भेषठिदिवचन्द्रखर्भाई जेनपुस्तकोदधारे मन्याह्ः.9 वाचनाचार्य-ग्रीद्यार्सिहगणिरिष्य- ` प्राठकधीरूपचन्द्रगणिविरचितं

भ्रसिद्धिकवौ-- जीचणचन्द्‌ साकरचन्द द्वेदी, शरेषठी-देवचन्द्र-ाखमाईै-नैनपुखकोद्धारसंस्याया सतैसनिकमन्री 50 £^ सद्रणस्यानम्‌- निणैयस्ागरयुद्रणास्यम्‌, युव

वि. से. १९९६ वीरात्‌ २४६९ श्चि १८६२ द्वित्वाच्दं १९४० श्रयमंस्करणम्‌ ] प्रव्यः ७षम

मूल्यम्‌ ९] सार्थर्प्यकम्‌

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भौतमीयकरान्य अन्यः

भौतमीयकान्य नामनो काग्यगरन्थ विद्वान जनसमाजनी' समक्ष सजू थाय छ, श्रीजेनशासनना चार प्रकारना जनुयोगोमां, धर्म- कथानुयोगना विपयनी साये द्वन्यानुयोगना विपयनुं प्रतिपादने कए्वाना कारम जा काव्यमन्थ, श्रीनिनकथित सम्यक्‌ श्रुतच्ाननी प्रतिमं परम साधन गणी श॒काय तेम ढे. - सामान्य रीतिये (१) दरव्यानुयोग, (२) गणितादुयोग, , (३) चरणकरणायुयोग यने (४ ) धर्मैकयानुयोग--्ा सुनयना चारे अनुयोगोमां श्रीजिनकथित खग, उपांग अने प्रकीर्णं श्रुतजान संकव्ययेदं 2े, जो पन्याटुयोग आदि यदुयोगो युक इथि परप्परनी तरतमता अवश्य धरवे छे, छतां, ते -सधव्यु प्रस्र एकमेकनी साये एक साकयमां सर्ग संकर खें यंकोडापनोनी , जेम एकांगीमवे जोडा रदेखा ठे. साम्ये द्रव्यनुयोगं दिं

चारे अनुयोग जैनशासनमां मेक्षम्ाछठिन्‌[ सम्यम्‌ -मावेन तरिके एक सरी रीतिये उपाघ्य छे

सीजिनकथित भवचनना सारमून दवादश गीर शणिपिरकना भंगसमः दरन्यानुयोग तेम धर्मकयानुयोगना विषयों सुन्दरतर भत्तिपादन सा अन्यमां कएबामां साच्यं छे. कारणे श्रीजिनकयित्त-

भ्रवचनरसना रसिकः श्रद्धासंपच मन्य आसमामोने साह काव्य अन्यु महत्व ख॒ वधे छे. अन्थरचयिता महापुरस्ये कान्यमय कैढीथी पद्धतिपू्ैक चतरे यनुयोगोना विषयो प्रतिपादन घा ग्न्यमां कडु छे, आथी कोव्य महाकाव्य तरिके भरस्तुत ौतमीयकाव्य अनेरी भात पाड छे.

काव्य के महाकाव्यना सामान्य अभ्यासी या तेमां रस छेनार्‌ सौ को$ सद्दयजनने जा मन्थ सुंदरमां सदर आरुंबनरूप अने तिमद.

आरी बात स्पष्ट छेः काव्य शब्ददचासनी व्युलततिनुं साधनम छंग छे. व्याकरण, को, दिगानुशासननी जम काव्य पण शष्द्‌- याप मंमीरसागरने पार प्रामवा माये सहकारी साहब छे. सादिनी साये पण ॒कान्यने गाढ संबन्ध होवो आवश्यक छे, या आवद्यकतानी इष्टि, प्रस्तुत काव्यग्रन्थ सादिप्यना अलंकारः रस, गुण वगेरे अंग-भलंगोनी सये सविरोप निफासने पामी दाक्यो ठे, एम षदेव यथार्थं छे. मे ध्रीगौतमीयकाव्य पाव्यम्न्थोमां पोता विरिष्ट खान मेव्छवौ शके तेम छे.

भागीरथीना खच्छ ज्यम्राहनी जेम वेतो प्रतिभापरकर्प) परैसरभिक फवित्वरक्ति; जने मनोहर विपयप्रतिपादनदैरीः-- ग्रन्थ- फारना त्रेणे य॒ विश्चि्टयुणोना संगमख्प प्रस्तुतं मोतमीय- काव्य साचे सादिव्य के काव्यरसना पिायु वर्गेने तोप आपी दाकवाने समर्थ छे. विविष छन्दो, जखंकार्ीढ मापा, सर्थ्गमीर` शव्दरो--फाव्य के सादित्यना अन्योनी साये सहन संकव्सयेटी खा बस्तुमो भ्ुत फ़स्यमन्मांयी जापरणने मद्धी रदे ठे,

8

एकद्रे: प्रस्तुत काव्यग्रन्थ, एक सामान्य काव्य नहि, परण महाकाव्य तरिके, विद्वान वरगनी समक्ष भोरखावी श॒काय तेम छे. आने खगे मन्थ प्रयक्ष होवाथी बिरोष विवेचननो सत्र जवकाद ।जोतो नथी. मन्थना भवखोकनथी वस्तु समजी शकवी शक्य ठे.

भ्चरमदरीथेषति स्मण मगवान थीमहावीर पए्रमात्माए, - यपापा- नगरीना महसेनवनमां इन्द्रभूति आदि सगियार्‌ बाद्णोना जीवादि संशयो निराकरण करए वस्ठ॒ प्र्ठत काव्यगरन्थनेो प्रतिपाय निषय ॐ. विविध प्रकारना वर्णेनोथी; पासंगिक अरुंकारोथी; जने अनेक रसोना समन्वयथी; वस्तुने अन्थमां वणैववामां आवी छे. शाक्लीय परिभापामां गणघरवाद तरिके जला विपरय उन्न कमं काव्यकार तपि विशिष्ट केरी युज अन्थकरे जापणौ समक्ष मूक्यो छे

वस्तु, विशेषावस्यक भाष्य; बरृदत्टीका, भावदयकरीका यगेरेमां सूय॒पिकाद्‌ रीतिये स्पष्ट करवामां जवेर छे. परस्तु अन्थमां केवट दिद्यासूचन तरिके गणघरवादनीं वस्तु .रजू यद छे. कान्यना मन्थ तरिके अन्य काव्यग्रन्थोनी जेम जज चनु पु संमान्य अन्धकार पाठकशरी रूपचन्द्रगणि

सौदमीयकाग्यना रचयिता पाठक श्रीरूपचन्द्गणिवर छे, अन्थकार महयपुस्यने अंगेनी विशेष साहिती भसु काव्यमरन्थना पदाखिगत अन्तिम शोको प्रथ जापणने मद्ठी रदे ठे. मन्थकारनो साकार, गच्छ, अन्धर्वनाकारु बरोरे विगतो द्रकमां भा खनव छेः

*निचानारवर खरत-गच्छमा, श्रीमद्‌ शीजिनखम्ूरिना सासन

कार्मा, थीदयारसिह युर मदाराजना दिष्य, अभयं राजवी द्वाराय जणे प्रतिष्ठा मेख्वी छे यने अर्हप्दाखना तत््वरसिक; वदी सराघुससदायमां रामविजयना नामथी प्रसिद्ध॒ श्रील्पचन्द्र -गणिए, वि० सं १८०७ ना मागदारमहिनाना श्धयक्षमां त्रीजने दिक्ते जधपुरनेगरमां कान्यमन्यनी स्वना करी छ.

आथी प्रस्वुत अन्थकारनो स्ताकाठ, पिक्रमना श८मा दत- कनी जन्मनो जने १९मा श्तकनी शतन होवो संभवित छे, अन्थकार्‌ तरिके शरीरूप्चद्रगणिवरनां प्रोड ग्रथनदाक्ति; नेपर्गिक कवित्वगुण; वगेरेना कारणे केट्पी दाकाय छे के श््रस्तुत अन्थ- कारमी अन्य अन्धङ्ृतिजो होवी जण; आने अंगेना विरि्ट के तिश्चयास्मक प्रमाणो भापणने मद्धी रकता नथी, जो कै प्रषवुत कान्यना प्रश्चसिना छोको परथी अन्थकार श्रीरूपचन्द्रगणिवरना गच्छ, स्ताकाट, मन्धरचनानी देश-कारपरिख्धिति विगेरे सामान्य- रीतियि जाणी शकाय छे. ते सिवाय विशेष पेतिदासिक चान्त जु जनुपरव्य रदे टे.

मस्तु अन्थकारना काट्नी साहिव्य-परिखितिने भंगे भाथी विदोष काईैक जागवा जेवुं मठे ढे, ते क्तेन सादित्यनो संक्षिप्न ` तिदस" नामना श्रन्थना संपादक श्रीमोहनयार दटीचद देसरूना चन्दोमां जा सुजव छेः

५५१९मी सद्मा संसत साहित्यमां यहु अन्धो राया नयी, न्ने काद र्चाया छेतेनी्नेमि र्य. संर १८०४मां णोऽ उद्य- "सागस्पूरिए्‌ आात्रपंचाद्निका. स॑ १८०७ां सतरगच्छीय

पेमफीर्वियाखाना शांतिदर्ं-जिनहषै सुखवर्धन अने श्रीदया- “िह-अमयरसिहना शिष्य श्रीरूपचंद्र॒ अपरनाम श्रीरामविजये, भ्रीजिनखमसूरिना राज्ये जोधपुरमां रामसिंहना राज्यमां गोतमीय- महाकाव्य ११ स्गेमां (र्चेखुछे). # # #सं० १८१४ मां "उक्त ख० श्रीरामविजयगणिए, श्रीजिनरामसूरिनी जक्चाथी ५गुंणमाल-परकरण( नी रना करी } प° &७५- घ, पा० ९९३

व्याख्याकार श्रीक्षमाकस्याण

मूरुकारना गंमीर आदायोने स्टमजावनारी प्रष्तुत कान्यमन्थमी

श्रीअभयरसिटना दिष्य तरिकेनो निरदेदा असंगत छे. गौतमीयकाव्यनी प्रदस्िमां मुजब उख छे.

(तच्छिष्याः खुस्वर्दना अपि दुयार्धिदास्वरीयास्था "तच्छिप्योऽभयसिंदनामग्रपतेलैग्धप्रतिषठो मदा. "गंमीराऽऽर्दतशखतत्वरतिकोऽ्टं रूपचं द्राहयः श्ख्यातापरलामराम विजयो गच्छे दत्ताल्यया !

वेद्ध गुणमाला प्रकएणमां पग सुजब स्पष्ट उदेव छेः

शतच्ट्प्यविदितदया द्यादिसिंदाद्यवाचक्र विबुधाः ^तच्रणरेणरजितमौटिरयं समविजयाख्यः

षक्ते उदरेसोथी आ। सस्तु स्प याय छे, फे शरीषूपरचद्पाठक अपरनाम श्रीरामविजयपाटकना गुनौ नाम श्रीदयासिंह े.. ज्यारे अभयसिंह, रानातुँ नान छे. अने चे राजा द्वाराये प्रस्तुत प्रन्यच्मरे तिषठने प्राप्न करी छे. करणे „अत्र ्रस्ुत प्रन्यनी रदाखिमां ते राजाना नामनो निदेश प्रन्यरे कर्यो छे.

युशमाया प्रस्ण भन्य्छर्‌ पाठक शरीरूपचन्द्रगपि अपरनाम परठ्कधी रामथिजयगणिये जेसरमेरमां आनो सुदि दशमीना दिवे र्वयु छे. श्वपंचपर- मेषठीना वेम श्रावङ्नायुणेदुं वभेन मामां करवाम आन्तं छ. विर शं १९८०. मां भाप्रन्यतु प्रतर प्रकरन थयुं ठे, म्न्यनु श्योद्यमाण भाररे ३००० छे.

१५

व्याख्या, के जे श्गौतमीयग्रकादना नामयी रचयेली ॐ, ते प्रकाज्ञ व्यास्याना स्चयिता पाटकशी क्षुमाकल्याणजी गणिवर्‌ 2, प्रस्तुत व्या्यामां व्याल्याकार महापुस्ये जति परिम रने मूखकारना स्गमीर शब्दोने तेम गूढ भावोने खूब सरद ने मनोरम पद्धतिपू्येक स्पष्ट करेर 2. साचे धौतमीय- काव्यनी श्युयत्तिना मार्गमां, जा व्याख्या स॒न्दरतर प्रकाशने पाथरे छे. कारणे प्रस्तुत व्याल्यालुं श्रकाशच समिधान वाखनिक ठे,

भ्याट्याकारे, मूठ कान्यमन्थना अम्यासक वगैना उपकारनी इष्टये प्रस्तुत व्याल्यामां, मूलकारना आयने स्पष्ट करवानी खव काक्रजी रीषी छे. साये मूरश्ठोकोना शव्दोने स्हमजाववा भाटे, स्याकरणना सूत्रो समाम मूक्या छे. तेम॒शीभमिधान-चिन्ता- मणि जादि कोञचोनी सादी परण अवसरे अवसरे रांकी छे, भा भ्रकारनी विरि्टताना योगे प्रष्ठुत प्रकाश व्यास्या, काव्यना विषयनुं ज्ञान मेकववा इच्छनार जम्यासक वगैना; व्याकरण तेम कोश वेरेना गनो विकास करे. रीतिये द्रेक दिये भल्वुत व्याख्या, सम्यासी के विद्वान सै केर्ल कर्षण करी दके तेवी ढे, अने व्यार्याकारनी समर्थं विद्धा; मोद अनुमव- दीखता; तथा अनुपम चिवेचनाशक्ति; वगेरे सूचित करे टे,

व्याल्याकार्‌ पाठकश्री क्षुमाकस्याणजीना स्ताकारु यशर जीभनवृतने अंगे, प्रस्तुत प्रकाश व्याल्यानी प्रशल्िमां व्याख्याकारे खये फररः उठे परथी केट्ठंक जाणधा जेदु मापणने मनी रदे छेः जाविपेना विशेष येतिषगरतनी नेय, क्षैन सादिन संक्ष् इत्रिदामण्मां चा सुज ष्टे

8114949 ४८५१८८५ ५, "४८

धा ( १९्मा ) श्तकमां खरतरगच्छना शरीश्षमाकल्याग उपा- ध्याय थया के ञे खरतरगच्छीय श्रीजिनखमद्यरिना शिप्य असत. ^धर्मना चिप्य हता. तेमणे सं० १८२९यी १८६९ना गाप्मां “अनेक अन्थोना दोहनरूपे सादी मापामां विचरण करेल छे. तेमना पमरन्थो आं छे: श्रीगोतमीयकान्य व्याख्या, सं० १८२०ां ५खरतरगच्छ पडवरी, सं° १८२यमां चातुर्मासिक-दोरिका भादि

जिनल्रभसूिना शिष्य नदि, पण जिनलाभसुरिना यव श्रीजिनभक्ति- सूरिना शिष्य भरीतिसागरना सिप्य अमरूतघर्म हता. छम उपाध्याय क्षमाकल्याणजी नी-खटृत खरतरगच्टपट्वटीपद्यसि--

` श्रीजिनमचतिसूरि

जिनखामसूरि ओतिसागर्‌ श्रीयतधरमं

उपा° क्षमाकत्याण प्रीजिनभक्तिख्रीन्द्-[ख]चिप्या बुद्धिवारदेयः 1 ग्रीतिखागरनामानस्तच्छिप्या याचक्तोत्तमाः?? २॥, “श्रीमन्तो ऽमुतधर्माख्यास्तेषां शिष्येण धीमता छमाकल्याणुनिनः, ध्ुदिसम्पचिल्िद्धये"” 2

1 1 < तोर ये “संवत्सरे व्योमलृ्तडसिद्धि-कषोभीमिते फाल्गुनमासि रज्ये विदयुदधपक्षे लिद्धिता नवम्यां, गुरस्वुतिर्जणिगडे नवाऽखो॥४॥

4 [ १८३०]. खसतरगच्छ-पद्मवडी-संप्रद, बाबू पूरणवंदनी नादरयाखी, सने १९५६२ नी छपेटी पातुं ३९,

५४

व्दुदपरयैकथा, सं० १८३९ जेसरमेरमां यद्ोधरचरित, ५५१८४४७ मकषुदानादमां सुक्तसुक्तावरीदृचचि, सं० १८५०मां <्वौकानेरमां जीववरिचार्‌ पर वृति".

भसं० १८५१ परशनोचर सार्ध्यतक, सं° ८०षमां तर्कसंग्रह धफुक्रिका, सं० १८५०ां जेर्मेरमां अक्षयतृतीया अने प्रुपण ५अछदिक व्याख्यान, जने ते वर्मा वीकानेरमां मेर्तरमोदरी व्याख्या अने सं० १८६९ (्री)श्ीपालचरित्रन्याल्या योनेर्‌ ष. ते मरसामां योजायेला तेमना जन्य अन्यो नमि परमसमयसार- ५विचारसंग्रह, विचारदातकवीजकः? समरादित्यचरित, सुक्तरला- ५वृङीवृक्ति सदि 2. > 1: >

<मापासाहित्यमां तेमणे जूनी मूजरातीमां गद्रूपे शावकनिधि- ध्परकादा नामने ग्रन्थ गुथ्यो छे. ख° श्रीक्षमाकस्यणे सं० १८३८- “मां पाकषिकादि पडिकमणविधि गचमां संग्रहित करी तथा प्रशचोत्तर- ५साधेशतक मापामां च्यु".

ए० ६७६-८०; पा० ९९४२९९९;

प्रस्तुत संपादन अने प्रकारान :

जा मौतमीयमहाकान्य व्याख्यासहित, माने प्रथम वार प्रसिद्ध याय छे. जत्यार भगा कादीनी पुलक प्रकाशन संखा दारा जा कृव्यमरन्य केवर मूट्मात्रस्ये भ्रकारानने पाम्यो हतो, उ्यारे शरी देवचंद सारमाई॑ जैन पुसकोद्ारं «ड संखा मारफते तिये प्लुत कावयमन्य व्याख्यासदित प्रसिद्धिने पामे चे.

न्प चुविविजिनयैसदनो तेमधे यक्त मापामां स्वय च, जे ईड प्रचदधितछ.

शदे

कौर्पण पुत्तकपकादाकसंखा के व्यकिना भरकारनकार्यनी से, ते ते पुलकोना संपादकना संपादनकार्यनो पण संबन्ध संक व्यये र्दे छ, प्रस्तुत पुस्कनां भरकादानकार्यनी साये संपा्दक- तरिके संपादनकार्यमां मारो संबन्ध जा मुजव संकव्ययोः-- . `

भात्रा ( बि० स॑० १९९५ )नु॑ जपाढ चातुमीस, प° प्र- मगुर्देवोनी शाक्ञा युजव शंवई रखाखाग-मूलेशर खाति थय, ते अवसरे पूज्यपाद परममाननीय चाचार्थदेव श्रीमद्‌ पिजयक्षमा- भद्र दररि महाराजनी हिवद सूचनाथी पुखकना संपाद्मका्मेमां मँ मेदनत ठीषी

जा प्रसंगे एक स्पष्टता करी दं. सं्रदनकरर्यने चंगन ' मने तैवा प्रकारो खास अनुभव नथी. कारणे, आवा अन्यो संपदनकार्यं मारे माटे सा विपयनी नवी श्रूमात गणी रकाय.

हं जाणु दु; कोुप्ण अन्थनुं संपादन के संशोधन वरेन करय, जगत्यनी जुवाबदारी में गणाय डे. अति सावधानी; अघुक भदेनत्त; थने सर्वत्ोयुखी बहुश्रुता यगेरेना सुन्दर सद्‌- कारना योगे अन्थनुं संपादनकाय सफ यने संतोपम्रद यनी के

जो के पस्बुत काव्यगन्नुं संपादनकार्य, , या उच्तर सिति परदोषी शक्युं होय समाग्य

छतां भ्रस्त संपादनकार्य, जे विद्वान जनसमाजने संवोषी शके ते रीतिये ययु छे, तेना जादिक्रण तरि पूजनीय शान्रर्वि

समथ विदान आचायेदेव श्रीमदू विनयक्षमामदरपरी्रनी मह्न छे. देखओशीतमे वि्ार -खनुमव, प्रद प्रतिमा यने

१४

सास तकेदारी जणेयना हुमेडे मार दाये रीतिनुं संमादन- कार्यं शक्य छे,

` सर्यतयाद अन्थना संपादनने अंगे, दखटिवित ग्रेसकोषिी- योनो आश्रय ठेवायो छे. प्रे्केपीयो संखाना खवैतनीक मंत्री जीवणर्चद साकर्च॑दं शवेरी दाराये मने भाप इती ते, तेम सस्यार गाड कारीथी प्रकारित्त थयेर मूल्समन्थ पण साना संदोधननी वे्रये नजर समक्ष राखवामां अव्यो हतो. आत्णेय ग्रतिज सामान्य रीतिये अर्थं छद जेवी दती, कारणे मदैनत उ, वस्तुसंकटनाने स्क्यगत करी यथामति परिमार्जन करवामां म्य र. चामं व्यं ज्यां संशय जुं य, घों कष वगेरे मूफीने असुक सूचन क्यु छे. काशीना मुद्रित पुखकमांनी केटरीकं स्छस्नाओ, संदिग्वताभो वगेरेनो निर्देश अत्र कामां आन्य छे. मवसंरे आवद्यकं रीष्पणी एण कटवामां यावी छे. कैटटीक रीपपणीञ मूठ प्रतिमां हती ते पण मूकवामां वीरे,

`` प्रकारना संपादन पटी, श्रेष्ठी देवर्चदं लारभाई तैन पुसको- दधार फंड संखाद्रारा प्रस्तुते ोतमीय-काव्यम्रन्य व्याल्यास्हित अरकादानने पामे छे. प्रकायननी यार्ड; येष्ठी दे० खण ञैन पु० प° संखाना प्राणमूत्‌ व्यवखापक मनी शवेरी जीवणर्चदं साफरचंदनी मूगी व्यवसा, यथाकति आपमोग, यने संखाना शरकानकार्यने जाग वधारवानी काजी; तरणे वह्ुमोनो मे कारणमूद छे. घा कारणे प्रकायन घा रीतिये विद्वान अनेछपान समक्ष रज्‌ याष.

मारा पूजनीय परमोपकारी परमशासनप्रमावक परमगुर्देबोना अमेय उपकारने हं अवसरे याद करं छं, के जेजओनी असीम कृपा्िना योगे हुं रलत्रयीनी आराधना यथाशक्ति करी शतु छु. भ्स्ठत संपादनकाथेमां मने पूरणी हितमावथी माम॑दर्दन आपनार्‌ पूजनीय शासनपमावक आचार्यदेव श्रीमद्‌ विजयक्षुमामद्रषरी- श्वरजी महाएजजीना वात्सस्यमाकने हुं केम मूढी शकु

भ्रान्तेः परेसदोप, ्रुफखुधारणानो दोष के अन्य अन्ञानताजन्य स्वरना अन्थमां रदेवा- पामी होय तेवं परिमार्जन करवापूैक विद्वान जने भभ्यासी वै काव्य्रन्थनुं जध्ययन-ध्यापन करी, श्रीजिनकथित श्युतधर्मनी आराधनामां पोतारँ वीर्यं फोरो अने आसक्रल्याणने साधो ए. जभिरपा.

वि० १९९६, ¬] पूज परमशासनपमावक आचार्यैदेव श्रीमद्‌ श्रवण शा पूरगिमा, { , विजयरामचन्द्रहूरि-विनेयाणु `

जेनशछा-ठेकरी, स्यंभनतीे.[ खंमात्‌.| . सुनि कनकविजय

ओढ देयर्चद खाखभाई जैनपुस्तकोद्धार फंडना कार्यकसे

यूस्दी्मडल

(१) भंद्धमाई साकरचंद्‌ वेर

(२) नेमर्चद अभेर्चद जे, षी,

(३) नेमच॑द गुखावच॑द देवर्च॑द्‌

(४) हीरामाई मंमाई श्षवेरी

८५) साकएचंद खुशारचंद श्षवेरी

उवैतनिक मेती जीवणर्चद साकरच॑द प्वेरी.

-प्रस्तावनाः~

मन्याम्मोरहवोधने दिनकरिद्यस्मा मूले मोदान्तानतमोमरं वियटयन्‌ यो धर्मराज्यं व्यवात्‌ यश्ाद्वाय निनाय जन्तुनिकरं खगीपवगीखयं शीवीरजिनेश्वरो मवतु धै सद्वस्य टि प्रिसे -मारतीय-तादिल्यम्‌-

मङृतकाव्यविपये प्रााविकं क्रि्ियावेत्निवेदयामि ततः पू मारत्तीयसादित्यख खरूपाऽनिवेदने क्रिट भ्रकृतसंदमैयुद्धिरमवेदिति परादित्यखास सरूपो निवेदयामि --

मारतीयं फिर सादिव्यं विश्वप्ताहिव्यम्‌ यादव सादित्यात्वु- दरदृरबतिप्वपि देदोपु-- अन्यान्यमापामयानि सादियानि कुत्रचि- जननमवापुः, कुत्रचिच्चातमनः संस्कारमकार्पुः दृान्तद्टपेण यृदताम्‌-- आयीवर्त ए्वाविर्मूत्ादू वीद्धसप्रदायात्‌ कर्ठिश्चन समये तेते मन्थाः प्रदुर्मूताः, यदि केवरं मारतवयं एव यपि तु समुद्रपरमारविप्वपि देरोषु टोकानां दये खीयः परमाव प्रतिष्ठ पिततः येषां प्रमाचेणानुप्राणिताः सिंदस्र्म-बीन-जयप्राणदेीया वौद्राः मलकषमेव नः प्रमाणम्‌

न॒ केवस्मेतावदेव, मारतीयसारलतमाण्डागारखाटीकिकरत्- च्छरया प्ररोभितददया निर्िमेषीकृतनेतरद्धयाश्च जन्यान्यदेदया विद्वांसः सुमहता परिथमेण मारतवरपे समागत्य त्रान्‌ मन्थान्‌ ठिरिखः 1 उन्नयेम्यः पण्डितेभ्यशथ परित्वा खलमायायां ठन्‌. यन्था-

१८

नन्यवादिषुः सुप्रसिद्धं किर चीनदेदीययान्रिणां बुएटत्ांग-'इत्सांग- ्रभत्ीनां मारतयात्रावणेनम्‌ यत्र हि ते समागत्य मारतीयं सादिलं महता ओोरेण खभापार्या निन्युः एतदर्थे कियान्‌ प्रिधमः सोदसतैः, कियती दूरयात्रा चाऽनुमूता, कियन्तः पण्डिताश्च सप्रयोजनसिष्यर्थसुपासिगसैः, इत्यायध्यवसायलेपां यात्रावर्णने इस प्ैतिदासिकानाम्‌ फठमिदं तस्य संपत्‌ -- जार्यावतीदू नैौद्धसादिले बिख्य॑ गतेऽपि तत्संबन्धिनो वहवो अन्थाश्चीनमपर- याऽनूदधिताः साभरसे चीनदेदो समुपरुभ्यन्ते नैरत्‌ किरु मारतीयानां खसादिव्यकीतिकीर्तनं खसखजल्ितम्‌; जपि तु ददयुगख सुम थिताः प्रामाणिकाः सादिलयानुरागिणः गश्चाच्यदे्चीया एवं तरेषु सादित्यविवरणपुप्तकेु वं सडिण्डिमपोषसुद्ध)ोपयन्ति एवं सति भारतीयपरादिलयेन चीनसाहि्य्य कखचिदंशसख जननं संपादि- समिति किं वङ्ु शक्यते सेवं मारतीयं साहिल विश्वप्ताहित्यमिति फं साधयितु प्रमवेम £ पाश्चास्यदेदीयेरसत्साहित्यादरैनशासाणां न्याय तक )शाखख उयौतिषादिविपयाणां खमभापायां चतंमानसमय एव समावेशः छतो यदि साप्रतिका उमयमापाविद्धासः प्लक्षं परिजनते च्वारिशद्व्म्यः पूर तकौदिविपयपाठमाय नासन्‌ समुचितः समपेक्षिताश्च भरन्था ईग्किशमापायाम्‌) परं सपरत 'लजिक्‌ (०) त्रि्रयस्य शय्यकरमः ( ०८५७०) सतप्ररूपेण नियमित

1 ^ “शपा (ाकथाहटह वृदरल्‌ड दा काचा पपत 1890, धात 8180 धऽ रिल्त्ण 8 छएपवतापड 7०1९8 79 [002 एक्‌ 488.

९९

सखेरारममापायाम्‌ 1 किं नेदं मास्तीयसादित्यादपरसादित्यख सं्करणं नाम £ यपि च--ससुद्रपरपाखर्वियु देदोषु यलत्ता- दि्ये,पजीवनेऽपि किं मारतीये सद्यं विधत्ाहिलयमिति नासाः भिदं शवयेत ? -चंनसंप्रदायः, तस्सादहिदयंच- कारणमस्येदमेव - यदत्र साहित्यपचारक्रा मदापुरुगरसथा प्रमाव- द्ाछिनः सममून्‌ येषामनुमावात्‌ सादिलयमेव क्रिम्‌, समम्रो देय एव स्यतः प्रमावाक्रान्तः सममवत्‌ सकख्नगति प्र यःप्रचाराय परितो घोपिवडिण्डिमो हि वैनतंभदाय प्व शृतम्‌, भत्र हि ततचाटश्ा महापुल्पाः परादुरारन्‌ येपाुपदेयाश्चरिवामि जनताया टये मत्रस्ेव ममावसत्पादयामासुः येन किङ मनीषिणा पश्चपाव- {त्ज्य तेषायुपदेदः शद्धयाऽश्रद्वया वा परिगरदीवसे वसदि वरनुगामिनेो ब्रमूनुः, शद्धानेन ठानू नियमान्‌ खीचक्रुः र्यावतंस् कोणकरोणे साैतसंमदायस तिजयदुन्दुभिः क्लिश्वन प्ले यत्समन्तान्युखरिठो वमू तस्य किं नायं स्पष्टो शवु्चख पमैख साहित्ये तादयी दकिरासीत्‌, यत्‌ मार्मिकननताया द्ये अञ्ुण्मं पमावं प्रसफुरसुलादयामास्र £ यवदयं शरोतरहदयवदीकारे उपदे भाघ्यासिकं चलम्‌, चाखव्यसंपत्‌, सत्यं श्रद्धानं ने्यादिकं कारणम्‌ , किंतु एवविर्मदयापुस्पैः प्रचारितं सादित्यमपि उाद्श्मेव भरमाव्राछि मवति यल हि दयतो मनै छते मनन- कुरन्तःकरणे अवयं थद्धानलोदयो मवेत्‌ 1 अनघर्मेण अद्वानानां चिवमाघ्ये ते ते मन्याखे सै उपदे्ाच्ानि तानि सायनानि संपादितयनि येषां प्रमावो केवरं मास्ते एव,

२०

जपि तु मारतदूरवर्वदैदेष्वपि कदाचित्वैरं पराचरत्‌ ! देश-कार- शासकादिमदिन्ना सांप्रतं यचपि विपरीता परियितिस्तथापि मारतेऽसिन्‌ जन्यान्ययमीपेक्षया जैनधर्मख् कियान्‌ भसारः, क्रयद्‌ रवम्‌, तदुयायिषु क्रियत्‌ शरदधानमिति वरणनविल्तरमर्ैति ! स्थूटरूपेणेव गृतताम्‌-- यद्‌ व्यावहारिककारकत्रेप्येव जेनयमौलु- यायिनां कियान्‌. मागः कीररेव्य प्रमावो नाम

जस्तु, कारणमेतस्य प्रमावश्ाछिनः साहित्यस्य प्रचारणमेव सर्वोपरिगम्‌ यख हि धर्मस सिद्धान्तो निरदु्टो वरीवर्ति, साहिल सं भरमाक्संपननं मवति, एव धर्मः प्रसरति, ठेोकेयु श्रद्धानं कमते, चिरकालं च॒ लेकाल्ये विरति नैनसादिवि इमे गुणाः सुस्पष्टं प्रमाणिता भवन्ति एतदर्थं ममाणान्येपणख परिश्रमः सोदव्यो भयेत्‌ भवयक्षमिदमेव श्रमाणमल्ि यदसहयेषु वर्थेयु व्यतीतेषु, तलमचारकेषु दासेषु नषु, प्रयुतं विपरी त- धमानुयायिषु दासकेषु वर्तमानेषु, किं देरो किं काले पत्रि स्थतरैव विपरीरपरिखिताुपखितायामपि सपरत जैनधर्मः वैरं बिद्रति, मोदते अन्यान्यधमपिक्षया चहुं यट्शाठी फिं नासय कारण- मिदम्‌, यदेतस्य सायं प्रसुरं॑प्रभावशारीति £ यासन- सत्तायां उश्चायाममि यत्कस्चिन्मतल्य प्ररितः प्रचारो द्यते तत्र तदीयं सादित्यमेव कारणमूतम्‌ सादिव्यं हि य्यतीतेष्वप्यनन्तववेषु अश्चुण्णवरमिषे सर्वतः खपमावं प्रसारयति

-जैनकाव्यानि-

सादिव्यपदेन "ङिररेचर (1६5५८१००) पदवाच्ये तदीयं वाव्य-

यम्‌ ( टेखतष्ठावः, प्रन्थसमूहो वा ) गृष्ते } साहिद्ये यथा

२१

नियम्रन्थाः पुराणानि सूत्ग्रन्थसङ्खातो न्यायःव्याकरणादिप्रमाण- अन्धाश्च परिगरहन्ते तथा काव्या्यप्यतरवान्तमैवन्ति मर्मविचारे ठु -- पधाने खानमधिवुर्वन्ति रोकानुरञ्चको रमणीयोऽ्थः, तदु- ऋः कणेखलदाः शब्दाश्येतससद्वातात्मकं टि कान्यं भल्यायते काव्ये हि खभाधु्णर विद्रोहिणमपि जनमारमवद करोति खिन्न मपि दर्यं प्रसादयति, प्रतिकररप्यतुकूलमापाद्यति 1 धर्मख तस्तिद्वाम्तानां प्रचारे कठिनकठिनाः परमाणग्रन्था वाद्अन्थाश्च कदाचिन्न प्रभवन्ति 1 तेषां हि राक्तिसद्रहणसामर्थ्यशारिपु बिद्र- ससेव परिजृम्भते विद्वांसश्च खखमते ददामहाठिनो मन्ति ! खत एव॒ तेषं ॑पुरतः खधर्मबिवादसखोपखापनेन तावत्‌ परमीक्षते ; ये बु सामान्यमोधशालिनो भवन्ति, येपां दयं जिक्ञासा- परवद भवति, ज्नाभेष्रिपासा येषां ददम जागि, किनि निपथे येपां संशयो दुदेति, कमपि विषयं जातुं कौतुकं वा भेपां भवति ते हि मा्भिकरूपेण योविताः खरपायातेनैव 'व्व्यविपरय गन्ति यदि वक्तव्यविषयः सत्यः प्रमावशाी भवति तर्हि सर्ेदाऽ्ै ते तदलुयायिनोऽपि मवन्ति एदविधानामधिकारिणां बोधाय “कान्य्‌ एव सर्वतो ठन्यसाफस्यम्‌ छिष्टम्‌ अमनोनीत- मपि गुडजिष्दिकारूपेण अरहीतुमेव कान्य जन्म , काव्यं हि. भोदु्ष्दयम्‌ नुरञ्ननपूैकं सवशे छता ततस्तदनन्तरं लोपदेशः तसन्‌ संचरति "। एतदेव अमेयानाममिुखीकरणं { नाम ' अप्तु नाम नायं भरिषयो बिसतरमरईति ५. मेनसपदायस्य साहित्यं तत्रापि काव्यदिभागो न॒ कश्व-.

र्र्‌

चिदपि संप्रदाय साहित्याभ्यूनतां स्ति, जेनविद्ठद्धिरमेकानि गच्-पयकाव्यानि भ्रकटितान्यद्यावधि येषां हि प्रमावच्छन्ना केवरं जेनधमीनुयायिन एव, अपि तु अन्यान्यधर्मग्राहिखा अषि कान्यमाधुर्यग्धाकेषु समरसं प्रवर्तमाना हश्यन्ते भरत्यक्षं प्रगणमि- दमेव यत्‌ शेव-वैष्णवधमीमरहिमिरपि यिद्वद्विरातपुलकमालाघ जैन काव्यानि परमादरेण संगृहीतानि, यपि जैनपुलकमारामु शैवादीनां काव्यानि कदाचित्छष्टानि शव्यं मिर्णेयसाग्रयघ्रारयेन चहोः कालासपूरै या (“काव्यमाला' नाप्नी अन्थमारा (5०१९७) मरकाश्चिता यस्या हि पारेभको महामहोपाध्यायः १. श्रीदुगीमसाद- दामीऽमूत्‌ एतस्याश्च पुकमाखयाः संसृतसाहित्योपरि यनपाकर- णीयमूणम्‌ 1 यतो हि कान्यमाखयां तक्चादशानि पुस्तकानि म्रकाि-~ तानि येर्विना सं्ृतसादित्यमन्दिरस मूयानंशः शत्य एवासीत्‌ कव्यमासप्रकाद्नात्‌ पूरं प्रायः प्च मदाकाव्यान्येव विद्वसो जानन्ति किन्त्वनया पुस्तकमाल्या मरङ्कार-नाय्य-नारक- कान्यादीनां ते ते अन्थाः प्रकारिता यान्‌ दृष्टा समग्रं साहि्यजगत्‌ चमत्कृतमभूत्‌ , येश्च संस्छतसाहित्यमिदं याव एव दोभाशालि संवृतम्‌

एतस्याः काय्यमाखया मूयानंो जैनविदुपां केखनीप्रसूतः 1 श्रीती्ङ्कस्वरितानि चन्दरममचरित~-नेमिदूत ~ नेमिनिर्वाणादिका- स्यनेकानि यथा म्रकटितानि तथा धर्मशर्मम्बुदयादीन्यपि भकादं नीतानि ` 1 साक्ात्खोत्रमन्थानां शीमक्तामरस्तोत्रदीनां घु मिव एयगेका प्रकाशिता येषां कृते तस्या एको 'गुच्छक -एवे प्रथं निमुम्फनीयोऽमवद्‌ | एवमेव गब्रकान्यानि यशखिल्कवेम्पू ~ तिर्क-

र्ट्‌

मज्ञरीभरमृतीन्यपि काग्यमादयां परकादिवानि नेनपण्डिवानां साद- सत्यैमवसूचकानि 1 पएमिः कब्थिसोकानुरञनपूर्वकं धर्मशदयान- प्रचारस्य ेनसिदधान्तप्रकाशनस्य कार्यं ` करिमायीवर्ते कृतम्‌ ? प्रक्ष भमाणमिदमेव -यत्‌ कान्यमाखा विना जनका्यरपर्ैवा- अनिष्यत्‌ खयापि त्तेषां कान्यानां प्ररोसका न्यान्ययर्मनिष्ठा अपि काव्यमासवाचका विद्वांसो बहुः श्रूयन्ते इदमेव हि काव्यनिमाणस्य मन्ये साफर्यं नाम

-आओमौतमीयकान्यम्‌-

कृतमिदं कान्यमनेनैबोदेश्येय जनसारखतमाण्डागारे रलमिव चमचुरते 1 ओेनसंभदायं भति मरमेयानुन्युलीश्ग्‌ , यर्दिसा-दया- त्रतातुगाभिनां शद्धानं दीकर्ुमेव च॒ कविगगनचनदरेण श्रीमवा माटकेन रूपचनद्रेण तदिदं काच्युपनिवद्धम्‌ नामतच््रदिदं काव्यम्‌ तु जैनसंप्रदायरदस्ययोघने प्रमाणमन्या वददेगरन्था वा यावन परमयन्ति उतोऽप्यधिकमिदं चनुदारीरं मदाकान्यं॑सिद्धान्ववोधने सम्थनूः ममवति खत पतैतदरथकृते समोधं साधनम्‌, वाचकलोका- नाममिगुखीकरणाय सरफरमुपकरणम्‌, ` सार्ेतमतपरचारणाय म॒रवेतः प्रमावदरालि शसं नाम

पतसिन्‌ `, हि योतृणां मनोरल्ननाय ॒पूरयुपवनयोमाब्भे- नम्‌ पद्कलुवर्णनम्‌, समवसरणसुपमावर्भनम्‌ 'पवदादिका विषया; प्रगुम्किाः कनिना तयनन्ठरं चु साङ्दुदेदयमेव ( अथर्‌ नसिद्धान्तवणेनम्‌ > उपकान्वं मवति 1 काम्यगगनरवेः भरीस्पचन््रकवेः कविठानिगुम्प्नपाखं तथा तिद्ते येन दि

२४

छचि्टोऽपि विषयो नीरसोऽपि वर्ण्यो छेकानां हृदयावर्जनक्षमो मवति कसचन संप्रदायख पभमेयवर्णनं सिद्धान्तयरिखायनं वा किर मनोरञ्चककथेव शोकानां हदयहरणे भमवेदिति जानन्ति सर्येऽपि किंतु श्रीमतो रूपचन्द्रगणेः कवितनैपुण्येन छष्कापि सेयं तिद्धान्तव्णनाऽऽरमदी तथा संवृ्ठा यथा मनोयोगेन वाचवि- तुरन्तःकरणमवद्यं तदमुगामि मवति अयमेव कवेः कवितायाश्च प्रमायो नाम एतेनैव हि कान्यख साफर्यं परीक्षितं भवति परमेयानाुपदेशोयेव हि कान्यानामुत्प्िः ¦ यत उक्तम्‌ -- “कार्यं यदासेऽरथकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये सयः परमिरैतये कान्तासंमिततयोपदेदायुजे'" इति ततश्च श्रोतारो मनोरनपूर्यकं वक्तव्यनिषयानुगामिनश्चेत्‌ संपन्ते तर्हिं , सुस्पष्टमिद सफरं काव्यं नाम -कान्यय वर्णनाशैली- चतु-उपवनादिवर्णने ठु कवेर्भुरा रचनाऽस्येव, परं सिद्धान्त- तच््चवोधनेऽपि सैव कवेः शठी एकान्तमावेन भ्रचरुतीति महदेव भीरं कवयिदुः दद्यताग्‌-- गौतम नदरमूतेः) संरयनिवाः रणपूर्ैकं चारित्रपवेद्याय यदिदं मगवतः प्रकथनयुपनिबद्धं तख प्रारम्भे, -- “यदं संशयच्छेद सर्वत्रं मां प्रतीहि तव्‌ ।* श्यरभ्य ( धर १४०१ छो° १४९ ) सप्तमसगैखान्तपर्यन्तमति* गहनो विषयो वर्रितोऽलि त्र हि यासपदसख साधनं छतम्‌ पाश्चात्या त्मिका जातमपदाै नाऽधुनापि मन्यन्ते बहवः किचित्‌ किश्चिन्मत्वापि मन्यन्त एव.। वदव्सवु --यु्या बोढुं

२५

शक्यत इति निरस्ता सवन्ति एववियगहनस्याप्यारमनिपषयस कव्येऽक्चिखथा वर्णनम्‌ , आत्मन्या सिद्धिः छता द्रीददयते यथा काल्यवोधशक्तिारी जनो निःसंशयं उत्त्मोधने क्षमेत षीरेण मावता गौतमस्य हदयगतः संखयः खमदिन्ना परिन्रातः जरीद्‌ गओौत्तमस्य हदये वेदवाक्यततत्वानयेवोधाच्‌ संदेहः तस हि खयाखा- यारमातमनः सायनं निःसन्देहतया हदि खिरीभवति यतो हि आसमन्ञाने प्रत्यक्षं भमाणं मविवुमर्हेति ! पाद कविः -- ˆ ^प्रलयक्रेण परमाथेन मद्वु नेव शक्यते ! इन्दरियम्राघ्चताभावाचसान्नालि खपुप्पवत्‌ १८

एवमनुमानमपि तत्र प्रमाणं प्रमवति | यथा--

छृानेधूमवलिक्ग करिमप्यस्य रम्यते यरसंबन्येन जीयोऽयमदटोऽप्यनुमीयते १९ सलुमानं 'हि हिद्ेन ( देना ) लिग्गिनः ( साध्य ) संबन्धे सति (यथा धूमस्य यदहिना सह कार्यकारणमावसंबन्ये सति ) पष्यति तथा लासनः विद्धं द्दयते येनाऽनुमानं मेद्‌ ननु चेतना भातमनो छिङ्गम्‌ हि आतमानं तिना चैतन्यमव- तिष्टते। अत्त एव चैतन्येन रिक्िन जातनोऽमुमानं खादिति पूवपक्षमपि निरति कविः-- जस्तु वा चेतना रिदं संबन्यस्त्नयाऽल् 1 प्रत्यक्षो नेक्षितः कापि भाक्‌, तदः कानुमेयता १॥ २० एवंभकारेण -- अनुमानसुपमानं शब्दादिकं सवेमपि भमाणजात- भालमनः साकषात्ताप्रथै निरखति भीमदययीरो मगान्‌ फं बहुना

२६

इ्द्ररूपं वेदाए्यं प्रमाणमपि यद्र गौतम ह्ये जागर्ति तदपि मगवता निरखते ! यथा -- % प्रस्परवियेधिन्यागमानामपि भारती बृहस्पतिर्हि मूतातिरिक्तं जीवं मन्यते २६० (प्र० १४८) . एवं किर आतमनः साधनाय ये ये उपायाः प्रसिद्धा आंखे सर्वेऽपि "निरस्ता तत्रभवता वीरभगवता समाधानाय अप्रमवन्‌ महाविद्वानपि मोतमधित्रीयते स, -- श्रुतेति मगवद्वक्यं गौतमोऽन्तश्वमक्छतः } अहो! सर्वे एषोऽस्तु दष्याचिति विद्युदधधीः २६१ (प्र« २५३) एवं प्रमाणवले गर्वितस्यापि गोतमख सर्वमपि ज्ञानबरं निरस सुकतिमिरातमपदा्थख साधनं शिक्षयति ओीवीते भगवान्‌.-- ^ सुखदुःखे खसंवेये प्रत्यक्षे मवतो यदि शृणु गौतम ! संदेदविज्ञानं किं तया हि ४१ विज्ञानमय एवं हि प्रयक्षो जीव इष्यते भ्रमाणान्तरसाध्यत्मसव्यसिन्‌ विचार्यते ४२ (प्र १५५) अर्थात्‌ तव सुखदुःखे नेव सेच, ततश्च भ्रयक्ष्ञानविषये एवे 'तव हदये संशयोऽपि जामर्येव, यतो हि संदायवशादेव तव व्यामुद्यति एवं युखटुःखानुभवस् शीकरे, संगयनननल' च्ीकारे तिद्ध एवाहम यरो दासां चिना नानुमवः)

[६9॥

चात्नानम्‌ 1 यत एव विन्नानमय जाला स्पष्टं सिद्ययेतरेवाय्ययः एवमेत -- जर्मलय एकोऽपि त्रियं तरैकाटिकीं स्यन्‌ 1 प्रलयो दयते, जीं विनाऽ्टंमत्ययः कुतः ? ०३ श्ररीर एव चेदेष पत्ययो गर्ते ठदा.। तद्वस गरीरेऽपि सचय मते्कथयू ९?

(ए १५७) दत्यादिमिरन्यामिरपि य॒चछिमिः सात्मपदार्थख साधनं वोधयति मगवान्‌ श्रीमदावीरः करं बहुना, ये ये विषया वेद्रादितोऽपि मतमस्य हदये सम्यग्रुेण प्रमाणिता नासन्‌ तेऽपि सरवे गहनविप्या श्रीवीरिण सगवतता तथा बोधिता यथा केवटे नौतमश्चत्रित एवः पितु,

५५ इत्यं संदायवातकानि वचनान्यापीय वीरप्रमोः सर्यत्त्वमिद्ाधिगर्य जगतामीश्॒त्वमाटोक्रय 1 विष्टात्रद्रतैरी परितो मिय्यालमोचभ्डित- श्चा प्रनिबेग्र सर्वैविरतिं तीरयाम्णीर्नौतिमः ८१०० (ए १७९) एवमेव गैत्मख (इन्दमूतेः) आदुः समिमतेरपि मनोगतं संदायादिकं न्ञात्रा तं तयोपदिति यथा सोऽपि एतसमावाच्छनो मवति 1 असिन्‌ प्रकरणे कर्मण एव स्वेतः प्रसं समर्थितम्‌ 1 तदपि ठथा य॒क्तिमिर्यया ताः समधिगम्य मवेयुः-- “सायनेचिह समेषु विगरोषो यः श्टेऽदि कारणयोगात्‌ 1 रीखन्युपु समे एकः द्यामटः विपमायनदेतोः 1 १५९ (घ॒० १८७)

२८

" अयमपि तथोपदिष्टो मवति यथाऽन्ते -- “सण्डिकैः सह शिवोचितमा्गे सोऽभ्निमूतिरपि दीक्षित आसीद्‌ एवमनयो््रात्रोरषुबन्धुवीयुमृतिरपि देद-जीवयेर्मेदं रोचकयुक्ि- भिस्पदिष्टः यथा हि-- यत्सुराङ्गसमवायसमुत्था क्षीवता प्रतोऽश्चति किंचित्‌ चेतना क्षिति-जटा-ऽनसख्वायु- व्यूहजेयमिति चेतसि वेत्सि ३९ (प्र° १९८) .

दूति शङ्कायाम्‌, -- नया शक्तिरसती प्रतिवप्तु सा कुतः समुदये सदेति चेदिदं न, सिकतासमवये किं तैकजमनं जगतीम्‌ ९॥ ३६ (प्र १९९)

इत्युत्तरमाह अथौत्‌ ययेकसिन्‌ वस्तुनि असती अपि चेतना चस्तुसयुदेये खतः समुदेति तरिं सिकताया प्फैककणे असदपि तेर सिकतासमुदये कतो नोवययेत £ सतो देहे मूतसमुदयजा चेतना नाखीत्यादयः

तदनन्तरं व्यक्ताचार्य-सुधर्मोपाप्यायमण्डितलामि-गोर्यपुत्र-मक- म्पितोपाष्याय-मचट्रातृ-भेतायीदयो विभित्रसंपदाये रुव्यप्रतिः घुमदान्तो विद्वांसोऽपि तथोपदिष्टा यथा ते सक्तिपरवकं ओनागम-- दक्षां जगृहुः, ये मगवदमुप्रदेण गणनायाः सन्तशयतुर्विषसद्घं भति- मोधयन्तो मुक्तिपदं प्रापयामायुः 1 एतेपामुपदेदमसदेन देवाना- मलत्वे, नारकादिसता, धमोऽपर्मव्यवखयादिकं तथा स्पीवाभि-

२९

रुपपचिमिः भतिपादितं मथा साधारणब्धुत्पचिशचास्यपि जनो भूटान पिषयानिमानल्माऽवदुष्येत

कविञ्कुटमाणिक्यचन्द्रेण॒श्रीरूपचनदरेण इतिहासोऽ्यं तथा मह्वश्ाछिन्या पद्धत्या प्रगुभ्फितो यथा विरुद्धविचारशालिनोऽपि जनस्य नागम धरति महचवुद्धिष्दयेत्‌ यंतो हि गौतमो मद्य विद्वान्‌ वेद-वेदाङ्गद्वासप्ततिकटादिसमग्रजञातव्यानां पारंगम मासीत्‌ यश्च रिद फीडाऽऽसक्तोऽपरि रव्ददाखवेदिनां मूर्मणिरम्‌त्‌ 1 उक्त हि-

पुर्‌ः्रोऽसौ पदरवोक्येदिना- ममूच्छि्ुतेऽपि ख्टन्‌ खटीख्या ततो द्वयोर्गपितिसर्ैराजयो- ` रयं सृतीयो सुवि पृञ्यतापदे १५ (धर० ८४)

यो वेदोक्तकर्मकरापे जन्मतः रशब्दश्चाटी सुनिपुणश्चामीत्‌ यख वैतादस्यटैत्रिकी शक्तिरासीद्‌ सोऽपि महापरमादो गोतमो चीरजिनेश्वरखय वचनाष्रतेन सानन्माऽभ्यस्तं मागं परित्यज्य तैनागमे दक्ितो वमू ततः सांपतिकविद्धन्मानिनां तु जेनमत- खण्डनाय को वा दम्भः खात्‌

एं किर जेनागमविजयदिण्डिमं स्वः भचारयन्‌ महाकाव्य- मिद्‌ यथा धर्मर्मोघनायाऽखम्‌› तथा श्रद्धानददीकरणायापि पयम्‌ विचायैवमिदानीमम्य काव्यस्य साफस्यं भारिकः काव्ये हि शिकणीयान्‌ खामिष्ठखीङत्य चखाभियितमुपदेखविपर्यं तेषु

३०

प्रचारययेव काग्यनि्मणस सस्यमुदेश्यम्‌ तदिदमुदेश्यं॑खखुट- मेव पूरितम्‌, यतरो हि जैनागमघ्य ताच्िक्छुपदेदं श्ुला वैदिकरा- दिमगेषु सु्यः, स्वेतः प्रसिद्धपाण्डिव्या अपि महाविद्ासोऽतर श्रद्धाश्ाछिनिः संपयन्ते 1 एवंविध एव प्रमाबसतीरथङ्करमदिन्ना प्रचारितः, अयमेवातिश्षयो महावोरादिवाणीनामिति सुद्रखषदेशः कव्येनानेन वाचयतां हदये दृदीक्रियते उनेनोपदेदोनाभिसुखी- मृतेषु परमेयेपु किं साफट्ये महाकान्यखाऽख £ `

तदिदम्‌ पाटकश्ीक्षमाकस्याणगणिङृत॒श्गोतमीयप्रकाशाए्य- व्यास्यासहितं श्रावकानां ज्ञानद्दीकरणाय संम्रति महता परिश्रमेण श्रकारेयते 1 रीकेयमतिविशदा, अतिसरखपद्धत्या सान्वयं ग्याख्यान- सुपस्थापयति सेकप्रसिद्धघ्य पणिनीयव्याकरणखानुसरेण सर्वत्र दान्दसाधुलं योधयति संप्रदायिकमावदयं तत्त्वमपि खाने साने सेय सरुचिरया सरण्योपदिदाति खले खले श्रीदेमचनद्रसूरीणां विदोपावद्यकवृत्यादीनां चोद्धरणान्यपि टीकायामसखां दत्तानि

कान्यमिदं कसिन्‌. यने कदा निर्मितम्‌, कश्यायं कविरवी खूपचन्दरकविरिव्यादिकं विवरणं नाहम्रो्धिखामि अन्ये एव ५सुवच्छेल-वियद्वजोमुप( १८०७ ›मिते मासे सदस्याऽऽदिमे पे दक्षसुताधिमाथदिवसे शद्धे दृतीयातिथो श्रीमचोधपुरे कमध्वजरवौ शरीराम्िहे षे श्रीमच्छीजिनलमतूरिगणसृद्राज्ये पुनद्धीभिके विद्याचासवेरे गणे खरतर शीक्षेमकीत्यऽन्वये सञ्लाता सुब ान्तिदपैपृणयः थीवाचकाख्यामूृतः

३१

तच्छिष्या जिनहरषनामसुनयो वैरद्गिकव्रेसरा- खच्छिप्याः सुखवद्ैना अपि दयार्षिदालदीयापततथा तच्छिप्योऽमयसिंहनागनृपतेरन्वमरतिष्ठो महा- गम्भीराऽऽहतशरासतत्वरसिकोऽहं रूपचनद्राहयः 1 प्रस्याताऽपरनामरामविजयो गच्छे दास्या काेऽकार्मिमे कविवकख्या श्रीगोतमीये अमम्‌ ३५ (० २८८) इत्यादिभिः स्वष्टल्पेण दचम्‌ एतद्वन्थख त्वानु- श्वीरनेन मार्मिकजनाः खथमेतस गुणान्‌ महत्वं प्रिजानीयुरिति किंवा वृथाक्षरशषरणेन सर्वथा जैनागमदीक्षापालकानां रिक्षोपयोगि महाकाव्यमं ्रदरादलां निशितं श्रद्वावधैनाय मवेदिति मगवतः संमा्यीदं तिरमामि-- निणैयसागरसुद्रणारयम्‌ सुधीविधेयः सबद न. ) नारायण राम जाचायेः -4-91 कान्यतीरथेः”

श्रीम्छप्णाराधितपा्नेमिजिनभ्यां नयः किञविद्क्तव्य

~= बिद्वदुवृन्दमनोक्त्यव्यततिभियः स्तूयते सवेदा, भूपाट्य्रतिवोधको गुर्मतिः सिद्धान्तपारङ्गमी ध्याख्यादानिविचक्षणः छमगुभ्विपातकी्तिः सुघीः, आनन्दाव्धिसुनीश्वरं गणपतिं बन्दे महात्तानिनम्‌

शोढ देवद छाख्माईं ज्नपुस्तकोद्धार फंडनो ^“ अह ९० “मौतमीयमदाव्यः वन्य मिद्ध करवा %हिदधिदातानीहपा डे प्रयत्नवान्‌ थयो चु. भ्रन्यकार्‌, टीकाकार तथा कव्यादि सेवधे संदोधक श्रीकनकविजयजीना आदिवचनमां अने दयालीजी नारायण यम आचाय चव्यतीर्थ” सी शस्तानां क्दैवामां अविं होकाथी विव कारे केव रदेठुं नथी. यास्रीजी काव्यतीर्थं नारायण आचाय संस्छृतमां विद्वत्ता अने पिचाप्पूणे प्रस्तावना खी पन्थे सम्षवामां सुगमता करी आपी दोवाथी महाशयो उपकार मायुं घ.

तपगच्छनी विजयद्चाखामां सुग्रहिद्ध॒पंजाब-उद्वारक श्रीविजयानंद्‌ ( आलारमजी ) सुरीश्वरनी पेटी विजयक्मटमूरीय शाखामों श्रीमद्‌ दानसूरिना दिष्य विद्यमान आचायै श्रीविचकत्रमसूरिजीना पट्रधर्‌ श्रीमद्‌ विजयरामचनद्रषूरिना िप्य॒बाल्त्रह्मचारी श्रीकनकविजयजीये शीमद्‌ विजयक्षमामद्रपरिनी प्रेरणाथी आनु संशोधन करी अप्यु्े, वे बदल एओधीनो अंतःकरणपूर्वक आमार मायुं दु.

पदी प्रविद्ध यनारा व्न्योमां ( १) वैराग्यदातक, वैराग्यरसायन, पद्मन ददात उष्रसिकरोत्र, धमेदिक्षाप्रकरणे आदि वैसम्यादि दातको ( २) अभिघानपनेष, निद्ेष, सिगानुदखामन, दाच्दमेदप्रका्, एच्मक्षर नाममा, चिरछोख भादि सने (३) चेनङ्नारसतंमवसटीक केर ्रेसमां चाद छे. वेम (१) प्रमाण नयतस्वलोकार्खकार म्यायावतारिका दीका, टिप्यण, पजिञ् सित तथा (२) जावश्वकनिधुकि छपाववानो विचार टृष्टीयो करी रघा छे.

सुहं ता. १३-१-४१ | जीवणचंद्‌ साक्स्चंद्‌ जवेरी स. १९९० पोप शुक पूना, अतनिक मवी.

1 विश्वदितयोधिदप्यकीसमीविजयगुरभ्यो नमः अष्टि-देयचन्दलाकभगङई-जेनषखकोदग्-- पाटकथीरूपचन्द्रगणिविरचिवं

श्रीगौतमीयकान्यम्‌ !

, श्रीह्टमाकस्याणगणिकृतमौतमीयप्रकारपख्यरीकया सहितम्‌

४५८ ~ ञ्छटीः नमः ˆ ध्रीगददीपार्ुनाथाय गमः ~> अनन्तविक्षानम॑यं विद्धं निरुद्धसगादिपरचारम्‌ ज्तिोत्तमं वीरमईचिन्त्यशाकि निधाय भर्या इद्यान्जकोरो ॥९॥ निराधवोदामणुणेकधमसयुछखदिप्रविधातदक्म्‌ गणेश्वराणां गणसुक्तियुक्तया विधाय सद्यःस्तुतिगोचरं २॥ प्रणम्य रम्यं गुखुपादपद्मं सरस्वतीं चामिनिवेदय चित्ते श्रीगौतमीयोत्तमकाव्यवन्बे वितन्यत्तेऽसी भवर भकारः ३॥ निभिः संट्डुः।

अथ त॒त्रमवन्तः श्रीमन्तः कवयः पाटकर्पचन्द्रगणयः सक्रा- व्यद्याऽनेकश्रयःसाधनतां पर्यन्तो निर्टसकेखजनमनश्चमत्कार-९ कारि चार गोतमीयाख्ं महाकाव्यं विकीरपवश्िकीर्ितवयाथयानि- घ्परिसमाप्य््‌, (आगीर्ममस्किया वस्तनिर्देयो वापि तन्युखम्‌! इ्यक्त्बाहन्थादावाशीराचन्यत्मं मज्ञर्मवस्यं कर्तव्यमिति मन्वानाः १२ 4

अनेन ज्ञानाविश्चयः सूवित्तः यनेनापायापयमावरिश्षयः सुधितः सनेन पूजातिदायः १.४ अनेन वचनादिशयः

श्रीगौतमीयकोन्यं

श्रीषीखमोरपापापुरीं प्रति यां भ्रखानेच्छा सदं भष्ठु निर्दिशन्तः प्रवन्वसुपनिवघ्नन्ति 2 तत्रादिमं कान्यमाट-- श्रीरामिरासीदिव दिव्यदीपिर्स्यात्मनि ज्ञानमयी समग्रा तीर्थमदृ्ये वीरनाथः प्रयातुमेच्छनगरीमपापाम्‌ १४ ६` वीरनाथो वीरपरयुसीर्थय चतुरविधसच्वस्य मत्ये परर्ि कठ, तीय परवरछयितुमिति यावत्‌ अपरापाम्‌। अपापासंकतिकां नगरीं परखातु गन्तुमेच्छत्‌-वान्छति यत्वदोर्नित्यामिसम्बन्धात्‌ स॒ क॒ इत्यत ९भाट--यखेत्यादि ! यख वीरममोरातनि चेतने समगाऽखण्डिता ज्ञानमयी निलिरघनघातिकर्ममण्डरनिपक्षपक्क्षयसमरद्ध्केवरन्ञान- खरूपा शरीरैक्मीरानिरासीद-प्रादुरमूत्‌ श्रीः केव दिल्यदी्िरिव १२ अद्धुतं ज्योतिरिव, यथा भगवत एव अन्यख वा कस्यापि उत्तम- स्मासनि दिन्यदीघठिः प्रादुर्भवति तयेयमपीति भावः केवलभरियो हि लोकारोकप्रकाशकत्वादिव्यदीप्यौपम्यम्‌ आविरासीदिति $५आविरिति निपातः प्राकववार्थस्तसू्वात्‌ “अस्‌. सकि इत्यसाद्वातोः. ` फसैरि चष दिव्यदीपषिरिति। दिल्या चासौ दीपिथेति कर्मधारयः, दिव्येतयतर श्युमागपाक्‌' (४।२।१०१) इति यत्‌ "दिव्यं वद्यु-रवङ्गयोः, १८दयुभवेऽपीतिदेमानेकायैः ज्ञानमयीति। जञायते परिच्छिद्यते यस्व- नेनेति शानं तत्खर्पममस्या इति खल्पेऽथं मयट्‌, ततः “दिद्ाणस्‌" (४।१।१५)इति डीप्‌ तीर्थप्रवृचयं शति तीर्यते संसारवारिधिरने- २१ेति तीर्थम्‌, शतृ इवनतरणयोः इव्यसादौणादिकखक्मत्ययः,, पवर्त परवृषि्तः षीवुरुषः “क्रियाय पपदसय, (२।३।१४) इति २४ घुरया, ताद्य चतुथी वा वीरनाथ ति तीरथारौ माधश्चेति

गौतमीयप्रकाश्चाख्यदीकयां सदि्म्‌ डे

क्मैवारयः श्वीरो जिने मटे ठैः इति हैमः. प्रस्यातुमिति भूव्‌ शा गतिनिदृतो" इत्यसात्‌ “्मानकवृकेषु" (२।।१५८) इति तुख॒न्मत्ययः, यतोऽत्र प्रखाननिपयिणीच्छा प्रतीयते, तु भ्यानायेच्छा इत्यतः “तुसुन्ण्वुलो क्रियायां क्रियार्यायामू? ( २।३।१० ) इति पूर्वसूत्रेणामा्तिरिति मावः एेच्छदिति इच्छायाम्‌, इत्यसारकर्षरि उङ््‌ नु मगवतो वीतराग सर्वथा नि्देन इच्छाया जभावात्‌ कथगैच्छदियुम्‌?उच्यते। उपवाराव्‌। इरयमेव श्रीभगवतीसूतरृत्योः प्ारंमेऽप्युक्तमसि तथाहि ^संपा- निुकामिचि, प्राषुकाम इति यदुच्यते सदुपरनारात्‌ , अन्यथा दि निरभिखाा एव मगवन्तः केवलिनो मन्ति | भो्े भवे सर्वेत निदो सुनिसचमः इति वचनादिति अपापाभिति प्रायः सकरु- सुकेतिजनाधिष्ठितिलाव्‌ नालि पपं ययां सा, परामियन्वरथेसंजतेयम्‌ १२ चेव्यत्र चकारस्तु फदपूरणे वाक्यारङ्कारे वा, अव्ययानामनेकाथै- त्वादिति भावः। इष प्रबन्धे आदितः श्रीरब्दपयोगाद्र्णगणादिदोषो- तपिनोत्रातीवोपयोगमाग्‌ मवति तथोक्तम्‌--““देवतावाचकाः शाब्दा १५ ये मद्रादिवाचकाः ते सवे नैव निन्वाः स्युर्खिपितो गणतोऽपि च" इति १॥ सर्गेऽसिनिन्द्रवन्नोपेन्रवज्नोपजातयो वरचानि 1 सष्ठकगानि यथा--“्यादिन्द्रवज्ञा यदि तौ जगौ गः १, उपेन्द्रवज्रा जव्रजा्तततो गैः २, जनन्तरोदीरित्श्ममाजै पादौ यदीयावुपजात- यस्ताः ॥” इत्यरं परसङ्गेन

तदानीं किं संनातमित्याद-- ` ` २५

ताबद्विदित्वागममख धात्रीपतेरिव व्यन्तरदेवसद्धः

इत कियप्नान्वनपलवरभस्ससर्यं र्यं मदरनपण्डम्‌ १1 २४

ˆ श्रीगीवमीयकाब्यं

, , तावद्‌ प्रथमं क्रियावान्‌. खोदितकार्यकरणोयतो व्यन्तर्देवतक्चो व्यन्तरजातीयघुरसमृहोऽसख वीखमोरागममागमर्नं विदिता ज्ञालाऽव- ६पिक्ञानेनेति रेपः ! महसेनप्ण्डं अपापापुयपकण्ठयसिं महसेनना- मकं वनं रम्यं रमणीये ससस रचयामास व्यन्तरदेवसद्ठः इव 1 वनपारवगै इवे, वनणरकेसमूह इव अस्य केव घात्रीपतेरिव £ मूपतेरिव, यथा क्रियावान्‌ वनपाल्व्गो धात्रीपतेरागमनं विदिषा काननं रम्यं खनति तचेवय्थः विदित्वेति “विवर्‌ ञान" इल आसूर्काठे क्त्रामययः ““र्दविद्‌-" ( १।२।८ ) इति वख &कित्ान्न गुणः आगममिति आगमनमागमः, “गहवृदनिधि- गमश्च" ( ३।३।५८ ) इति गमेभावेऽप्‌ ! असेति “कवैकर्मणोः इति, ( २।३।६५ ) इति कर्तैरि षषी धात्रीपतेरिति दधाति १२ भूतानीति धात्री ममिखस्याः पतिर्नाथस्रस व्यन्तरेत्यादि चकः वत्यौदिसेवाकारिववाद्विगतमन्तरं विदोषो नरेभ्यो येषां ते व्यन्तरास्न ते देवाश्च व्यन्तरदेबान्तेणां सद्व: क्रियावानिति करणं रिया; ३५ सा विचतेऽसेति थप्तयये मतुप्‌ क्रियावान्‌ कर्मसूयततः, इत्यभिषान. चिन्तामणिः वनपाछेत्यादि घने परल्यन्तीति वनपालतेषा वगः प्वमैद्ठ सद्या इति मः सदशानां इन्दं वै उच्यते इति १९ तदर्थः ससर्जेति ! खज विसर्गे" श््वमार्चरि छिद्‌ ! रम्यमिति। रन योग्यमिव्ये रमेत्‌ भदसेनेति मदसेनयक्षापिष्ठितत्वदे* ठद्नं॑मदसनेनाल्ययैव भतिद्धि गतम्‌ स्याद्‌ षण्डं काननं २१ वनम्‌” इति हैमः

चनतुस्तदान्यानपि वर्चमानः चमाजुदपरैफषपदेः वसन्वः 1 *१ जगत्यति दर्ययितु सनः को धत्सरैते्रदर्थनाय ,

मीदमीयप्रका्ाल्यदीचछया खदितम्‌

वदा ठसिन्‌ काले वेशाखमासे वर्तमानः घाक्ाद्धियमानो वसन्तो चघन्तास्य ठः ! जगति विश्वनार्यं॒वीरं दरीयितुं , रग्विपये क्रारयिुमन्यानपि व्यतिरिक्तान्‌ ओरप्मवर्फोदरद्धिमचिधिराख्यानपि अहून्‌ एकपदेऽकसात्समाजुदाव जाह्वाद्‌ युक्तोऽयम्थः--हि सतः कारणात्‌ ईषरद्नाय त्रिवने्रं द्रष्टं को जनो टोकोन उत्सहेत नोताहं कुर्यात्‌ £ अपि च॒ सर्वोऽ्ुत्सदेव प्त्रेलर्यैः वर्मीमान हति वरते इति विग्रहे ढ़ रतने" इत्यसात्‌ कर्परि ट्टः दयानच्‌ समाजदावेति। सम्‌ माद्रपूवीव्‌ हु दानादाविव्रलाक्तचैरि यि एकपदे दहि एतदन्ययम्‌ शूसदिलरथे श्तदतैकपदे , सथोऽकरसात््‌ सपदि त्छणे' इति देमचन्द्ोक्तेः दर्ययितुमिति दछेतमण्णिजन्तात्‌ दरसन उत्सहेतेवि उसूवीव्‌ सदेः कर्चरि टिद्व ईरेखादि ईे इतीठरः दथि्दर्यन, दरस दर्यनमीर-१र दीनं तस (क्रियारथोपपदख- ( २।३।१९ ) इति चतुर्था खराञ्यदेशानिव राजवयो त्रिमज्य शवाद्रवयोऽच्यवासुः खसारसम्मारमथाभिरामं विकासयामाछुरिनार्चनाय १५

चटुतयो चसन्ताया ` वृक्षान्‌. सहकारादित्रहन्‌. विमञ्य यां विमानं चिषाय } जव्यवासुराधयामाछुः, द्यु निवसन्ति जेवय्थः के कागिव राजवयौ नृषमुख्याः खराथ्यदेश्ान्‌ निनराज्यजनपदा- १५ निन) य॒था प्रथाना राजानः खराग्यदेानू विमन्य तेषु निवसन्ति उथेलर्थः यथापिवासानन्तरे(र) ऋतवः इनार्नाय इं प्रमे्रमर्म- विषं पूजयितुं मभिरामे भनोदरं लतरारसम्मारं निजसारपुष्यफर- २१ पत्रमकरं विच्पघ्रयामादुर्विक्खरं चक्रुः यद्वा कटं चकुः, घदानीं सर्वेऽपि तरवः पुष्पादिमन्त नानिव्य्ःः। खराज्येत्यादि रचः १४

ˆ श्रीगौतमीयकान्यं

कर्म राज्यं खल राज्यं खराय, स्य देदाखान्‌ देश्यो जनपदो मीव इति ्ैमः। राजेत्यादि यन व्याः श्यं पृं प्रसं य्यम्‌, इति हैमः विभव्येति निपर्वादवनेः पूर्वकठे क्वा तस्य च्यवदेशः वृ्षानिति ! “उपान्वध्याङ्वसः! ( १।४।९८) इत्ययिकरणस्य कर्मल्रा्धितीया अध्यवात्सुरिति | यपिपूर्वाद्यः &कर्यरि खसारेखयादि खखात्नः सारं पुष्पादिद्रव्यं तख सम्मारस्तं यथासारं प्रपानीमूं वस्तविदयर्थः ! (सारो मजसिरां्योः, यले ष्टे चे सारं द्रविणन्यायवारिषुः इनेकाथेः विफाष- ५यामासुरिति णिजन्तात्‌ “कस गतो" इत्यसात्‌ 'कासत्ययाव्‌). ( ३।१।३५ ) इयाम्‌ 1 वरोऽखेरनुप्रयोगः “विकासः स्फुर्ने ग्यदौ,” इति दन्त्ान्तो धरणिः इनार्यनावेति इनसार्ैनमि- १२नार्च्नं वसै, चतुथी पराद्‌ चितेनो नायकश्च" इति हैमः प्राग्‌ ये सिताः भरीवियुतासदानीं सभ्रीकतां प्रापुरगार एव १५ भियस्तु.खस्याः समयेऽसुमद्धि सर्वत्र स्यो हि दसाव्विरचः ५॥

येऽगरा वृक्षाः मा्‌ पूर्व श्रीवियुताः शोगारदितः धिता सति- १८४न्‌ ते एव तेऽपि वृक्षाख्रदानीं चसिन्काठे पमोरागमनसमये सथी- कतां शोमायुक्त्वे मापुः परा्टुवन्ति युक्तोऽयमर्थः--असुमद्वि भ्राणिमिः धियो रक्म्यस्वु समयेऽवसरे सभ्याः काष्यवसरे एव ९१ रम्यन्ते, नतु यदा तदापीति मावः कयमिलयाह--सर्वत्ेत्यादि 1 हि यतो दश्लायाः सवायाः विवर्तः परावर्तः सर्वत्रासिम्‌ रोके २४ स्योऽवितयोऽखीति दोपः। प्राणिनां हि यदा सदयाऽमयुदेति सदैव

मीतमीयभकान्ञाख्यटीकया सहितम्‌ 1

सोख्यादिलमो मबतीप्य्ैः। सिता इति 1 खायातोरकर्मकल्ाकरपरि क्तः भ्रीद्यादि धरिवा ख््म्या वियुताः इति तृतीयातदुरूषः तदानीमिति जखण्डमन्ययमिदं सश्रीकतामिति सद भरिया वर्चन्ते इतिः सथ्ीका्ेषां मावा तां प्रापुरिति प्पूवदामोतिर्खिर। अगा इति गच्छन्तीयगाः शनगोऽपाणिषु ( ६।२।७७ ) इति धैकल्पिकल्रासनषे ननो सेषः एति जत्र एवकारोऽपि-& न्दरं म्या इहि “पोरदुपधात्‌” ( २।१।९८) इति कर्मणि यत्‌ असुमद्धिरिति ससवः प्राणाः सन्त्येपमित्यद्ुम- न्तसेः करि ठृतीया, ५पुति मूष््यसवः प्राणा! इत्यमरः दोत्यादि “वला तु दद्या सिति इति हैमः “विवर्तो नने सद्ेऽपादृरो» इत्यनेका्ेः 1 ५.॥ रोगाक्तरोकेरितदृ्टिपातादिवाप्तरागैः प्रविताः प्रवालैः १२ हवमा पुंसां मनांसि जहर्मनोदरं किं मवेत्पखद्धम्‌ ॥६॥ रागेण खेदेनाक्ता युक्ता ये छोकालैरीरिवाः प्रेरिता या चण्यो , नेत्राणि तासां पातः पतनं तसादिव माघः प्रातो ` रागो रक्तिमा १५ येतत; प्रवाेः किसख्यैःः रचिताः पुटः इुमाश्रतादिग्रहाः पुता भनुप्याणां मनांसि चेतांसि कर्मतामापनानि जहुः न.न हरन्ति . स, दन्ति सवेतययः शरौ नवै परकृतमर्थै सूचय" युक्लादिद १८ नूष्रयेन दरणरूपोऽधं एव चोयते, नतु निपेधायैः उक्तमर्थमयो- न्तरन्यासेन द्रदयति संशृदधं सद्धियुक्तं सत्‌ किं वस्तु मनोहरं मनोदारकं मयेव्‌१ स्वेमपरि खादेवेति भावः अक्तेति "सघ २१ गती" ससनाककर्परि कः 1 ध्यख विमापा' (७२।१५ ) इति नट। ईसतिति 1 गतिकम्पनयोः जसनाकक्मेणि सः एवमाधियतरापि

श्रीगातमीयका०५

सौरिति “रागः खाछोदितादिषु } गन्ारादै ञछेयादिकेऽनुरागे मतरे से" इति दमः प्रयितां इति पवीचिनोतिः कर्तरि कतः जहु- रिति हनः करि ट्‌ सण्ढमिति संपूर्त्‌ “वु धद" इयसा" क्रि क्तः, ५यसख वमाप" ( ७।२।१५ ) इति नेद स॒खिग्धसान्द्राणि हरिच्छदानि प्रपदयतां भूमिरुदोऽनिमेषम्‌ इअलन्तभेदेऽपि तद्‌ नराणामकारयन्देवगणेरमेदम्‌ तदा तसिन्‌ काले मूमिरुदो गराः सुलिग्बसाद्राणि सुतरामति- द्वयेन कषिगयानि चिकणानि सानदराणि निबिडानि दरिच्छदानि दरिः द्वणपत्राणि अनिमेषमकषस्न्दरहितं यथा स्याथ प्रपदयतां प्रक्येण विखोकयतं नराणां देवगैः सुरसमृहैः सहात्यन्तमेदेऽतन्त- भित्तत्रे सत्यपि अमेदं ठैः सदाऽभिननत्वमकारयन्‌ कारयामाघुः 1 +रखयमरथः-ययपि नराणां सुरः सदवयीदितो महान्‌. विरभो वापि ठदानीमनिमेपतयाऽवोकनेन तेः. सदाऽभिल्तवं जातमिति एतेन वृक्षाणामतिरमणीयतयेक्तम्‌ ] नलु देवानामनिमेपले र्वि भमा- १५णम्‌ वावस्मत्यक्षादिजये, गर्ते तत्लक्षणानामसंमवादिति चेत्‌» आगमपरमाणमत्राऽवेदि तदुक्तं--“णिमिसनयणा मणकज्यसादणा पुष्फदाम समखणा 1 चउरंगुलेण मूर छिवंति सुरा जिणा विति- ५८ ॥१॥ हरिदिल्यादि हरिति तानि चदान चेति विग्रहः रिद वृणान्तरे, वभभेदेऽशमेदे इयनेकार्थः ववै परणं दरम्‌ इति दैमः। प्रपद्यवामिति पूवं दृरोष्टः शचूरातोः पदया- ‰१ देयः भूसीवयादि मूत रेहन्तीति द्द किप्‌ यनिमेपमिति। वियते निमेषो यत्न करमणि उद्‌ क्रियाविरेपणमिदम्‌ { अल्यन्ते- स्यादि सन्तं विराममतिक्रान्दोऽयन्वः, चासी मेदश्च तिन्‌ २४ अदारयन्निति ध्वुमण्णिजन्गद्‌ इलो उदरं

गोवमीयप्रकााल्यरीकया सदितम्‌ 1

बापरीच्छरुखद्वदस्तवा रोरम्बब्द्धारखगीवनादः `; काररसतीरथकरागमोल्यं निर्दयीयामायुरिवे भ्रमोदम्‌ ८.॥ ,

कारस्करा गृक्षाः करचारः वातेन वायुना उच्छटन्त उत्पततो ये प्वाः प्रवायस्न एव ` दस्ता प्रसारिताह्ठिपाणयजलेस्तथा रोख म्बानां भ्रमराणां ये श्द्वारयव्दरास्त एव सुषु सोमना गीत्तनादा गान ध्वनयः करणमूतिः ती्थकरागमोत्यं वीरबिजागमनसयद्धवं प्रमोदे र्प॑निदर्ीयामासुरि चापयमापुखििदयुखश्चा उच्छलदिति उसू्ात्‌ "दढ गती! श्यसादटटः रत दस्ततारेरिति 1 यचपि श्रसा- रिताह्ृडी पाणौ चपेटः भ्रतटस्ररः, प्रहखस्वाटिकाताट' इ्युक्तत्रादत्र ताटपदेनैव परसतुतार्थोषगती हृस्तपदं व्यर्थमिव प्रतिमाति त्रथापि सस्य फरिकटमादिधटुक्पोप्रकल्ानन दोपः। रोलम्बेत्यादि “न्दि- ब्दिरोऽटी सेटम्बो द्विरेफा इति दमः गीतिलनत्र माये कतः गीतं १२ गानं गेयं गीतिः, इति देमः। कारस्रा इति पारष्करादिवात्साघुः (अर्णो दुर्धिटपी इटः, प्ितिरुटः कारस्करो विष्टरः इति हेमः ती्करेत्यादि तीथं चतुर्विधः सदः भरथमगणमृद्धा व्करोतीति ५५ नो रेतुताच्टील्यानुरेम्येषुः ( २।२।२० ) इति टभययः, तीथ करस्य भागेन उच्ष्ितीति तीथैकशरगमोत्यखं उसपू्वाव्‌ खाधातोई- प्रत्यये “उदः यासम्पोः-' (८।४।६१ ) इति पूवेसवधेः निदर्वी-१८ यामासुरित्यादि . च्व॒मण्णिजन्वादूटयो्िदे कास. प्रत्ययादित्याम्‌ 1 इह जनमिति शेषः तल चाऽगिव्तुः 'टदोशव" (५४० वा. ) इत्यनेन णौ कमत्ार्‌ द्वितीया =. ` नप्िदिष्वाचन्ननां प्न चि उयदध प्चपकारछपदछमवपनि

विद्ेप्यमामपरचम्‌” दयि न्यादोऽयर सदच्टते, “दरि्लमादिदद्‌ण दि घ्न एरगमापानग्रन्योऽप्येतप्यायगर्पि्ः दवि प्रविमाति.

१० श्रीगीवमीयका््यं

इति सामान्यतः पद्‌ ऋतवो वर्णिताः ! यय ॒विरोषतसान्वण- यितुकामः कचिखावद्दाभिः क्यर्वसन्ते वणेयति-- सूनुभ्घताविवं मोदमाप्ा; खलोद्भमे चूततसोदिरेफाः एषामतो मद्गर्गायनानामिव ध्वनिरमाङ्गलिको अनुम्मे ९॥ विरे अमराः चूततरीः सटकाररक्षख सनोद्भमने पएष्योद्मने जाते सति मोदं हषं मा्ठाःप्ाुवन्वि कसामिव, सुनुपद्ूतानिव पुत्रो्य्ाविव, यथा पुत्रोत्पस्ती सत्यां जना मोदमा्ुवन्ति तथेत्यथैः अतोऽसाक्तारणादेव एषां . ज्रमराणां माङ्घछिको मद्गरुसूचक इव ९ध्वनि्ङकारयग्दो जनृम्मे उदास, विखतवानित्य्ैः फेपामिव भङ्गटगायनानामिव, यया कपि हषैकारणे मङ्गरुगानक्र्ृणा माङ्गलिक ध्वनिर्मीतनादो जुम्मते तयेव्यर्थः सृन्वि्यादि चूनोः प्षुतिः १२सूमुपसूतिखस्यां, प्पूवीत्‌ श्रो भवे क्तिष्‌ ! भवतिः खादप्ये परसवेऽपर चः इति हैमः नेत्यादि घूनानाुद्रमः सूनोदमसखरसिन्‌ प्यं सूं सुमनसः इति हेमः द्विरेफा इति दौ रेफी येपां *५अमरखस्पे नान्न ते द्विरेफाः मद्भकेत्यादि मङ्गलं गायनतीति मङ्ग. ठगायना गान्धरवोदयेपां } माङ्गलिक इति मङ्गरं प्रयोजनमस्येति श्रयोजनम्‌ (५।१।१०९) इति उक्‌ } यदवा मद्गरमर्हतीति "तदर्हति १८८ ५।१।६२ ) इति उक्‌ 1 अथवा मङ्गके नियुक्त इति प्त नियुक्त" ( ४।४।६९ ) इति टक्‌ 1 जमुम्मे इति } शुभी गात्रविनमि' ससाकर्चरि टिद्‌ धातूनामनेकार्थलरादस्य विलायार्थता २9 ये सन्द्रीणां युखश्ीषुखामा- दामोद्मचा बडला वभूयुः ते पदसदान्‌ उन्पदयिप्णवः किं नासन्‌ यवः कारणकार्यसाम्यम्‌ ।॥ १०

गीतमीयप्रकाश्चाख्यरीकया सदितम्‌ 1 ११

ये वक्रुखा वृष्षविदोषाः उन्दरीणां सीणां ` मुखशीधुरामात्‌ आमेोदेन परिमलेन मचा मदयुक्ता वमूवुते वकरः पट्‌पदान्‌ श्रमरान्‌ उन्मदयिप्णवो मदोलयादकाः किं सान्‌ वमूवुः, वम~ बुरेेलथैः यत्न किं कारणमिलत आह--यत इत्यादि यतो यस्मात्कारणात्‌ कारणकार्ययोर्वदेठमतोः साम्ये साखद्यमस्तीति गोषः{ अयम्थः--कारणं हि प्रायः खानुखूपमेव कार्य जनयति, तु खतो विरुद्धलमावम्‌ प्रायेण पित्रा त॒स्य; पुत्र इत्यायमिषानात्‌ ततश्चात्र यकुलानां खीमयुखमयदीकारजनितमत्त्वैन तन्मकरन्दपा- यिनां भ्रमराणां मचत युक्तमेषेति एतावता यङरुखमत्ताकारणं अमरमतता कार्यमिति यितम्‌ निःरोपामरणभूषिता मामिनी समपभेत यदा वकुले स्रुखान्मयचुकं॑निक्िति तदैव तख पुप्पादिसम्पस्तिरुपनायते इति तःखमावः सखेत्यादि सखस यः १२ दीधुस्तस टामल्तसात्‌ शरेरेये चीधुरसवः इति हैमः ठमेर्ष- निगृद्धौ ठामेति। ।जर्भेश्येत्यनेन नुमागमः कुतो सादिति चेदुच्यते, 'ऽउपसरगात्लट्यनोः ६।१।६७ ) इति नियमान्न नुम्‌ 1५ सल्घनोः परयोरूपसरगीदेव स्मे तु केब्येति तदर्थः 1 समैति “भामोदो गन्यदर्पयो इति हेमः मदा इति } भदी दपः “करि निषठान्याल्यापृमूरधिमदां' इति गिपेयात्‌ निष्ठा (१ तख १८ नलं बुरा इत्ति "वङुलः केसरः इति टैमः पटित्यादि यद्‌ पदा येषां ते वान्‌ भनोकाव्यय-› { २।३६९ ) इति पषी- मिपेयः ! उम्मदयिप्णव इति उूौम्णिजन्तात्‌ “मदी हरषे" इत्य- २) स्वाद्‌ णेब्डन्दतनि' (३।२। १३७) इति चण इष्णुच्‌ ययामन्तेति भेय्य्‌ 'मदी दरषग्टेपनयो'रिति भिलाद्‌ "मिवा ( ६।०।९२ ) इति २४

१२ श्रीयावमीयकान्य

दखः नु छान्दसोऽयं प्रयोगः कथमत्रोपात्त इति चेदुच्यते ¦ ठोकेऽपि कविभिरादकत्वात्न दोपः यया छन्दसमपि परमविष्णु- शब्दं माधः परायुह्ध “जगसमोरपमनिष्णुषेप्णरव' इति बृहसिदधान्त- कैषा वहुषु माधपुरकेषु त॒ असहिष्णु इति पाठो दयते कं नासन्निति काङ्ककिरियं लते: फर्चरि रर ) कारणेत्यादि 1 कारणं इच कार्य करणकार्ये, समयोमीवः साम्ये, कारणकायैयोः साम्यमिति तिमः “मस्पातरूतर २।२।२४ ) इत्यनेन कार्दचव्दख परामिपाते भरठिऽपि कारणस्य प्राधान्यादम्यर्दिवं चेति तद्पू्वनिपातः 1 १०

९पयन्तु मो मो प्रमदाकटाक्षान्मधुव्रवाखीं मधु पाययन्तु इत्यागमोक्तीरिव सोगतानां सल्यापयन्तस्िरका पिरेज॒ः॥११॥ तिरकासिटकनामानो पृक्षा विरेजुः शोमन्ते किं दुर्वन्तं १२३व इति। दं सौगतानां बौद्धानां जागमोक्तीः श्ाख्वचनानि सुगत. प्रणीत्ततत्ववाक्यानीति यावत्‌, सत्यापयन्त इव सत्याः कुर्वन्त इव इतीति किमित्याद--प्यन्त्वित्यादि मो मो लोकाः मवन्तः भम १५दानों सीणां काक्षा कटाक्षविक्षेपान्‌ पश्यन्तु तथा मघु्रतारीं मदययपजनग्रणिं मघु म्यं पाययन्छु पानं कारयन्तु इति अयमत्र तासर्याथैः--यत्सचत्‌ क्षणिकमिति व्या्िवादिनः सौगता एव- सुपदिद्यन्ति, ध्यदद्ये लोकाः परमरमणीयरमणीरूपनिरीक्षणमनोऽ मिट्पितमोग्यमक्षणमघुपानग्रदुदायनीयदययनादिमिरेव मेोक्षावाधिः, तु त्पोनुषानादिभितेषां दि शेशरूपलयेन रोके दुःखसव साधनत्वात्‌ ! २१तसानमोक्षर्थिमि; सवेन खीमोगादि मोक्तव्यम्‌, वथा ये सुरा- पानकरीरलरेपां सानं कारयितव्यमेतदेव तत््चमसतीति तिरकानां पुनरयं समादः यदा नदयैवना कामिनी मस्युपे् फटाकराय्‌

शीतमीयप्रकादाख्यटीकया सदितम्‌ ! १२

विक्षिपति वदैव ते पुप्पादिमाजो मवन्ति तथा विकसिताः सन्तो मधुवताठीं अमरयररथिं मघ मकरन्दं पाययन्तीति ।. तत्रेदं कविनो- सेकषितम्‌--पदयन्त्विति 1 पएतच्छियाभिसन्बन्वादिहारुक्तोऽपि मवन्त इत्यव क्व॑ भध्याहारयो तु यूयमिति तदघ्यादारे पद्यतेति क्रियापद प्रतक्तिः खात्‌ तया सति छन्दोम इति मबु-