा लगता था जैसे बैलगाड़ियां नावें हों और बैल टांगों से चप्पू चलाते हुए जा रहे हों।

यह देखकर हमारे अचरज की सीमा नहीं रही। मुंह से बोल नहीं निकल रहे थे। जब थोड़ा संभले तो लगे

सब बातें करने | कोई कहता, भूत-प्रेत गाड़ियों को उड़ा कर शायद प्रेतलोक में ले गए हैं।

कोई कुछ कहता, कोई कुछ |

सबके चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं। चारों तरफ घुप्प अंधेर ओर घनघोर सन्नाटा था। किसी के पास कोई कपड़ा नहीं था। कड़ाके की सरदी थी ओर बचने का ओर उपाय था। किसी के पास दियासलाई तक नहीं थी कि रोशनी करके देखें कि हम कहां खड़े हैं। हां, रास्ते के दोनों तरफ घना जंगल था। ऊंचे छतनार पेड़ देवों की भांति सिर उठाए खडे थे। देख-देख कर कलेजा मुंह को आता था।

फिर किसी ने कहा, “यहां खड़े क्या देख रहे हो? आगे बढ़ो। राम भली करेंगे।''

इस पर सब लोग चल पड़े, हालांकि कोई नहीं

जानता था कि कहां जा रहे हैं ? फिर ज्यों-ज्यों हम _ कि जे हक

आगे बढ़ते जा रहे थे, रास्ता और तंग होता जा रहा था। ऐसा लगता था जैसे संकरी घाटी में मनुष्यों की नदी बह कर जा रही हो।

मेरे छोटे भाई गोपी ने मां की उंगली पकड़ रखी थी। रह-रह कर वह रोने लगता था। मगर तभी जेसे पीछे से भागते हुए लोगों का एक रेला आया और रोला मचाते हुए आगे निकल गया। आखिर रेल-पेल खत्म हई। हमारे तो हाथों के तोते ही उड़ गए जब हमने देखा कि गोपी गायब है ! मां बावरी-सी खड़ी देख रही थी। कह रही थी, “अरे, अभी-अभी तो मेरी उंगली पकड़े मेरे साथ चल रहा था। कहां गया?” ओर फिर मां ने जो रोना-धोना शुरू किया, तो फिर चुप हुई। सबने समझाया कि बस तसल्ली करें बालक मिल जाएगा मगर मां के आंसू थे कि थमते ही नहीं थे।

बात भी बड़ी हेरानी की थी।

अभी-अभी तो गोपी हमारे साथ था।

एकाएक गायब केसे हो गया 2

जब बात फेली, तो सारे काफिले में खलबली मच गई | सब लोग गोपी का

नाम ले-लेकर पुकारने लगे। मगर गोपी जैसे सबकी आंखों में धूल झोंक कर गायब हो गया था।

रो-रोकर मां का तो बुरा हाल हो गया। वह पगलाई-सी चिल्ला रही थी। सारा काफिला भी जेसे बोरा गया था।

तभी एकाएक गोपी के रोने की आवाज़ हमारे कानों में पड़ी, तो सब एकदम ठिठक कर देखने लगे। यह आवाज़ कहां से रही है? अंधेरा इतना था कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता था। गोपी के रोने और बिलखने की आवाज़ तेज होती जा रही थी।

इस पर सब लोग उसी दिशा में भागे जिस दिशा में लगता था कि आवाज़ रही है। अंधेरा तो पहले ही था। अब जब लोगों के पैरों से धूल उड़ी, तो अंधेरा ओर गहरा हो गया।

इसके साथ ही बिजली कोंधी। उसकी रोशनी में हमने देखा कि रास्ता आगे ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों में खो गया है। यह देखकर सबका बुरा हाल हो गया। मगर आगे जब किसी शेर की दहाड़ और हाथी कि चिंघाड़ सुनाई पड़ी तो सबकी

धिग्घी बंध गई।

.._ इसके साथ ही एक बार फिर बिजली कौंधी। हम क्या देखते हैं कि रास्ते के . बीचो-बीच एक शेर बैठा है। शेर को देखते ही, बच्चों के क्या, बड़ों के भी प्राण गले तक गए।

तभी शेर का ठहाका गूंजा। उसका ठहाका इतना डरावना था कि सबके रोंगटे खड़े हो गए। इसके साथ ही पीछे कहीं से गोपी के रोने-बिलखने की आवाज़ भी रही थी। क्‍

मां ने बेटे की आवाज़ सुनी, तो दौड़ी। तो वह शेर से डरी, और अंधेरे से। मां जो थी! एकदम उधर भागी जा रही थी जिधर से गोपी की आवाज़ सुनाई पड़ रही थी।

]8

“मां, रुक जा!” उसके पीछे-पीछे भागते हुए मैंने उसे रोका। बाकी लोग

भी आगे आए।

इस पर शेर जैसे मां की खिल्ली उड़ाते हुए बोला, “क्यों, अपने बेटे को देखने जा रही हो!”

शेर को मनुष्य की बोली बोलते देख हम जैसे वहीं जड़ हो गए! इस पर शेर ने एक ओर ठहाका मारा। फिर बोला, “आदमी बड़ा डरपोक होता है... हैं..हैं...हैं”' फिर हंसते हुए उसने यह बात इस तरह कही, जैसे हमें बच्चों की तरह बहला-फुसला रहा हो। बोला, “डर-खतरे की कोई बात नहीं है| तुम्हारा बेटा' सही-सलामत है! अब तुमसे क्‍यों छिपाऊं? मेरी कोई संतान नहीं है। मेरे मंत्री गजदत्त का कहना था कि यदि में आदमी का बच्चा पाल लूं तो मेरे भी ओलाद हो सकती है

मां ठगी-सी खड़ी थी और आंखों में आंसू भर कर शेर की तरफ देख रही थी। फिर जैसे आंचल पसार कर, दया की भीख मांगते हुए बोली, “'मेरे बेटे को मुझे दे दे।!

गांव के बाकी लोग भी हाथ जोड़ कर शेर से बिनती करने लगे, “महाराज, इस बुढ़िया के बच्चे को छोड़ दो। तुम्हारी बड़ी दया होगी। बुढ़िया असीसें देगी। तुम्हारा नाम ले-लेकर जिएगी[

शेर ऐसे बैठा था जैसे इस बात को मन ही मन गुन रहा हो। फिर धीमे-धीमे मुस्काते हुए बोला, “ठीक है, जाओ, आगे पिंजरे में तुम्हारा बेटा बंद है। निकाल कर साथ ले जाओ।

इसके साथ ही एक बार फिर बिजली कोंधी ओर हमने जो कुछ देखा, उससे तो हमारा रोआं-रोआं ही कांप गया। एक खुला मैदान था और उस मैदान के बीचो-बीच एक बहुत बड़ा पिंजरा रखा था। उसके भीतर गोपी खड़ा सुबक रहा था।

49

सबसे पहले मां भागी। उसके पीछे में भागा। ओर फिर सारा गांव भागा आया।

हमें देखते ही गोपी पिंजरे की सलाखों को पकड़ कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा, “मुझे बचा लो। नहीं तो शेर मुझे खा जाएगा।

मां ने दौड़ कर पिंजरे को जा पकड़ा था। वह “बेटा-बेटा'' कह कर पुकार लगा रही थी।

इतनी देर में सारा गांव पिंजरे के चारों तरफ इकट्ठा हो गया था | सब लोग दोड़-दोड़ कर देख रहे थे कि पिंजरे का दरवाज़ा कहां है | यदि दरवाज़ा था, तो किसी को दिखाई नहीं देता था। गोपी रो-रोकर गुहार कर रहा था, “मां, मुझे बचा लो। यहां से छडाओ | नहीं तो जानवर मुझे खा जाएंगे।”

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और मां थी कि पिंजरे की सलाखों के साथ जैसे माथा फोड़ने पर उतारू हो गई थी।

शेर यह सब देख-देख कर खुश हो रहा था। इसलिए एक बार फिर ठहाका मार कर हंसा ओर बोला, '“डरपोक लोग! जाओ, अपने घर लोट जाओ। पिंजरे की सलाखों से माथा मत फोड़ो इसकी जड़ें तो पाताल में हैं।''

शेर की यह बात सुनकर तो जेसे मां एकदम चीखीं ओर वहीं ग़श खाकर गिर पड़ीं....

6

... ओर इसके साथ ही मेरी नींद भी खुल गई। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। मैंने देखा कि मैं जंगल में नहीं, बल्कि अपने बिस्तर पर बैठा हूं। मगर लगता था, शेर की दहाड़ अब भी मेरे कानों में गूंज रही थी।

पता नहीं मुझे क्या सूझी कि रज़ाई परे फेंक कर मैं उठा ओर बाहर भागा।

आंगन में सुबह का उजाला फैल चुका था। मैं उनींदी आंखों को मलते हुए देख ही रहा था कि डेवढ़ी में से तोते के चिल्लाने की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी | मैं नंगे पेरों दौड़ गया। यह देखकर मेरे तो प्राण ही निकल गए कि डेवढ़ी के किवाड़ खुले थे। लेकिन ज्योंही में भीतर गया, पिंजरे के ऊपर चढ़ी एक बिल्ली एकदम कूदी ओर दरवाज़े से निकल कर भाग गई।

मेरा तो कलेजा ही दहल गया। तोता डर के मारे चिल्ला रहा था। मगर खेरियत यह थी कि वह बाल-बाल बच गया था। यह देखकर मेरी जान में जान आई। मगर मैं यह सोचकर कांप उठा कि थोड़ी-सी भी देर हो गई होती, तो बिल्ली तोते को मार डालती। मुझे देखते ही तोते ने धीरे से टांय-सी आवाज़ निकाली, जैसे मेरा धन्यवाद कर रहा हो कि में वक्त पर गया। फिर चुपचाप आंखें बंद करके बैठ गया।

कुछ देर में खड़ा उसे निहारता रहा। फिर मेरे मन में जाने क्या समाई कि मैंने वहीं खड़े-खड़े ही एक बार फिर प्रण किया: “मैं इस तोते को कैद नहीं रखूंगा। इसे अभी, इसी वक्त, आज़ाद करता हूं।”

फिर मैंने दूसरी बात नहीं सोची। धीरे-धीरे चल कर मैं गया। पिंजरा उतारा। उसे हाथ में लिए मैं बाहर आंगन में आया और वहां पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया।

तोते ने अचानक आंखें खोल कर देखा। फिर धीरे-धीरे दाएं-बाएं -सिर घुमाया, जेसे अचरज कर रहा हो कि वह भी कहीं सपना तो नहीं देख रहा है!

फिर दो कदम चल कर वह पिंजरे के दरवाज़े तक आया ओर फुर्र से उड़ गया। खाली पिंजरा हाथ में पकड़े में चकित आंखों से देख रहा था। यह तोता रात को आया था, तो घायल था। अब यकायक उड़ केसे गया? क्या रातों-रात इसकी चोट ठीक हो गई ? या क्या आज़ादी पाकर तोते में इतनी हिम्मत गई कि वह पंख मारता हआ उड़ गया? का

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