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अडचण पेषे, तेगनेकेव्डः टीपीथी वीरुकुर अनाप्याछेतेथी तेओते वांचवोने भम पे एवा इरादाथी अमारा माह रावसारेव हरीर छम- नखा सत्यवादीए दाडनी त्री ममणे शद्ध बाग्वोधी अक्षरथी न्ड- दना श्रीमत्‌ गुछावाधिजये न्नानखाते काटेडा वैसानो सारो उपयोगे याय एव धारी श्री जयानेद केवजीनो रास छपाववा श्रर करयो हतो प्रतु दैव कोपथी तेच साहेव स्वगेवाशी यवाथी नीचे सही करनार घडे अंथपू्णे करवामां याब्यो छे. शीमत नेनधमेना अनेक अथो छे ते मरो भथम गणना करवा खा- आग्रंय छे आं प्ंयना नायक श्री नयानेदं केवरछतुं चरित्र संवत र्ना शैकामां शी नेनशाञ्नना इन्नुतिकारक़ निदश्च तारगणी आदिक मोना सता #" ^, दानषुदररि माहारोमस्तु मापामां रचे ° प्रतु स्यारपष्टीना षणा श्रयोने पयवे --2 होवायी पुनि शरीप्मविनयी महाराने परेयनी गदी चुही देशे आमां वसने वे दार करीन रास र्यं छे. तं महल चना चरमां तले करीन भव शर डान 3 [वकने भकिघवर मतिर नामे भषानना पाययां तेना फक प्ण तमने तेवांज वा दतत दध दापू वान सन्यादछे मोग फी दोन मुर ने सं माम रे, थव भने भावमा से ओरी जवानी पव पाचु, सेकायैनी ति 1 भे! राजकन्याओं प्रण्याछ्े, तमन रानादिकौः ˆ +

पडत भवर प॑ शरी उत्तपविजय शरुभ्योनमः

दुहा भयम प्रथम भ्रणयु भभु, सोहे अंसे जास, तर कनक क- छत्र चिरे, नीर कमर पन न्यास सिद्धारथ सुय तिविद्यं, वदु ति- विहा वीर;-जनक सिद्धारथ दुविह निन, धरणीधर पह धीर क- स्याणके जस धुर करे, अवनि करप अविषः ते घुगुणा वरतो सवे, न- यर्वेता जिन षोष. मात प्ररे पद मांवा, शाज्ञ मागे समनायः; शि श्रुपरे कविने शीखवे, भरणयु सरसति पाय. गुर उत्तम गुण गण भर्या, युन उपगार महंत; परणमु पद कन ेमश्युं, आणी हष अत्यंत. ॥५॥ श्री जयानेदं सोभा्िया, केवछ छसमीकंत; धमे दुषिध आराधने, शिव छख जे साधत. भव्य भरतिवोधन भणी, चरित भणुं सुविचार; नवसंडे करी निमेखो, रचश्युं रास उदार. भिया सहित पूरव भ- वे, समकित ने वरी धीरः दान धरम वी दाखढुं, ऊहे निम टखमी, कीर. < चमस्कारकारी चरित, णतां होश खाद; दुख दोहग द्रे नरे, विकथा युकी वाद,

हल्र्ीं देशी चोपाईनी जंब्‌ द्वीप ङस योजन भानः सात खेत तेमां .

(२) नयानंद केवर्मनो राप.

रथान; सात वरप पण षट वपे धरो, चमत्कारी वाते सरो. ९॥ खमी राखण विभिए करथो, लगती कोड अट योजन धरो; साई खण सायरनी करी, सव दीप जस रह्मा अनुसरी. २॥ तेदमां भरत दक्षिण दिशे कलो, वैताढध दंड छेदने रघनो; आपदं षारण मानु एद, पट खं शोभित लेह. २॥ संह किंटेश मिरी रसे करे, तिणे धाता विवे आडज धरे; गंगा घु ने बडी पाड, वैताल्य रजत तणो अति गाद. % ] ब्रेट जिनवर पहा होय, मध्य संदे एवो नोयः रतिवर्धन तिं नगरी अ, स्वगे तणी शोभा तेह पठे. फटिक कंभ तिदां चयने विरे, अंधकार ते दरे करे; एनिम अमांसनो वैरो नी, एयर अनीति गड द्रे बही. नृपगजराछाए कह ते कटो, वधन नारि धमिछे र- षो; दंड भासादने पसक दोय, स्नेह शानि दीपकमां जेय. 1 शुहियां मदिर दते घणां, खडग माहि र्यां निदैयपणां; को रणी नहीं ते नगर मजार, पण कोरणी धर घरने बार. < अख्कापुरी परे वेदनो जोस, पण बहु दैग्वर तिहा नदीं दो; भूति घणी तस मंदिर वरी, धनद वहु हे भेखा मिरी. तिं नरविर अछे राजान, ट्ुरारे नस स- मान); कटक रजे ठांक्यो जव रुर, तस्र परताप उद्योत्र करे भूर, ९० राणीओो गुणवती बहु जास, कीरषि॑दरी पटराणी तास, मतिंदर तेने प्रधान, चतुराईंनो तेद निधान. १९ रुपवंत बह शाद्नो जाण, घुर गुर जीयो बुद्धि भमाणः जीवमान ते मानु रघ्लो, भये जीव तिणे कही. ९२ गुण ग्रहने चहु दातार, क्षमा भ्रयुख शण्वत अपारः विनयी न्यायी श्ञाता लेह, नृपनो भगतो अति सम्रनेह. ९३ मंनीश्वर मोरीजे कवी, राज्य भार तेहने शिर टवी; आप निचित निर्भय राय, रात दिवस भोगे र्य शाय. ९४ ॥मंनीषवर्ते कामिनी दोय, भीतिस्ुदरी पेदे ली विहं होय; णघदरी वीनी तस नाम, रुप करायी अति अभिराम, 1 २५ देवी तणुं सवि छे ऽप, विधिए निपभाव्युं सर्प; -ते दुःते नवि निद्रा करे, देवी स्वाप रहित विणे फरे. ॥९६॥ बरद्धपणे मिद्व विधि

संड पैलो. (३)

थयो, अपवाद बिडरण भयो; निपनावी फरी निहतान, क्ति देखादे निन असमान. ९७ दान शीरादिक गुण बहु तास, जिम आभरणे माणिकवास; सपने एकं पुरोहित वड, बुसार नामे ते छली. ९८ अतीतं अनागत वातो कदे, निमित्त वरे ते सहु सदर; धमे योग्य राना प्रधान, संत्रीनारि एण गुणह निधान 1 ९९ परण सामग्री नवि खघ्रा कय, तिणे मिथ्यात्वी सथल होय; परोित माक्लिक मत धणी, तेहनी चाति सवे निरोणी.॥ २० भरी जयानद्‌ केवरीनो रास, भणतां णतां खी

विलस; थी गुरु उत्तम परिजयथी छह, थम दार एम पदमे कदी.॥ २९

दुहा. नास्तिक मत्त निचय करी, काठे भोगां काल पुरोहित महा पापीयो, आसे फोकटओआल. 1 जीषादिफ नेव तच जे, नविमा- ने निरधार; सातं पीड छख गणे, परभवनो भकार. २॥

^ हाठ २-नी. करेरणां पटदेनें देशी एक दिन मंत्निने परे, चरण ज्ञान संयु- तत युनिवर 1४८ गोचरी, सूप अतति अदभूत. ३॥ भविकनन नमिए्र॥ भवभव संचित पराप सवि निगमा एण्यराि मयुदग करथो, मयगरुपरेम- दारान; मास समणने पारणे, आन्यामहारिपिरान. ४॥ त्री पु- नि देती करी, शुम उक्षण शुभ बान; मन चिते शुन भाग्यथी, व्या ए- अचान.॥भ० ५॥ भयम नारिने {म कहे, आपो पुनीने दान; दान धणं तस प्राख्ं, हरसी चित्त निदान. ॥१०६॥ सीर खंड ते नीपनां,मोशेयभा नन भांहिः तेदमांथी कोर ठे करी, आवे मुनिवर स्यांदि-॥१०७॥ सीखा- ठटके करी, विचमां टोकती तेह; आवी शतिने वीनषे, छदर आहार त्यो एद. ॥भ०८॥ शनि बोष्े ब्रतवंतने, नवि शने आहार; तव ते सकी छाषती, ` छूर अति मनोहार,॥भ० ९॥ पण अगनि उपर र, भाननर्मायी आणिः ने ` नहीं युनिवर कटे, अतिशय मीठी वाणि. भ० १० एविच दा कशु दाकर, तेदथी रावी दान्म पृ द्मे नदी, युनि कदे यण

(४) भरी नयाय कवीन रास,

रसाढ, ५० ९९ कण एपर रयु धृत बरी, मुनिवर ङिए तेह कर्ण मिधित बली शरा, णद्धमान नही एह. ॥भ०९२॥ दिन उपर दषि जि- को, नवि लिए युनिवर सोयः ते पण मुक्युं तिणीए, वटी जे धरां होय. भ० ९३ गत काठ मोदिक करया, भावे कावी नारि, युनि कहै अमरं सजे नरी, एह मोदिक ईणि वार. ॥भ० ९४॥ वे नारी मत्री परी, भ- क्तिए जग्रह शीष; आशय अणजाणे थक, पण पनिवरे नवि लीष॥भ० ९५ अण छता देखी करी, भनपां उपन्यो खेद; अपमेग चित्त चिः तयी, बोरे इणिपर भेद. भ० ९६॥ मोदिक अगत सारिखा, जो नवि घज एह, तो किम विप तुन धूजशे, क्षिवा नेत्र ग्यां देह. ९७ परेदी स्री करे लैनना, यतिने दाक्षिण नाट; दाक्षिण शद्ध कर होए, एदं ङण महि. भ० ९८ षीजी कटे उदयोतमा, जो नवि घने काय; तो आपो अधने, मिद्ध मणी तुम्हे नात्र. भ० १९ परा्रध- णाँ नयरमां, तेहने देश्यं दान; मगर करश्युं आपणे, देश्यं आदरमान. ॥१०२० निहा तिद दीष दान जे, ते निष्फड नवि जाय; पात्रे दीं ते, सहस कोटि गणु थाय. भ० २१॥ दु्ाक्ये ते अर) बाध्य के- यर कठोर रोप रोप विण गुनि वे, नीरा तप घोर. भ० २२ एकं आवक मैत्रे घरे, आण्य काये विशेपः परण ते मंजरी मि छे, अंतर नदी तस रेप. भ० २२॥ प्मेरुषि ते नामथी, आपी आसन तासु; उचित चयण सतोपिने, वातत कदे हवे सास. भ° २४ श्रीजयानंदना रासा, भासी बीजी दाख) पत्र कहे श्रोता घरे, दोनो मंगल मार. भ० २९ स्वे गाया ५५

दुह भाई कोई एन धर भणी, आन्यो भिक्षु एक; जैन यतिं लाणी करी, विनये धरी विवेक. प्रियाए भारथना करी, देवा मा डयु दान उचचम भोजन आपवा, वहु आद्र बड मान. आन भ- धम्‌ युन आगणे, आग्युं पातर एद; विण दीषे वरीओो वी, पभनण

खंड पेली. (९)

नादि सेह. अपमंगर करी ओसरथो, कूण दतो कदो भाय; ओ- कखोतो आसौ तुम्दे, भावक कहे समजाय. हमणां भिलीभा ईह जद्यु, मुनिवर ते महराण, भणस्या मे ममे करी, ओरुखीया असमाण. कान ददने जे कहु, सांभखो चतुरसुजाण, चिरकारी जस चरि छे, घुणतां -अवे सान. --@-- + ढार नी. वादी फूटी अति भटी मन भमरारे - दंशी.

सिधू देश सोहामणो, युनि नमिररे+-पयवार नगर मक्षार, पापनिगभिषरे वलियो अतिबल राज यु तस समर नहीं शिरदार, पा० तास सभामां अ= ~+" पं परदैशी नट आय पा० मांडयुं नाटिक अभिनवुंमु° रसतां अचरिज थाय. पा० देखी सगर चक्री तणुं मु० नायिके एत्र बि. योग पा० पीडा तेनी देखौने यु० ध्याये चित्त शुभ योग. पा०९ अहो भव दुलमय दैखीए यु° बञ्यो ते हाराय पा० निज धुत वाखकने उवी ु° रा- ज्य त्सत निरपाय. प° ९० धरमाकर्‌ गुरु सन्निधे मु दीक्षा रिए महाधीर पा० दुदिध विक्षा अभ्यासता यु° वहु श्रुत थया गंभीर. पा० ९१ अदभूत वैराग्यनो धणी मु° बारसषिहं तप सार पा० अभमादीं नित विच- रता य° छब्धीं तणा भंडार. ए° ९२ कांय असाध्यन त्प थकी युन्यो- ग्य जाणी शर राय पा० एक विष्टर आणा करे यु° सद गुरू करि प- साय. पा ९४ सिहपरे ते विचरता य° प्रीसदने उपसगे पा० ते गृगथी वी हे नदी मु° सार्ध॑ता अपवग. एा° ९४ गजप॒र आच्या अन्यदा मु° ध्यान तपे तेह छीन पा० उद्याने र्या मुनिवर पु° निजयातम करे पीन.पा० ९९ विविध अतिदय गुण थकी सु° एुखीभा दीय सविजीव पाण्भीमराय तिहा राजीओ यु° श्रुते भीम अतीव. पा० १६ राजसगुण धारे सदा मु० से दद्रौननो राग पा० मतिसार मंत्री तेने पु० उुद्धिनिपि महाभाग. पा० ९७ राञ्यमार धोरी कहो भु° राज परति माज एह पा० यड अपराधे करी

(६) श्री नयानद केवव्यैनी रास,

भु° मारे तस्कर तेह. फा० ९८ यकाम निजैराथी थयौ भु० निजेर ध्यंतर सार पा० हाने विभंगे पाडल्यो मु° भव दीटे अविकारे.पा० ९९ पुण्यत राजा भणी मु° शक्यो परामव देण पा० गज मरगी अति आकरी मु कीषी कारण तेण. पा० २० सृप मन सेद्‌ ठे घणो मु° करे अनेक उपाय पा० पण नवि शाति हृ किमे मु संनीने करे राय. पएर० २९ करयो घ- पाय कोर रेण्ड्युं मु° तस पण विता थाय पा० उद्याने गयो अन्यदा मु गीत पानि णायः पा० १२ विस्मित वित्तयी आदीयो यु° मैनी युनिने पास पा देवी नास तिह देखीयो भु० हाव भाव इुविङास,परा० महा अभाव रिषि रजनो मु० भप नमिओ पाय पार पद्‌ फि्‌ रज छेडने मु° आब्यो ते निज गाय. पा० २.९ प।५ -ररेणु विर्ककर्थां मु° मरगी नादी नाय पा० ते हत्त आवी करे मु हरस यके" गयु. पा० २९. मुनिवर स्तवना बह करे यु० तव ओव करेराय पा०्गूप मनी बिह ओच्ये सु° आदे पुनिवरपाय. पा २६ गुनि भणमीने उपविश भु०पारं गुनिवर ध्यान प° धमेखाभ देह हवे पु० करे देशना दान. फ० २७ श्री भयानंदना रासमां य° मासी नीजी दात पा० पदम पिनय के सामतो मु» आगन वात रशङ.पा० २८ सवै गाथा ८३

"--63०@@---- इष दुवि धमे रिह वासवे, वरणव करी विसार गुणधर सुनिवर णहि तणो, सम्यग शद्धाचार. वृष्या भूष मंत्री बिहु, षीजा प्- बहु लोकः भे यथा पानित धरी, आव्या निन निन ओक. शनिवर संयम म्दारुता, अमपिवद्ध अणगार, पृथ्वि पावन करे, बरते उग्र विहार, ३॥ [१ (ष दढ ४थी, मखी केरा वागा दोय नाग पकेरे को अहो दये देधी मीरपुर सवे भागीमा, विहं नरमारिरे को थह पि०भढतार वेहनो राः

संहषदेो, ,. , .. (७)

जीथो, अना पीडा अपाररे-खो अहो भना० ४.॥ देसी उपाय करे घ- णा, पण॒ यई शांतिरे खो अहो १०-एक दिन भीम नरेद्रनो, दृत तिहां आयातरे.खो -अहो द° ॥५॥ उद्याने गुनी देसी, ओरुखी प्रणम॑तरे खो अहो ओ० राज समामां आवीओ, भणमे भू कैतरे छो अहो भ० राय के किम आवत, कायं तेह दासरे लो अदो का० राज काज सति वारता, होय ते. तम्हे आसरोरे खो अहो हो० तिणे पण बात कहेतां थका, कशं इम भरसंगेरे छो अष्टो कृ० गज मरगी मरे मीमने, पुनि महिमा रगेरे खे अहो मु०॥८॥ तेतुम्ह भाग्ये वुम्ह तणा, उद्यानमां आव्यारे शे अद्ये उ० र्द अणस्या महया भाग्यथी, मुज मनमां भाव्यारे छो अहो प्रु° विस्मय कदी नुप हरखीओ, _ राज्य उत्तर देइरे छो अहो रा० विंसरस्यो ते दतने, सतकार करेइ खो. अहो स०।१०॥ मुनि महिमा तेःनयरमां, उदघोषणा करतार खो अहो उ० ते- उदधोषणा सभी, चित्तमां सष धरतारे छो अदो चि० ९१९ मुनि फरसित रज जई करी, करे तिके ते भाङेरे खो अहो क० राय रांक सहु सारिखा, आप आप संभारेरे छो अहो आ० ९२ मरगी गई सरि नयरथी, इओ जयजयकाररे रो अहो ह° ओव रंग पधापर्णां, हूं घर घर बाररेलो . अदो ह° ९९ अहो तप महिमा आचय छे, चक्री सैन्य चृरैरे छो अहो च० क्रोषथी बी षुमक्तादयी, तस रीदधिए्‌ परैर खो अहो तस ॥१४॥

यत्त! मुनयथ्क्रिणः सेन्य मपि श्दधाद्‌ हंसदो तप अरभावतस्ख सदधि ददयंतिच

राय मुख मुन्निराग्रने, नमिओआने सवीथारे छो अह्यो न० मुनि दित धमे आदरे, शक्ति मापवीयरे खो अहो श० 1 ९५.“ विष्टार करी मुनि तिहां थकी, क्षेमापुरी उदानरे लो अहो, कषे ञान ध्यान मांहि रया, नदीं ` आहारने पानरे छो अदो न° -९६ मास खमणने पारणे, आच्या न- यर मश्राररे अष्टो आ० धरं धरं भीक्षाने फिर छवा चद आदाररे अहो रे० 1 ९७ मोखे बेटो -तिषां किणे, एक पुरोहित पतर छो अहो ए०

(८) थी जयानंद केवनीनो रास.

जीन ध्म देषी आकरौ, भिथ्यात आसूतरे खो अहौ मि० ९८ धन यौवन मद आकरो, आवी गृनिवर पासेरे खो अही आ० मस्तक सखासडां मारीं, भूनि समता विलासरे छो अहो यु० १९ कोप करे नदी यु- निवरा, मेरु परे षीररे लो अहो पे० ते उपर करता पा, छक तपथी श- रीररे छो अदो ॥२०॥ रिषिजी चार्या आगे, तव तपने नेरेरे खे अहो त° कोप्यां शासन दैवता, वाद्यो विह तेरे खो अदो वां०॥२९॥अ- ददा रदी क्रोधे करी, आक्रंद कराबे खो अहो आ० पीडा बहु उपने तिणे, मावित्र तिहां आवेरे छो अदो मा० २२ वात सवे मावित्रने, पतनी घणावेरे खो अदो पोण० ते पण सेद्‌ करी कहे, भिक धिक तुज थाषेरे छी अहो धि० २३ कोई उपाय चुने नदी, आवे युनिवर पासेरे खे अदो आ० भरणमरी करजोडी कदे, तुम्दथी दुख नारेरे खो अदो तु° २४ तुम्हे बहु मिमाना षणी, तुम्ह शक्ति अगाधरे रो अहो तु०° तुम्दे अरचित जरण जगतने, तुम्हथी निरावाधरे अष्टो तु° २५ तेजमयी धरय तुम्दे, वाख धूक समानरे छो अहो वा० नवि ओढख्या तिणे मुरखे, कीं अपमानरे खो अदो की २६ तुम्ह अपराध करथो धणो, समो कि- रपा निधानरे छो अहो मोहय रोश रासे नदी, एतो बहु अक्नानरे ङो अहो ए०॥ २७ तुम शरणे आव्या भणी, अनुपा कीजेरे खे अहो अ० बारना कर साजा केरी, सेवक गणी रीनेरे छो अहो से० २८ तुम्ड विण कोर दूनो नही, जेहने जह कदीएरे छो अहो जे०मुनि कदे रो मादर, रण कारे कदीएरे ङो अदो ०॥ २९ पण शासन देवता, एने शिक्षा दधीरे अष्टो ए० आकाशे परगट थह, तव वाणी कीधीरे छो अहो त० ६० परापीने सानो नव कर, धुज्यने. दुख दीर्धुरे जे अदो प° पूजा भगे संतुष्टथी, फिरी वचन ते कीरे छो अदौ फि० १९ गुनि पासे दीप्ता किए, तो सानो करिषएरे शो अहो-तो० ते पण तिणे अगीकरयु, देवी वथण आदरिप्रे छो अहो ३२॥ देवीए शाक्ते - चित्यथा, कर शतन कीषारेो अहो कर तव र्पित थया सहु तिहा,

संद. पदेरो. (९) वंछित सीद्धारे खो अहो प०॥ ३६ युनि शिर उपर फनी, थह ष्टि अ- उतरे, छो अहो पथातापे समावीथा, मुनिवर मातरे छो अदी भु०। २८ श्री जयानेदना रासमां, कदी चोथी दाठरे टो अटो क० प्च कहे मनि भरणमताँ, होए मंगर माररे खे अहो ह° २९५ सर्वं गाथा ९९८ -~---5ॐि---- - दुहा. दिए मुनिवर तव देदना, समस्यो चतुरदुनाण; मावित्र अपे अनु- मति, दीक्षानु करे दाण. विर कटपमां थापीआ, बिक्षा अदण संकेत; गुनि भणमी माविन्न यख, चमत्कार चित्त चेत भूप भमुख बहु भावि, जेन धमे जगसीर; पाम्या तेह भरंसता, गया ते निन आगार पारणु करीने पगरथा, पास समण मुनिराय; भव्या विचरता अही, निरमम ने निरमाय उद्यनि अवनि तटे, ध्यान निश्चल सुनि ध्याय; अवधि ङ्ञान बडी उपन्यु, शद्ध थोग समुदाय ते युनि आग्या तुन धरे, शद्ध गवेषे साधः; मासांतर करे मासतिम, निररेपी निरावाध.

दार मी. बारििम बेहडा आवनो.

धर्मरुचि. श्रावक इम के, उणो मत्री तमे बाणिरे; कल्पं ॒तरूसम एह मषा युनि, महिमावंव गुण खरे धमे०॥७॥ गुण आकर्षित घुरषरा, करे निस जस शवर; पूजा निचा करे एनी, तेने फर ततसेवरे धमे ॥८॥ वसे शपे नही कदा, इम णी तस वाणिरेः बह पश्चाताप मय विब्लो, भियादौय तिम जाणिरे. धमे० सचिवं कहे विस्मित इणि परे, हाहा सुनि अपराधरे; कीधलो एह अनागते, फट तास अगाधरे . धर्मे० ~ १० म्द तथा दोय नारि मरी, करथो अति आक्रोशे एदना फक कदो श्यां थर, इम मत्री करे सोरे, धमं ०॥ ९१ लैन मुनिनो अमे न-

(९० ) भी जयानैद केवनीनो रास.

वि टु, विगर अभ्यास आचाररे; वीक छागे एद युनि थकी, देशे भाष वाररे. धर्म 1 १२ धर्मरुचि कहे एदे मुनिवर, इयाचतत रिरदाररः श्चापनवि कोयने दिओ, पाठे शुद्ध आचाररे धम १२ देना पण अणगारनी, उभय छोक दुखं दायरे; जई खमावो तिणे मुनि; पापां विवे थायरे धर्म ९९ मत्रि कदे एह कर्य सव, पण एक कदी चातर; पायस प्रमुख आपतां, नवि लीधं किणभांतिरे. धर्मे ॥९९॥ श्रावक करे हं जोर कडु, जव नू तिणे गणरे; सीर विद्‌ञ वहु कीटिकाःपगेशे तस हांणरे. धममै° १६ मेचिने तेह देखाषतो, दया नवि रहे एणरे अभि विराधना कूरथी, इत्यादिक कदणेणरे. धर्मे १७ आत्ते द्‌- पिवटी यकीने, सकी अल्ताय पोरतैरे; उज्वल द्म जीवने, भनीने कहे जो तरे. धर्मे ९८ नत्रिअ कषु इणे कारणे, इवे मोदक वात्तरेः ति अ्हया तेह नाणु नदीं, युनि केशे साक्षातरे थमे० १९ एवं सा- भटी देखीने, मची विस्मय पामरे; सुषम धमं अहो जननो, नवि दीगे कोड उमेर धम २० दान बहु पामां म्ह दमा, मण्यो शास्र अनेकरे; निरीहता एदवी निहा होए, तेषं गण एकरे. धर्म० २९ भावक कटे मुनि वेदवा, जइए आपण भायरे, जन्म कतारथ कीनीए,वरी भव दुल जायरे धमे० २२ म्री कहे हं अपराधीओो, युख केम देखायरे; आवक कहे युनि दरिसणे, किसी छाज केरायरे. धमे २९} दोप तौ एह देखे नदी, इम कदी सह जायरेः मुनिवर भणमीया भक्छिथी, चित ह- रप मायरे. घमे० २९ देह धर्मङाम संतोपीञा, मंत्री कहे कर- जाडरे; खामि अपराध में वहु करयो, खमो एह मुज कोडरे. धर्म० २५॥ कोरी नर भस्म क्षण्मां करे, तप तेजे म॒निरायरेः ग॒ण निधि कसो कृपा अम्ह भणी, अम्हे रज तुम्ह पायरे. धर्म २६ दोय भार्य ष- मुनि नमी, प्ाताप करंतीरे; सुनि समवे निज निदती, पणी भक्ति ध- रतीरे. धर्मे 1 २७ सुति करे कोप नही माहरे, तुम्हे भय मत आणोर, दृष्टि लप जाणो नही» तेह चेद्ध पिच्मणोरे धमे० २८ श्री नयानदना

संड पलो. ( ९१ )

रामां, की पंचमी ढाङरे पश्विजय कहे संभलो, युनि बात रमार. धमे २९ स्वं गाथा १४. "~--ॐ----- दुद. आसि कदो अणगारनी;, मंत्री कटे इम जामः दोय भेद छे द्रटिना युनिवेरं इम कहे ताम. ॥९॥ चमे रूप यूर चु जे, सपनो वाह सुनाणः अभ्य॑तर ओरखो, ज्ञान दक्षन गुण नाण. दोष वेताछिसि देखीए, अहार तणे अधिकारः दीय द्रष्ट तिणे देइने, उपयोगे छेडं अहर. 2 ते वैताङीश दोप ते इमः- आहाकम्बु९ देसिर,पूरेकम्मेअदे मौसनाएजधः उणा पाहुदिधा- एद, पार कीय पामि ९. परिथदिए १० अभिदड ९१ भिन्ने १२५ मारोदडेज९१ अचिज्ने १४; अणिति ९५ श्रोथरए ९६, सोस्पिहगमेदौसा. भाई दूर निमित्ते र, आनीव७ वणिगृगे९ तिभिखाय ६; कोहेऽ माणे माया ९, खमे १० हंति दसएए पुध्वि प्ासंथवे ९९, विक्ञा ९२ मंते ९२३ चुन्न ९४ जोगेअ १५;उप्यावणा - १६ इदोसा, सोरुसमे पएूखकम्मेज ॥४ एवं ३२] संकिय मर्तिअ२ निर्िखित्त २, पिदिं सादरिथं दायगशु & म्मीसे अपरिणय खिचर उद्य ९०; एसणदोसादसद्ैति एवं ९२ संनीयणा प्रमाणे ईगाङेरे धूप कारणे ॥इतिग्रासैषणादोषा; एषं ४७

%

डारै ही. माईरं मन मोरे माधव देखवारे देशी. अमिय समाणीरे बाणी युनि करे, छण भत्रीसर बाणः; आक्रोश क्रोध करथो तुम्हे इणिप्रेरे, नयन सरूप अजाण. अ० समता भा- मेरे म्द खमियो सेर, हवे श्रावक परधानः बिहु मि परे स्वामी भा- षीएरे, मोदक केर निदान. अ० युनि के रात्रे दासीए राधा,

( १२ ) श्री जयान॑दं केचर्व्मनो रास.

चूला उपर रो भाग; धूमे आकृढ व्याद्क ते ययोरे, नाली गरल य- ताग. अ० ६॥ तिद चैदरुभा केरे अभावथीरे, विपमयि -मोदक थाय, घरना रोके काय जाण्यं नदीर, हेर णो समुदाय अ० संयम घात कारण नवि म्द छिआरे, जीए सांमरीतेहःदासी पास मंगान्या लाडजरे, परिक्षा कारण एह. अ° मांसी परती देखी जाणियरे, युनिनुं सा- चरे हान; अहो अहो क्ञान पुनि तुम केरईरे, अमचु बहुरे अह्ञान. अ° एह मोदकथी कुटेव सित अमेरे, मरण रदत ततेव; अरणिय किम थां क्रे, जो कदं अहनिशि सेव. अ० ९० मित्र वचनथी सहु छाड़ विहारे, परठविथा ते एकांत भाणदायकने शरण मुनिवरुरे, यु- निषरमे के खांत अ० १९ एह उपगार कर्यो तुम्दे मोटकोरे, वे दासो उपदेशः मुनि माते घण धम ते जैननोरे, सवै अधमे जे देप. अ० ९२.॥ देवगुर बन्यी धेने ओछरूखीरे, सरधा ते परतीत; अद्रा सहित षिर- ति दोय भेदथीरे, सवे देके धरो चित्त अ० ९६ क्षांसादिक दश्षषा मुनिराजनोरे, द्वादशधा ग्रहि पमे, थू भाणातिपात भमुख कोरे, इया- दिक सवि पमं अ० १४ सांभखी भतिवृष्यो तिहां मंनवि रे, तिम तेहनी दोय नार! सवे चिरति खामि करि शरे, देशथी चो अणगार. अ० ९९ मुनि परण द्वादश इत उच्चराधिआरे, शिखे आवश्यक सार, दानापिक शुण तिम उपदेशिजरे, पाम्या भद्ध आचार अ० ९६ भु- निर्वदन की सहुए धरे गयारे, सुनि आश्रातना नेह; निदा गं आलो. चना मुतेरे, कभ सपाय बहु तेद. अ० ९७ तोपण कायक दोप रण्यं

खररे, भोगवशे एकवार; धरनि भमा सह मुनि नमीरे, पोरोया निज रवार अ° ९८ माससमण सुनिने पूरं थतारे, मेबी करे नितु सेव;

नाण्या जीवादिक देव. अ० ९९

° चावे सुरपति पण

यी धमयार, परबादिनो करे अंत, जिनशादान शोमावे षह प्रर, कोई तास छरत.

खंड परेख. ( ९१ )

अ० २९ पारण दिवस नाणी निमेत्रणारे, करे मुनिने सूरसारः क- सिपि छपा मुनिवर परण आवीयारे, निषपृह परमदयाल. अ० २९ मनी दोय नारी चहु माथीरे, आपे शद्ध आदार; परमाज्नादिक तिहा प्ररगर यारे, प॑चरिव्य मनोदार. अ० २३ पाणी सुगंधवर पुष्पदृष्टि थररे, वीं हेषे वधार; दडुभीनाद अहो दान धोपणारे, मुनिवर करे तिहां अहार. अ० २९ दान भभावे चरण जणे वांधीरयुरे, मोग करम अतति माढ; मुनि उथान काउसग रद्यरे, ध्यान निश जिम पराढ. अ० २५ दुदुमि खर घणि नूप पावियुरे, निज नर कते इ्तांत; नृप विते धिग पुजने्ो इदारे, एदवा युनिषर मादेत. अ० २६ एषषा मुनिवर मारा नयरमारे, हं नपि नारे कायः भात समे वदु परिवारथीरे, इम क- रतां दिन जाय. अ० २७ राति मुनिवर क्षपक श्रेणि करीरे, ध्याएश्ु केर ध्यानः सर्वं भाणी हित वैक पामीआरे, निरमल केवर्ञान. अ० २८ श्री जयानंदना रासमां फदीरे, छठी दार रसाः पंडित उत्तम- त्रिजय छृपा यकीरे, पबत्रिजय कटे वाङ. अ० २९ सपै गाथा ९७७.

दुहा मुनिवर केवर पामीभा, भा्उदय प्रथा; नाद थयो दि- व्य दुदु, मनमां है मात ९॥ इद्रादिक घुर आर्वाभा, गीत बा- जिन्न गवायः परगट हटि पष्पनी, खणे केम चरर गय. २॥ तिहां बे- ठा केवरी तदा, देखी देव उद्योतः भूपति पञ भांतिथी, भूओ रीछे ज्योत. तव मनी नर ततक्षणे, आधी करे अवदातः; रायने भणमी रंगद्यं, विनवे चणो ते बात. खमि छुणो साधुने, उपन्यं केवर आम; जः वैदो वहू युक्तिद्यु, करो छृतारथ काम. लैन धमे नथी जाणतो, भद्रक भावी भूप; भक्ति आश्चयं मराईइयो, अवनीपरति , अनूप. 2 साम॑त मनी सामरा, परवरिओ परिवारः गज वेठो अति गेरष्यु, वा- जित्रना बहु दार. उद्याने अनिपति, भणमे मुनिना पायः छुरनरं अयुर सभा मिरी, केडा वेत्त गय. धमेराभ देह धमनी, देशना

(९४ ) श्री जयान॑दं केवन्मीनी रास,

दिषए सुणिद, आसर अंग उतारने, सांभरुज्यो सकद. ----€ऊ--- ढाढ मी. वातम काढो हत्त तणी एदेश्षी

एह ससार असारमां, दोदिखो नरभव पामीरे; धमे करो भविभाणिभ, दुख दानि घुस कामीरे; भाव्रधरी भविं आदरो ९०॥ आंकणी स- मकित सार संसारमां, दुरम पामवुं माणीरे; वितामणि परे नाणीपए, दिए गुण साणिरे. भा० ९१ यतः मूं दारं पणं ३, आदारो भायणं निही ६; दुखक्षस्साषि धम्मसस, सम्मत्तं तत्रि आयं. दैव गुरुनेरे धमेनी, सरथा कीजे सुनाणरे; दोप अढार रदित सदा, आपे शिवपुर टणरे. भा० ९२॥ हाखयादिक षट वेगम, क्षय करा च्यार कषायरेः भेम पचाश्रव मद्‌ नरी, कडि अढार थायरे भा० ९द३॥ एहवा देवने सेबीएः जे संसारना रोगरेः तेहना वैय सोहामणा, गत संयोग बियोगरे भा० ९७ रतन त्यीयुत गुरु का, अथवा महाच धाररे; शय्या वस्ने पाज ने, शुद्ध मान छ्एि आहाररे. भा० ९९ स- म्यग धमे दायक षी, आप तरे पर तारेरे; पेच महावत धमं ते, हिसा भमु- सने वारेरे भा० २६ ह्यद व्रत गृहि धम 9, थू सादत चोरीरे; खशरा संतोपथी, नवि च्छे पर गोरीरे, भा० ९७॥ घन परिमाण क- रे सदा, अणुत्त कलां पचर; दिधि परिमाण वरी करे, भोगोपभोम भ- पंचरे भा० १८ साग अनथेदड भार्षीयो, शुणदत्त एह उदाररे; अ- णुबतने जेह गुण करे, हवे शिता अरत चारे ॥भा० ९९॥ अवसरे सामायि- कं करे, रात अने बली दीसरे संप छग बत्तनो, सपु बत कदे देशरे भा २०॥ प्रवे तिरे पोसद करे, कोई दिवश्च चया रातरे; कोड हो रा- ति आद्रे, इम भाषे सिदधांतरे भा० २९॥ अिथीने दिए दान ने, रिक्ता चोधर पारर वाख्क भीख निम पिरी फिरी, तिम रिष्षानत सारे

\ भार २२ तिम पट आवश्यक नित करे, दान श्रीक तप भावरः धर्म

सड पदे. ( १९ )

क्यो भादक तणो, यथा शाक्ते तणो दायरे. भा० २६॥ आराध्यां दिए दने, परभव नृप च्ररीदिरे; स्वगेनां रुख वरी जे दिए, असुक्मे लहे तेह सिशरिरे. भा० २४ उत्कृष्टा तेहन भवे, साध मोक्ष ते पमेरेः चारु सरणं एरयनु, उतकृष्टु कहै ठामरे. भा० २५ चिहुने स्वरम जयन्ययौ, पटेन देवखोक नाणोरे; एहमां एक अंगीकरो, निजनिज शक्ति अमाणोरे भा २८॥ एुष्वी देशना सांभठी, भावक अत धरे रायरे; के$क चारिजं आद्रे, भवे उटेग निरमायरे भा० २७ देदाभिरति के आदरे, केश्क सपक्रित खासरे; राय भमुख युनि प्रणमीने, आवे निज आवासरे भा० ०८ चहु परिवार जनीं गुर, उपगारी करे विहार; नवि रहे एकण थानिके, रविपरे करे उपमारररे भा० २९॥ श्री जयानेद- ना रामां, भापी साती हाररेः पमयिनय करे सांमखो, आगल बत र- साररे भा० २०॥ स्वरे गाया २०७. = दुहा. पुरोहित मदा पापीओ, कोरोकमे कठोर, आओआपध नदीं असाध्यने, जो होय चद्यन जोर नास्तिकता खडी नही, मजी इवे मदा नाण, ख- प्रप्मय समनाविता, नरपतिने निरवाण नरपति मत्री सानिषे, ध- मे द्रढता धारः; सात मंम भग्र सभा, पृथ्विपति पुर प्यार ॥ड॥ माण िहासने मर्यतो, विशद छत्र घ्र धारः च॑चर शोभित चाम्परे, वेग पहु दरवार ४॥ , -~---@ॐ--~- दाक भी. कलनानी देशी. वातं प्रसंगे व्णेवे, स.धुना गुण नरराय ररुना भावक गुण सोः हामणा, हेड है माय रुरना-॥ अहो जिन श्चासन नग जयो ॥५॥ धन्य युनीश्वर नेनना, ले निरमम निरमाय रना सापे जे परङोकने, निर.

(९६) श्री जया्नंद्‌ केवन्ीनो रास,

वांछक मुनिराय अदो० इयादिंक नूप षचनते, दथिक डंक समान कण छाम्ं पुरोदितने तदा, अवसरे वोरयो अज्ञान छ० अहो° ईद्र जाङ्आआनी परे, व॑चे छोक अपार ङ° ब्हीक दासे परलोकनी, लेनना ने अणगार र० अ० खोक भोखो कुशाद्थी, मोग तजानि आप ङ० विविध तपस्या करावत्ता, मकरो कोड पाप रकु० अ०९॥ एना मानने रेछता, सोढु धरे अभिमान क० पुण्य ने पाप देखावता, फल शुम अश्म अमरान छ० अ० ९० परण जगमां जीवजनथी, तिणे घटे काय ° जीव होए तो सति घटे, प्ररो कुण जाय क० अ० ९१] नेटलं नयणे निरसीए, इईद्रिय गोचर एह छोक एटरो जाणीए, दकपदनी परे तेह क० अ° ९२ साओ पियो ुखथी रमो, समुदय मात्र देह ° कार गयो आवे नदीं, इम निज नारि केह छ० अ० ९६ यतः पिवसादचचाखूरोचने, यदतीतंवरगाजितश्नते; नदि भीरुगतं निवत्ते, सयुदयमाजमिदंकडेवरं. रोक घुस छंडी करी, प्र- भव चछुखनी आश छ० तप करी वे भव हारता, ज॑बूक प्ररे तस पास ॥ख० अ० ९४] मांसपेशी तटे छांदीने, मीन खेवा जिम जाय छ० शद्ध मांस गयो, रमां मीन वाय रु° अ० १९ उभय भूष जंवूक थयो, तिम इहां छी मोग प्रभव आश्ञाए दोडता, उभय चष्ट होय ङोग ॥ख० अ० ९६ कष्ट करे इह रोकमां, परमव आशा चित्त जीव विना प- रभव नही, एतो भोदी अनीति अ० ९७ कणेयुचि सम सांगली, रोहित वयण भृपान ° गोपते रो गंमीर ते, म॑नी शूसडं भाडि॥ अ० ९८ 1 निधावत मंत्री कहै, अनुभव सिद्ध जीव ल० रे मुरख देते नरी, ओलबे फेम अतीव क० अ० ९९ पुत्रनो जन्म शुणी करी, दु- सिओ पण रे एल र० तास मरण वरी सांभटी, घुखमां करिम छे दुख 1 ₹र° अ० २० मातुं युज अंग, खापि पति केम छ० भूष षृ- ध्निपरे भिन्न ए, जीव शरीर नेम ° अ० २९॥ नीव ठरथो कवत, तिणे प्रभव पण जाय ङ० पुण्य पापु एण सहु उरा, घल दुख

शह पले. ` ( १७ ) फल पण धायं र० अ० २२ दानथी देवरोक पापीए, तपथी थाये सिद्ध ° रिसा भमुख जाए नरगमां, शान परषिद्ध कु अ० २९ हेषु गर्भित युगे करी, इत प्रतिहत कर्यो तास ।ङ०॥ छोक सभाए निच्र- ` छीओ, तासे श्यो विन्वास. अ० २४ नरपातिए अपमानीयो, छाज्यो तेह अत्यतं राज सभामां आवे नदीं, ते दिनथी षस घां ति. ° अ० २९५ मंत्रीने सत्कारता, खोक तथानरराय ॥ॐ०॥ सव- ना करता सहु गया, हरली निज निज गय. क० अ० २६॥ श्री जया- नदना रासमां, भासी आदमी ढा ॥छ०॥ पञ्चप्रिजय कटे भविजना, धम धा- उनमाङ. ₹० अदी २७ सवै गाथा २२४॥ दहा समा विसरजी भपरे, स्नान भोजन समार; मोजन करी बहु मां- तिना, साे सवेस्वकारु निय त्रीने नरपति, वितवे धर्मं विचारः सखरो शासन रागीओ, परधाने कर्यो प्यार.॥ कार गयो एम के- टय, नरपतिने एक दिन्न; मादी वेदन मके, अतिदाय ते उत्पन्न ओषध प्रयु उपायते, वैय नव नव कीष्‌; पण उपसमर पामी नही, पाम्यो वहु भसिद्ध ॥२॥ पुरोहित तव पाथर, सांमरीयो ससनेह; एह उपाय जाणे ` अवर, मंन" वधानो मेद

ठाठर मी. इदर आवा आंव्रीरे दसी पुरोहिते तेडावीओरे, नरपति आ्रर आणः मंजादिक उपचारथीरे, बेदनीनी करी हाण घगुणनर कमेना विचि भकार॥ कोयमे कोय उपगार भ्रु० माणि म॑ ने ओषधी तणोरे, महिमा ओधि अपार) राये धणु सतकारिरिभेरि, भूषण विविध भकार घु० गुण जाणे प्रो करधोरे, मोहोय पुरुषं जे होय; आवे निख कवेरीपएरे, तेने वारे कोय |

( ९८ ) श्री जयान॑द केवर्व्मनो रास.

घु जन पण आद्र बहू करेरे, मजा गज भरमाण; धं मिभित नीति कामनारे, बाच छणावे जाण. ॥खु० ९॥ राजानु चित्त रीश्षवेरे, थयो विश्वासी तेह; ते देखी म॑जी केरे, शी संगति करो एद. घु०९०॥ खाः मि च॑ंडार नाल्िकोरे, भूष घुणी रको मौन; कोधे दुडेदधि धम्योरे, दृष्ट सरिखो कोण. चु° १९॥ ब्राह्यण कुल हं उपन्योरे, मुजने कदे चं- डाङः राजमान मद बह करेरे, एह येत्र बाचाल- ९२ दाहापरा भव बहु करथेरे, युजने समा समक्ष; पएपैरो जीवारीओरे, एणे पराभव भः सक्ष श° ९३ जो अपमान सदी ररे, तो युज अथमता थायः मा- नीने पराभव कीरे, भाण समूला जाय. चु ° ९७ यत्तः बरंमाणप- रियिगो॥ नमानपरिखंडनं ॥भाणनाशारक्षणदुश्ख मान्भगादिनेदिने ॥९॥ हीणुं करे रुते नीरे, वृते कीयै भव्य ¦ ते नर कोई रेस नरैर, गणतीमाः सग्यापमन्य सु० ९९ पंक ते मरदे पग थकीरे, परण नवि अगनिने कोषः तेन देखावुं एरनेरे, तेजस्वी नमे सहु कोय. छ० ९६ पराक्रमी मादु करेरे, तोपण चाह तारः घर वारे पण अनरुनेरे, अ्रहण करे निय खास. ° १७ कोर उपाये मरंनिनेरे, करं अनरयनो विचार, रुखमीं भाण जातां छगेरे, उधम सुख दातार घु° ९८ 1 यतः 1 उपाया्तीयेते वादि, वध्येतेतेचदरिदैपी; उपायाद्विरिरुहंष्यः, किमुपायाच्नसिध्यति सोरे छर इवे मंत्निनारे, पण धिते वदी एमः जैने धर्मां नररायनेरे, हं ना- तिक करं केम घु° १९ जैन गुरु पासे नरैर, शीख्यो किरया क- लाप; कपटी भावके यर इवेरे, नुपद्यु करे आलाप ° २० म॑जीनी परे कटयीरे, दाखवे शद्ध आचार; धमे कपटे नृपने उग्थोरे, जिम ते अ- भयक्मार- ° २९ मनी माया जाणतोरे, उबेख्यो नरराय; राज मानी जाणीनेरे, चङे कोई उपाय घु० २२ पर्मदाख नितं उप्‌- दिर, दिच विच कामनी चातः; पुरोहित रायने दीश्वेरे, कपट की सा- जान्‌ 1 छ° २२ धमं राग अत्ति ददिरे, तुरत प्रापनो रागः रग भ- लीनो जिम होयेरे, नहीं तिम मनीनो छाग धु २४॥ काम रगे ₹-

संर पेली. (१९)

-गाईमेरे, षभेराग हरं हाण; मजिठ काजक संगे यथारे, रसण अगर परे , नाण. घु० २५ एक दिन मत्रि घरे गयोरे, कोई कारय वञुसार; आ- सन दान बोरावर्ैरे, बहुं अदर सतकार छ° २६ घर गव्या मिथ्या सिनेरे, करो १३ सतकार श्युं कहिए नृप मान्यनुरे, एतो उचितभकार. प° २७ यदुत गेहागयाणउचियं वसणावडिआणतदसमुद्धरणं॥ दुहिाणद्याएसो सरववेरितम्मजोधम्मो. श्री जयार्नदना रासमाररे, भाखी नवमी दाः पद्मविजय कटे सांभरोरे, शरोता वात रप्राङ. घु° २८ 1 सवे गाथा २६२.

ˆ दुहा. आदु अवद्ध अवदोकतां, निरखी मत्री नार; रति भीति रपे करी, सगुणा द्धी शिरदार. मंत्रीने पन्य मानतो, रमणी देखी पः मोग योग एहने भा, एने अति अनुरूप, २॥ भुज चिता अथवा मिदी, कराये भर्यु्तर्‌ कीधः आग्यो चेर उतावर, समजे कारय सीद्ध. ॥र- गन बङे भूपारने, कटे अनागत कायः राजाने हम रीश्ववी, नित ेसे नरष पाय. विश्वासी वद्रसारने, पृछ रश्च उदारः ओद मुन राज्येअषे, संपूरण कविमुसार. ५॥ "= ह--- डा ९० भी. , कपुर होये अति उजस्ुरे. देरी, पुरोदित कदे तुम राजमारे, गभरय तुरग अपारः कामन अधिक ष- खारणिषरे, पुरुषारथमां साररे पराणीं जृ नुओं कपट विचार दूगेतिलैए दाररे ॥भा०॥ विदां नहीं कोई आधाररे ॥भा०॥ कणी. धर्म . अर्थने साधीएरे, ते एक कापनेकानः; काम साधन भाया कीरे, तेनं तु- मचे राजरे भा० नारि विना निष्फरु सवेरे, राज रीदि परिवारः विस्मव रही लृप बोर भोरे, किम कहे नूढ वाररे भा० रुपवं-

(२० ) भी जयान॑द केवन्ीनो रास.

तने गुणवतीरे, भाहरे छे बहु नारः विभ कहे तुश्च सारिसीर, एहमां नद्य कोई साररे भा० ९॥ नाम सात्रथी श्यं होए, कोद्रव ` पण के आदारः वाकां पण वञ्च थानिकेरे, काचादिक अरुंकाररे. भा० १० प्रण घे- चर पुर दृष्यमेरे, खणं भाणिकने तोः नवि अवे तिम तञ्च प्रियारे, नवि आवे काय सोररे. भा० १९ राय कटै युन नारिथीरे, अधिकी कोण - सरूप; दीठीने बी साभ्रे, जगमां अति अदभूतरे. भरा ९२ विम कहे दीढी बहुरे, अद्भूत रूप निषानः ते आग तज नारीनेरे, तृण परण ,, नदी उपमानरे. भा० १६ तिणे सूपे जीती रमारे, हरि नवि माने ता- सः ते असते थद अथिरतारे, ठखमी एक निवासरे. भा० ९४ इम सांभी तरप बोटीओरे, कोने 3 आधीनः प्रणी के कन्या अरे, भाखो विम भवीणरे. भा० ९९ तव ब्राह्मण करै पापीओरे, यं पूो खा- म; अनुदघ्यमी असम्थनेरे, रडं अनाण्युं कामरे भा० ९६ मुन शक्ते किहं नवि फुरेरे, राय कहे को तेह; इष्ट कामे उमर नदीरे, तेह कषे ससनेहरे भा० ९७ विम के णो खामिनीरे, तन आधीन दयः ` तज भधाननी व्भारे, बष्ठम ते पणुं होयरे भा० ९८ तुज ककर तेहमरि, स्यु प्राक्रमनुं काम; उद्यम फरी वोराबीनिर, सुको अतेउर धा- मरे भा० १९ तुन अनुरूप रूपठेरे, विण निष्फल सर्व, इथगय राज्य तणो किर्योरे, फोकट करयो ग्रे ॥भा०२०॥ यतः स्रीरत्नभातिना खाने, अनेभातिचयो जित, एेभेकेटेमणीषंय, श्राजतेनतुगास्मे॥ शुर अधिक्‌ नवि सहि शेरे, भि अधिक पुन दास; किम सदी की ते केहोरे, छान नआवे तासरे ।भा०२९॥ सामि थकी ओदकरेरे, वेश दा- नने गेह; मोग अधिक शेवक धरेरे, टे 1 वके घरेरे, क्षण क्षण सारे तेदरे भा० २२ नवि पमज्यो जो कदारे, सामि भक्ति नहीं न्याय; तो तस हामिनी य- पहरीर शिका देवी याये भा० २६ राये वचन धुणी विभनारे नाग्यो अंतर काम; पणिते परनारिर्ैरे, भुन प्रचसाण ठा १. भरे भा

२४ ते तो नवि रोपुं कदारे, चारे उचर्‌ तास; अवसरे सविं वनी आ.

एंड प्रेो. (२९)

वरर, बिसरण्यो इुविासरे भा० २५॥ श्री जयानंदना रासमरि, द- समी दार रसाङ; प्रर कहे भता सुणोरे, धन धन भृषार्रे भा० ९६ सवे गाथा. २८८. दुरा. नपरनी अनुमति पामीने, चैय करे चित्त छाय; मैनीश्वर मन ,भा- चतु, तिमा पण पतिष्टाय. ॥सामीवच्छल करे सामु, निमंच्यो नराय; तस परतिनि जीवा तणी, उत्कं पण आय. २॥ ईष्ट॒ वैय उपदेशियु, जाणि चतुरपुजाण; अवनीपति आच्यो तुरत, -त्री घर मडाण. २॥ भोजन सामग्री सरस, भिया सहिते प्रधान; आरंभी आचमनथी, सद्य करे तिम स्नान. ° आसन केनकनां आपीयां, ' पणिना थारु महंत; तन कचोरी र॑गच्युं, आ्णीने अरप॑त. चिश्वासे विनीता विह, पी- रसा आवे पराण; साच भोज्य व्यंजन ससर, वटी घरत अधिक 'वसाण. वीनि संनरी वायसो, आदर कय अपारः भक्ति भावी मङीपर, सतेषे शिरदार. ---@ॐ---~ हाठ९९ मी.

नदी जयुनां के तीर डे दोय प॑सीयारे ३० देशी.

देखी कामिनी दोयक्ते कामने वक्ष थयोरे के का० पुरोहित उपर चन विण्वास ते आषियोरे षिण तोपण गोपी निज आकार भोजन करैर आ० तदगत चित्त भोजन रसं मनमां नवि धरेरे के म० ॥८॥ राव व- ज्ञाभरण भयुखे सत्कारिथारे भ० आच्या निज घर 'रायके चित्त षिकारिया- रे के चि० एकाति एक दिन्न वथुसारने केर ष० ताहरी वात साची कहो कोण सद्हेरेके फो ॥९॥ विमर कै फोण सेवक खामिने ठगेरे पे खा० छावीं मुक उतिखर निम .कोई नवि' चगेरे के जि०' राय कहे किम करिए अकार एदरे अ» परनारी .प्खाण संगे दुरगते जबुरे भं०

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(२२ ) श्री लयानैद केवनीनो रास,

९०] रोक मादि अपवाद भमश बहु वितत भ० कु मछिनता देतु के वात निस्रेरे के वा० वी युन मित्र छभावक स्वामिभक्तो वणर क्‌ खा० धरमैनुं सादाञ्य देवे उपगारी युन तणोरे उ०॥ ९१ विनयीने व्ययी पराक्रमी बुद्धिए आगरोरे के ड° निरदोषीने दष आरोपण न- हि भरोरेआ० वी विश्वासनं घात ते पाप म्होटं कषयुरे के पार पराप मूल प्ररनारि विरुष्ध किम अरे बि” ९२ एह धरणी दुरबद्धि पुरोहित वितर पुण अंतरदृ्ट कटे हवे नृपने कैतेरे फे त॒» बात विचार करो पण नीति नाणो नरि के नी० जे जे रत्न होय निज दशमां ते अर्द्र. के ३० १३ तरुधान्यादिक स्वेना खामि तमे भधर के खा० तन दे- शमां उपनी नारिनो तँ बिभुरे के ना० सथर द्री ताहरी परष्नी तादरेरे के ५० एमां पापएषटोय तो ते शिर माहरेरेके ते०॥१४॥ नारिन आपे केम जो खामिभक्तो होए खा० घुण वरी वात प्र बयरी अति तुं नोपएरे कं अं०ते काठे जाणि्र ह्वणां श्य कटुरे के ह° तेहने सामि भक्तो के किम सदरहुरे 5० ९५॥ मायाबीश्युं भीति तं सरख्ने न- तरि षटेरे फे सं° चितवे तादरो द्रोदके धावक किण सेर के भरा साहाय- कारि तुन एह विश्वास पमाडवारे वि एवा दुज॑न खोक ते निथय क्षा- उवारे के नि° ९६ करश्यो जो विश्वास तो अंते जाणश्योरे के अं० सनि देखाडस्यु प्रगट ताम बखाणश्योरे के ता० सांभखी विस्मय सद्‌ आर्णद राना रेरे आ० किम सय के ूढ पुरोरित घन क्षि पु० ९७ कहे परोदितने करशं वात चित्त धरिरे फे वा० विसरञ्यो इम विर चित्त संशय करीरे फे चि० ॥९८॥ ते दिनथी हवे नरपति संदाय पा- मीरे फे सं° बाम मित्ाह ने तास भियानो कामिभरे भि० खड पेम करे नाश सल्ननतारे पणोरे हंस धं करे पेद तीर नीरन तणोरे सी० ९९ दु्ते शिषठने कष्ट भणी होए सदारे भ० सव्जनने दुरनम दिए प्रण मापदारे $ १० इवे गिरिसंगम नगरे समरवीर नरपते स० एक 'दिन शीमने काज विरोध थयो अवीरे ि०॥२०॥ तै कारण नरवीर राजपु निज

खंड पैरो. (२३) नरे रा० दरवाजे ठेलहारकनुं शोधन करेरे ह° इवे ब्राह्मण अपकार क- रण रभ॑त्री मणीरे क० अवसर जाणि कूट छे ङिति आकणीरे ° ॥२१॥ इवे कोर द्रव्यरादित द्विन द्रव्ये ोभविरेक द्र° नूषटी माया श्रीखवी दक दिर मोरुदीरे फे सोनाना प्ररुच्यार दिए परर्पचथीरे दि° तेपण खणे रेख रेड चार्यो संचथीरे के"चा० >२ गार्मातर जई भाव्यो दरवाजे ते फिरीरे द° दूर देषथी आव्यो बरीर रने भरीरे रोक्यो