विज्ञप्ति

भव तक 'कुरुक्षेत्र” का प्रकाशन उदयाचल से होता रहा है। किन्तु भ्रव मैंने उददाघल को यह नोटिस दे दी है कि. वह मुझसे लिखित भनुमति लिये बिना मेरी कोई भी पुस्तक प्रकाशित करे झ्रृतएवं 'कुरुदीत्र' का यह नया संस्करण राजपाल एण्ड संस के यहां से प्रकाशित ही रहा है

वुरुक्षेत्र! के बीस-वाईस सस्करण निकल थुके हैं चूंकि बहुत दिनों से मैं कुरुक्षेत्र! का प्रूफ नही देस सका या, इससे पुस्तक में जहाँतहाँ पनेक भूलें रह गयी थी। इस बार मैंने परिश्रम करके भूलें ध्रुधार दी हैं।

“बुद्क्षेत्र' पुस्तक कई जगहो पर पाद्य-अन्य के रूप में पढायी जाती हैं। कई प्रध्ंगों को लेकर छात्रो और धिक्षको ने मुझे पत्र लिसे थे। उन प्रसंगों में से कुछ पर समीचीन टिप्पणियाँ इस संस्करण में जोड़ दी गयी हैं ना ध्राया है, इन टिप्पणियों से छात्रो श्लौर शिक्षकों को थोड़ा प्रकाश मभिलेगा।

नई दिल्‍ली --रमघारी सिंह दिनकर १८०४-७४

निवेदन

“कुरुक्षेत्र! की रचना भगवान व्यास के भनुकरण पर नही हुई है घौर भहामारत को दुहराना ही मेरा उद्देश्य था। मुझे जो कुछ कहना था, यह युपिष्ठिर भौर भीष्म वय प्रसंग उठाये विना भी कहा जा सबता पा, कितु, तब यह रचना, घायद, प्रवन्ध के रूप मे नही उतरकर मुक्तक बनकर रह गयी होती | तो भी, यह सच है कि इसे प्रबन्ध के रूप मे लाने की मेरी कोई निश्चित योजना नहीं थी वात थों हुई कि पहले मु्के भशोक के निर्देद ने भाकपित किया भौर 'कलिग-विजय* मामक कविता लिखते» सिखते मुझे ऐसा लगा, मानो, युद्ध की समस्या मनुष्य की सारी समस्याप्रों की जड़ हो। इसी क्रम में द्वापर की भोर देखते हुए मैंने युधिष्ठिर को देखा, जो “विजय, इस छोटे-से शब्द को क्षुरुक्षेत्र में बिछी हुई लाशों से तोल रहे थे। किन्तु यहाँ भीष्म के धर्म-कथन मे प्रश्न का दूसरा पक्ष भी विद्यमान था। पात्मा का संग्राम भात्मा से भौर देह का संग्राम देह से जीता जाता है। यह कथा युद्धान्त की है युद्ध के भारम्म मे स्वयं भगवान ने भर्जुव से जो कुछ कहा था, उसका साराश भी भरन्याय फे विरोध में तपस्या के प्रदर्दात का निवारण ही था।

मरुद्ध निन्दित भौर क्रूर कर्म है; किन्तु, उसका दायित्व किस पर होना चाहिए ? उस पर, जो भ्रनीतियों का जाल बिछाकर प्रतिकार को भाम॑ंत्रण देता है ? या उस पर, ज़ो जास को छिन्त-मिन्न कर देने के लिए प्रातुर है ? पाण्डवों को मिवोसित करके एक प्रकार की दांति की रचना तो दुर्पोधन ने भी की थी; तो क्या युपिष्ठिर महाराज को इस धांति का भंग नहीं करना चाहिए था ?

ये ही कुछ मोटी बातें हैं, जिनपर सोचते-सोचते यह काव्य प्रा हो गया। भीष्म झोर युधिप्ठिर का भालस्वन लेकर मैंने इस पायल कर देने- दाले प्रइन को, प्रायः, उसी भ्रकार उपस्थित किया है, णैसा मैं उसे समझ सका हूँ। इसलिए, मैं जरा भी दावा नहीं करता कि (कुरुक्षेत्र! के भीष्म भोर

* हू इ़विता 'टामडेदी! में सुयूद्ीद है।

(६ ६.)

युधिष्ठिर, ठीक-ठीक, महाभारत के ही युधिष्ठिर भ्रौर भीष्म हैं। यद्यपि, मैंने सर्वत्र ही इस वात का ध्यात रखा है कि भीष्म झथवा युधिष्ठिर के मुख से कोई ऐसी वात निकल जाय, जो द्वापर के लिए सर्वथा अस्वा- भाविक हो हाँ, इतनी स्वतन्त्रता जरूर ली गयी है कि जहाँ भीष्म किसी ऐसी वात का वर्णन कर रहे हों, जो हमारे युग के झनुकूल पड़ती हो, उसका वर्णन नये भ्रौर विशद रूप से कर दिया जाय कहीं-कहीं इस झनुमान पर भी काम लिया गया है कि उसी प्रदन से मिलते-जुलते किसी भ्रन्‍्य प्रश्व पर भीष्म पितामह का उत्तर क्‍या हो सकता धा। सच तो यह है कि “यन्न भारते तन्‍न भारते” की कहावत भ्रव भी बिलकुल खोखली नहीं हुई है। जब से मैंने महाभारत में भीष्म द्वारा कथित राजतंत्रहीन समाज एवं घ्वंसीकरण की नीति (स्काच्ड श्र्थ पालिसी) का वर्णन पढ़ा है, तब से मेरी यह भास्था और भी बलवती हो गयी है।

जहाँ कोई भी ऐसी उड़ान श्रायी है, जिसका संबंध द्वापर से नहीं बंठता, उसका सारा दायित्व मैंने अपने ऊपर ले लिया है। ऐसे प्रसंग, श्रपती प्रक्षिप्तता के कारण, पाठकों की पहचान में झाप ही झा जायेंगे पूरा का पूरा छठा सर्ग ऐसा ही क्षेपक है, जो इस काव्य से टूटकर भझलग भी जी सकता है।

भन्त में, एक निवेदन और। “कुरुक्षेत्र” के प्रबन्ध की एकता उसमें वर्णित विचारों को लेकर है दर-असल, इस पुस्तक में मैं, प्रायः, सोचता ही रहा हूँ भीष्म के सामने पहुंचकर कविता जैसे भूल-सी गयी हो फिर भी, कुरुक्षेत्र' तो दर्शन है श्रौर कितती ज्ञानी के प्रौढ़ मस्तिष्क का चमत्कार। यह तो झन्ततः, एक साधारण मनुष्य का शंकाकूल हृदय ही है, जो मह्तिष्क के स्तर पर चढ़कर बोल रहा है। तथास्तु

झापाढ़ “+रामधारी सिह दिनकर २००३

विषय-सूची

१. प्रधम सर्ग कह हर्ट ३. द्वितीय सर्मे नल. शर-र२५ तृतीय सर्गे 222०२ २६०३४०

#. घतुर्षे सर्ग हज. अु-र४ ४. पंचम सर्ग ह+... ६४-८० ६. पष्ठ सर्ग हा... ८६-८६

७. सप्तम सर्य हा ६०-१३०

( )

यूधिष्ठिर, ठीक-ठीक, महाभारत के ही युधिष्ठिर भर भीष्म हैं। यद्यपि, मैंने स्ंत्र ही इस बात का ध्यान रखा है कि भीष्म श्रथवा युधिष्ठिर के मुख से कोई ऐसी वात निकल जाय, जो द्वापर के लिए स्वंथा श्रस्वा- भाविक हो। हाँ, इतनी स्व॒तन्त्रता जरूर ली गयी है कि जहाँ भीष्म किसी ऐसी वात का वर्णन कर रहे हों, जो हमारे युग के अनुकूल पड़ती हो, उसका वर्णन नये श्रौर विशद रूप से कर दिया जाय कहीं-कहीं इस अनुमान पर भी काम लिया गया है कि उसी प्रइन से मिलते-जुलते किसी अ्रन्य प्रश्न पर भीष्म पितामह का उत्तर क्या हो सकता था। सच तो यह है कि “यन्त भारते तन्‍न भारते” की कहावत श्रव भी बिलकुल खोखली नहीं हुई है। जब से मैंने महाभारत में भीष्म द्वारा कथित राजतंत्रहीन समाज एवं घ्वंसीकरण की नीति (स्काच्ड श्र्थ पालिसी ) का वर्णन पढ़ा है, तब से मेरी यह भ्रास्था और भी वलव॒ती हो गयी है।

जहाँ कोई भी ऐसी उड़ान भ्रायी है, जिसका संबंध द्वापर से नहीं बैठता, उसका सारा दायित्व मैंने अपने ऊपर ले लिया है। ऐसे प्रसंग, अ्रपनी प्रक्षिप्तता के कारण, पाठकों की पहचान में झाप ही झा जायेंगे पूरा का पूरा छठा सर्ग ऐसा ही क्षेपक है, जो इस काव्य से टूटकर भ्रलग भी जी सकता है।

भ्रन्त में, एक निवेदन और 'कुरुक्षेत्र' के प्रवन्ध की एकता उसमें वर्णित विचारों को लेकर है दर-असल, इस पुस्तक में मैं, प्रायः, सोचता ही रहा हूँ भीष्म के सामने पहुँचकर कविता जैसे भूल-सी गयी हो फिर भी, कुरुक्षेत्र! तो दर्शन है श्लोर किप्ती ज्ञानी के प्रौढ़ मस्तिष्क का चमत्कार। यह तो अन्तत:, एक साधारण मनुष्य का शंकाकूल हृदय ही है, जो मध्तिष्क के स्तर पर चढ़कर बोल रहा है। तथास्तु

श्ापाढ़ --रामघारी सिंह दिनकर २००३३

ला

विषय-सूची

१. प्रथम सगे हर ६-१४ ३. द्वितीय सम »*.. १५-२५ ३. तृतीय सर्गे हे पर३४० ४. चतुर्ष सगे 2०: एज ६४ ५. पंचम सर्ग *७5.. ६४-८० ६, पष्ठ सर्गे **.. ४१-५६ ७. सप्तम सर्ग 5क०.. ६०० ६१३०

मुहूर्त ज्वलितं श्रेयो, घूमायितं चिरम्‌।

ञ्ै ञै क्र

एतावानेव पुरुषों यदमर्पी यदक्षमी, क्षमावान्तिरमर्पशच नव स्न्नी-त पुनःपुमान्‌

मर के के

अवन्ध्यकोपस्यथ विहन्तुरापदाम्‌ भवन्ति वश्या: स्वयमेंव देहिनः समपेशून्येग. जनस्थ जन्तुना जातहाईन विद्विषादर:।

क्र कक डर

पापी कौन ? मनुज से उसका

न्याय चुरानेवाला ? याकि न्याय खोजते विध्न का

सीस उड़ानेवाला ?

प्रथम सर्ग

बह कौन रोता है वहाँ--

इतिहास के श्रध्याय पर, हे

जिसमें लिखा है, नोजवानों के लहू का मोल है प्रत्यय किसी बूढ़े, कुटिल नीतिज्ञ के व्याहार का ; जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि दीप॑ वलल् हैं; जो श्राप तो लड़ता नही,

कटवा किशोरों को मगर,

भ्राश्वस्त होकर सोचता, हर घोषित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की ?

भोर तब सम्मान से जाते गिने माम उनके, देश-मुख की लालिमा है. बची जिनके छुटे सिन्दूर से; शं की इज्जत बचाने के लिए यथा चढ़ा जिनने दिये निज लाल हैं।

ईद जानें, देश का लज्जा विपय तत्त्व है कोई कि केवल आवरण उमप्त हलाहल-सी कुटिल द्रोह्मग्नि का जो कि जलती रहो चिरकाल से सवा - लोलुप सम्यता के प्रग्रणी नायक़ों के पेट में जठराम्नि-सी।

प्रथम सर्ग

५१०

विश्व-मानव के हृदय निद्वंष में

मूल हो सकता नहीं द्वोहाग्ति का ; चाहता लड़ना नहीं समुदाय है,

फैलतीं लपटें विषैली व्यक्तियों की साँस से

हर युद्ध के पहले द्विघा लड़ती उबलते क्रोध से, हर युद्ध के पहले मनुज है सोचता, क्‍या शस्त्र ही-- उपचार एक अमोघ है

प्रत्याय का, भ्रपकर्ष का, विष का, गरलमय द्रोह का

लड़ना उसे पढ़ता मगर।

भ्रौ' जीतने के बाद भी,

रणभृमि में वह देखता है सत्य को रोता हुआ; वह सत्य, है जो रो रहा इतिहास के अध्याय में विजयी पुरुष के नाम पर कोचड़ नयन का डालता।

उस सत्य के आधात से

हैं भनभना उठती शिराएँ प्राण की असहाय-सी, सहसा विपंची पर लगे कोई अपरिचित हाथ ज्यों। वह त्तिलमिला उठता, मगर,

है जानता इस चोट का उत्तर उसके पास है।

सहसा हृदय को तोड़कर कढ़ती प्रतिध्वनि प्राणयत बनिवार सत्याधात की-- नर का बहाया रक्त, हे भगवात ! मैंने क्या किया ?

कस्प्तः

लेकिन, मनुज के प्राण, शायद, पत्परों के हैं बने। इस दंश का दुख भूल कर होता समर-भ्राख्ड फिर; फ़िर मारता, मरता, विजय पाकर बहाता भ्रश्नु है।

यों ही, बहुत पहले कभी कुरुभूमि में नर-मेघ की लोला हुई जब पूण थी, पीकर लह जब झ्ादमी के वक्ष का वज्चांग पाण्डव भीम का सन हो चुका परिशान्त था।

धौर जब ब्रत-मुक्त-केशी द्रौपदी, मानवी प्रयवा ज्वलित, जाग्रत शिखा प्रतिशोघ की दाँत भ्पने पीस भन्तिम क्रो से, प्रादमी के गर्म लोह से चुपड़ रक्‍त-बैणी कर चुकी थी केश की, कैश जो तेरह बरस से थे खुले!

भोर जद प्रविकाय पाण्डव भीम ने द्रोप-सुत के सोस को मणि छीन कर हाथ में रख दी प्रिया के मग्न हो पाँच ननहें बालकों के मूल्यन्सो।

कौरवों का श्राद्ध करने के लिए या कि रोने को चिता के सामने, शेष जब था रह गया कोई नहीं एक वृद्धा, एक प्रस्चे के सिवा।

प्रषम सर्ग

शौर जब,

तीच्र हपें-मिनाद उठ कर पाण्डवों के शिविर से घूमता फिरता गहन कुरुक्षेत्र की मृतभूमि में, लड़खड़ाता-सा हवा पर एक स्वर निस्सार-सा, लौट श्राता था भटक कर पाण्डवों के पास ही, जीवितों के कान पर मरता हुश्रा,

श्रौर उनपर व्यंग्य-सा करता हुश्ला--

'देख लो, बाहर महा सुनसान है सालता जिनका हृदय मैं, लोग वे सब जा चुके !।

हपे के स्वर में छिपा जो व्यंग्य है, कौन सुन समझे उसे ? सब लोग त्तो श्रद्ध-मृत-से हो रहे आनन्द से; जय-सुरा की सनसनी से चेंतना निस्‍्पन्द है।

किन्तु, इस उल्लास-जड़ समुदाय में एक ऐसा भी पुरुष है, जो विकल बोलता कुछ भी नहीं, पर, रो रहा मग्न चिन्तालीन अपने-आप में।

“सत्य ही तो, जा चुके सब लोग हैं दूर ईर्ष्या-देघ, हाहाकार से। मर गये जो, वे नहीं सुनते इसे ; हुए का स्वर जीवितों का व्यंग्य है|”

स्वप्त-सा देखा, सुयोधन कह रहा-- “श्रो युधिष्ठिर, सिन्धु के हम पार हैं ; तुम चिढ़ाने के लिए जो कुछ कहो, किन्तु, कोई बात हम सुनते नहीं।

प्रसंग

“हम वहाँ पर हैं, महाभारत जहाँ दीखता है स्वप्न अन्तःशुन्य-सा, जो घटित-सा तो कभी लगता, मगर, पभ्र्थ जिसका पग्रव कोई याद है।

“झा गये हम पार, तुम उसपार हो ; यह पराजय या कि जय किसकी हुई ? ब्यंग्य, पश्चात्ताप, अन्तर्दाह का भरत विजय-उपहार भोगो चेन से।”

हुँ का स्वर धूमता निस्सार-सा लड़खड़ाता मर रहा कुरुक्षेत्र में, प्रो! युधिष्ठिर सुन रहे भ्रव्यवत्त-सा एक रव मन का कि व्यापक शून्य का।

+रकत से सिंच कर समर की मेदिनी हो गयी है लाल नीचे कोस-भर, भोर ऊपर रक्त की खर घार में तेरते हैं श्रंग रथ, गज, वाजि के।

“किन्तु, इस विध्वंस के उपरान्त भी शेष कया है ? व्यंग्य ही तो भाग्य का ? धाह॒ता था प्राप्त मैं करना जिसे तत्व वह करयत हुम्रा या उड़ गया ?

सत्य ही तो, मुष्टिगत करना जिसे चाहता था, छत्रुप्नों के साथ ही उड़ गये वे तत्त्व, मेरे हाथ में व्यंग्य, पश्चात्ताप केवल छोड़कर

'यह महाभारत वृथा, निष्फल हुआ, | उफ ज्वल्ित कितना गरलमय व्यंग्यहै? | पाँच ही अ्रसहिष्णु नर के द्वेष से हो गया संहार पूरे देश का।

द्रौपदी हो दिव्य-वस्वालंकृता, झौर हम भोगें श्रहम्मय राज्य यह, पुत्र-पति -हीना इसी से तो हुईं कोटि माताएँ, करोड़ों नारियां!

'रक्त से छाने हुए इस राज्य को वज्त॒ हो फंसे सकूंगा भोग में? श्रादमी के खून में यह है सना और है इसमें लह अभिमन्यु का

वष्क्-सा कुछ टूटकर स्मृति से गिरा, दव गये कौन्तेय दुवेह भार से, दव गयी वह बुद्धि जो श्रव तक रही खोजती कुछ तत्त्व रण के भस्म में।

भर गया ऐसा हृदय दुख-दर्दे-से, फेन या वुदबुद नहीं उसमें उठा। खींचकर उच्छवास वोले सिर्फ वे वार्थ, मैं जाता पितामह पास हूँ।'

शोर हप॑-निनाद अचन्तःशन्य-सा लड़खड़ाता मर रहा था वायु में।

करकालेल

द्वितीय सर

आयी हुई मृत्यु से कहा झजेय भीष्म ने कि

शोग नही जाने का अभी है, इसे जानकर, रुकी रहो पास कही; श्ौर स्वयं लेट गये

बाघों का शयन, वाण का ही उपधान कर। व्यास कहते हैं, रहे यों ही वे पड़े विमुक्त,

काल के करों से छीन मुष्टि-गत प्राण कर। धोर पंथ जोहतो विनीत कहीं श्रासपास

हाथ जोड़ मृत्यु रही खड़ी शास्ति मान कर।

अजू चढ़ जीवन के शझ्रार-पार हेरते-से

योगलीन लेटे थे पितामह गमीर-से। देखा धर्मराज ने, विभा प्रसन्‍्त फ्रेल रही

श्वेत शिरोग्ह, शर-प्रथित छारोर से। करते प्रणाम, छूते सिर से पविश्र पद,

उंगली को घोते हुए लोचनों के नोर से, "हाय पितामह, महाभारत विफल हुआ

चीख उठे घर्मराज व्याकुल, प्रधीर-से।

“बीर-गति पाकर सुयोधन चला गया है,

छोड़ भेरे सामने अ्रशेष ध्वस्त का प्रसार; छोड़ मेरे हाथ में शरीर निज प्राणहीन,

व्योम में बजाता जय-दुम्दुभि-सा बार-बार ; प्रोर यह मृतक धरीर जो बचा है शेष,

चुप-चुप, मानों, पुछता है मुझसे पुकार-- विजय का एक उपहार मैं बचा हूँ, बोलो,

जीत किसकी है भोर किसकी हुई है हार ?

द्वितीय सगे

श्र

किसकी हुई है यह ? ध्वंस-प्वशेपष पर सिर पुतता है कौन ?

कौन भस्मराशि में विफल खुल हँढ़ता है ! लपटों से मुकुट का पट बुनता

ध्ौर बैठ मानव की खत-सरिता के तीर नियति के व्यंग्य-भरे अर्थ गुनता है कौन

कौन देखता है शवदाह बन्धु-बान्धवों का? उत्तर का करुण विलाप सुतता है कौन ?

"हाय, पिंत्तामह, हार

है कौन ?

“जानता कहीं जो परिणाम महाभारत का,

तन-बल छोड़ मे मनोवल से लड़ता; तप से, सहिष्णुता से, त्याग से सुयोधन को

जीत, नयी नींव इतिहास की में धरता। पग्रौर कहीं वज्य गलता ने भेरी झाह से जो,

मेरे तप से नहीं सुयोधन सुधरता ; नहीं करता मैं,

तो भी हाय, यहू खत-पांते फहीं भीख माँग मेरता |

भाइयों के संग

“किस्तु, हाथ, जिस दिन बोया गया युद्ध-वीज, साथ दिया मेरा नहीं मेरे दिव्य शान ने ;

उलट दी मति मेरी भीम की गदा ने और पार्थ के शरासन ने, झपनी कुृपाण नें ;

झहौर जब शर्जून को मोह हुमा रण-बीच, बुभती शिखा में दिया घृत भगवान ने;

सबकी सुबुद्धि पितामह, होम, मारी गयी, सबको विनप्ट किया एक प्रभिमान ने फु

हर

“कृष्ण कहते हैं, युद भनध है, किन्तु मेरे

प्राण जतते हैं पल-पल परिताप से; लगता मुझे है, क्यों मनुष्य दच पता नहों

दह्यमान इस पुराचीन भभिशापष से? भर महाभारत को बात क्‍या? गिरागे गये

जहां छतल-छप्च से वरेण्प बोर प्रापश्से, भभिमस्यु-वघध जी” सुयोधन का वध हाथ,

हममें बचा हैं. यहां कोन, किस पाप से ?

“एक भोर सत्यमय्रों गीता भगवान को है,

एक भोर जीवन की विरति प्रबुद्ध हैं; जानता हूँ, लड़ना पड़ा था हो विवश, किन्तु,

लोहू-सनी जीत मुझे दीखतो प्रशुद्ध है; ध्वंसजन्य सुख याकि साश्र्‌ दुख द्ान्तिजन्य,

ज्ञात नही, कोन वात नीति के विशद्ध हैं; जानता नही में कुरुक्षेत्र मं खिला है पुण्य,

या महान पाप यहाँ फूदा बन युद्ध है।

“सुलभ हुप्रा है जो किरीट कुरुवशियों का,

उसमें प्रचण्ड कोई दाहक अझनले है; भ्रभिषेक से क्या पाप मन का घुलेगा कमी ?

पराषियों के हित तीर्थ-वारि हलाहल है; विजय कराल नाग्रिनी-सी डेंसती है मुझे,

इससे जूभने को मेरे पास बल है; ग्रहण करूं मैं कैसे ? वार-बआर सोचता हूँ,

राजसुप लोहू-भरो कीच का कमल

दिदोय धर्म

“धालहीना माता की पुकार केभी श्राती, भौर

ग्राता कभी श्रात्तेताद पितृहीन बाल का; भांस पड़ती है जहाँ, हाय, वहीं देखता हूँ

सेंदुर पुँछा हुआ सुहागिनी के भाल का; बाहर से भाग कक्ष में जो छिपता हूँ कभी,

तो भी सुनता हूँ अट्टहास कर काल का ; धोर सोते-जागते में चोंक उठता हूँ, मानो

शोणित पुकारता हो श्रर्जूुन के लाल का।

“जिस दिन समर की श्रग्नि बुर ज्वान्‍्त हुई,

एक आग तव से ही जलती है मन- में ; हाय, पितामह, किसी भाँति नहीं देखता हैं

मूंह दिखलाने योग्य निज को भुवन में ; ऐसा लगता है, लोग देखते घृषा से मुझे,

घिक्‌ सुनता हूँ भ्पने पे कण-कण में मानव को देख आँखें श्राप झुक जाती, सन

चाहता प्रकेला कहीं भाग जाऊँ वन में।

“कहें ध्रात्मघात तो कलंक भौर धोर होगा,

नगर को छोड़ अतएवं, वन जाऊेंगा ; पणु-खग भी देख पायें जहाँ, छिप किसी

कन्दरा में बेंठ अश्रु खुलके बहाऊेंगा; जानता हूँ, पाप घुलेगा वनवास से भी,

छिपा तो रहेंगा, दुःख कुछ ठो भुलाऊँगा व्यंग्य से विधेगा वहाँ जर्जर हृदय तो नहीं,

वन में कहीं तो घमंराज कहाऊँगा।

ह० ०७ का आओ

झोर तब हो रहे. कीन्तेय, संयमित फरके सी विध श्लोक दुष्परिमेय उस जलद-सा एक पारावार हो भरा जिसमें लवालक, डिन्‍्तु, जो लाचार बरस तो सकता नहीं, रहता मगर बेचन है।

भीष्म ने देखा गगन की झोद मापते, मानों, युधिष्ठिर के हृदय का छोर; भ्ौर बोले, हाय नर के भाग! कया कभी तू भी तिमिर के पार उस मह॒त्‌ ग्राद्श के जय में सकेगा जाग, एक नर के प्राण में जो हो उठा साकार है आज दुख से, खेद से, निर्वेद के श्राधात से?”

भो' युधिष्ठिर से कहा, “तूफान देखा है कभी ? किस तरह पाता प्रलय का नाद वह करता हुभा, काल-सा बन में द्रुमों को तोड़ता-ककमोरता, झोर॑मूलोच्छेद कर भू पर सुलाता क्रोध से उन सहस्रों पादपों को जो कि क्षीणाधार हैं? रुण्ण धाखाएंँ ह्ुमों की हरहरा कर दूठतीं, टूट गिरते शावकों के साथ नीड़ विहूंग के अग भर जाते वनानी के निहत तू, ग्ुल्म से, छिनन फूलों के दलों से, पक्षियों की देह से।

पर शिराएँ जिस महोरुह की प्मतल में हैं गड़ी, यह नहीं भयभीत होता क़ूर झंकावात से। सीस पर. बहता हुआ तूफान जाता है चला, नोचता कुछ पत्र या कुछ डालियों को तोड़ता।

द्वितीय सगे पं

किन्तु, इसके बाद जो कुछ शेष रह जाता, उसे. (वन-विभव के क्षय, वनानी के करुण वंधव्य को ) देखता जीवित महीरुह शोक से, निर्वेद से क्लान्त पत्रों को झकाये, स्तब्धघ, मौनाकाश में. सोचता, है भेजती हमको प्रकृति तूफान क्‍यों ?*

पर, नहीं यह ज्ञात, उस जड़ वृक्ष को, प्रकृति भी तो है प्रघीन विमर्ष के। यह प्रमंजन शस्त्र है उसका नहीं; किन्तु, है श्रावेगमय विस्फोट उसके प्राण का, जो जमा होता प्रचंड निदाघ से, फूटना जिसका सहज श्रनिवार्य है।

यों ही, नरों में भी विकारों की शिखाएँ धाग-सी एक से मिल एक जलती हैं प्रचण्डावेग से, तप्त होता क्षुद्र अन्तव्योम पहले व्यक्ति का, ओर तब उठता धघक समुदाय का श्राकाश भी क्षोम से, दाहक घृणा से, गरल, ईर्ष्या, हेष से।

भट्ठियाँ इस भाँति जब तंयार होती हैं, तभी युद्ध का ज्वालामुखी है फूटता राजनतिक उलमनों के व्याज से या कि देश्षप्रेम का अ्रवलम्ब ले।

किन्तु, सबके मूल में रहता हलाहल है वही फलता है जो घृणा से, स्वार्थभय विद्वंष से।

युद्ध को पहचानते सब लोग हैं, जानते हैं, युद्ध का परिणाम अन्तिम ध्वंस है! सत्य ही तो, कोटि का वध पाँच के सुख के लिए !

किन्तु, मत समझो कि इस कुरुक्षेत्र में . पाँच के सुख ही स्देव प्रधान थे; युद्ध में मारे हुमों | के सामने पाँच के सुख-दुख नहीं उद्देश्य केवल मात्र ये !

मोर भी ये भाव उनके हृदय में, स्वार्थ के, नरता, कि जलते श्ोौये के; सींच कर जिसनें उन्हें प्रागे किया, हेतु उस श्रावेश फा था झौर भी।

यूद्ध का. उन्माद संक्रमशोल है, एक चिनयारी कही जागी प्रगर, तुर्त बह उठते पवन उनचास हैं, दौड़ती, हँसती, उबलती श्राय चारों शोर से।

प्रोर तव रहता कहां श्रवकाद है तत्वचिन्तन का, गभीर विचार का? युद्ध की लपटे चुनौती. भेजतीं प्राथमय. नर में छिपे दार्दूल को।

युद्ध की ललकार सुन प्रतिज्ञोध से दीप्त हो अभिमान उठता बोल है; चाहता नस तोड़कर बहना सह,

भा स्वयं तलवार जाती हाथ में!

ण््ग्ण होना चाहता कोई नही, रोग लेकिन झ्रा गया जब पास हो, तिकत प्रोषोपधि के सिवा उपचार क्या? इमित होगा वह नही मिप्टान्न से।

दितीय सर्य

रु

२५

है मृषा तेरे हृदय की जलल्‍्पना, युद्ध करता पुण्य या दुृष्पाप है; क्योंकि कोई कर्म है ऐसा नहीं, जो स्वयं ही पुण्य हो या पाप हो।

सत्य ही भगवान ने उस दिन कहा, मुख्य है कर्ता-हदय की भावत्ता, मुख्य है यह भाव, जीवन-युद्ध में भिन्‍न हम कितना रहे मिज कर्म से।'

शथ्री' समर तो शौर भी श्रपवाद है, चाहता कोई नहों इसको, मगर, जूकना पड़ता सभी को, छात्रु जब भा गया हो द्वार पर ललकारता।

है वहुत देखा-सुना मैंने मगर, भेद खुल पाया धघर्माधर्म का, ग्राज तक ऐसा कि रेखा खींच कर वाँट दूं मैं पुण्य को झऔ पाप को।

जानता हूँ किन्तु, जीने के लिए चाहिए अंगार - जैसी वीरता, पाप हो सकता नहीं वह युद्ध है, जो खड़ा होता ज्वलित प्रतिद्योध पर।

छीनता हो स्वत्व कोई, श्रौर तू - त्याग -त्प से काम ले यह पाप है। पुण्य है विच्छिन्न कर देना उसे बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ हो।

दितीय सर्ग'

बढ, विदलित झौर साधनहीन को है उचित पध्रवलम्ब झपनी प्राह का; गिड़मिड़ाकर किन्तु, माँगे भीख बयों वह पुरुष, जिसकी भुजा में शक्ति हो ?

युद्ध को तुम निन्‍य कहते हो, मगर, जब तलक हैं उठ रहीं चिनगारियाँ भिन्‍न स्वार्यों के कुलिश-संघर्ष को, युद्ध तब तक विश्व में भ्रनिवायं है।

आर जो पझनिवार्य है, उसके लिए खिन्‍न या परितप्त होना व्यर्थ है। तू नहीं लड़ता, लड़ता, भाग यह फूटती निश्चय किसी भी व्याज से।

पाण्डवों के भिक्षु होने से कभो रुक सकता था सहज विस्फोट यह। ध्वंस से सिर मारने को थे तुले ग्रह-उपग्रह क्ुद चारों श्रोर के।

घममं फा है एकः और रहस्य भो, प्रव छिपारऊं क्‍यों भविष्यत्‌ से उसे ? दो दिनों तक मैं मरण के भाल पर हूँ खड़ा, पर जा रहा हूं विश्व से

व्यक्ति का है धर्म तप, करुणा, क्षमा, व्यक्ति की छोमा विनय भी, त्याग भी, किन्तु, उठता प्रश्न हम जब॒ समुदाय - का, भूलना पड़ता हमें तप-त्याग को।

र्रे

जो भ्रखिल कल्याणमय है व्यक्ति तेरे प्राण में, कौरवों के नाश पर है रो रहा केवल वही। किन्तु, उसके पास ही समुदायगत जो भाव हैं, पूछ उनसे, क्या महाभारत नहीं शनिवाय था ?

हारकर घन-धाम पाण्डव भिक्षु बन जव चल दिये, पूछ, तब कसा लगा यह कृत्य उस समुदाय को, जो भ्नय का था विरोघी, पाण्डवों का मित्र था।

श्ौर जब तूने उलक कर व्यक्ति के सद्धमे में क्लीव-सा देखा किया लज्जा-हरण निज नारि का, (द्रोपदी के साथ ही लज्जा हरी थी जा रही उस बड़े समुदाय की, जो पाण्डवों के साथ था) झौर तूने कुछ नहीं उपचार था उस दिन किया ; सो दता कया पुण्य था ? या पुण्यमय था क्रोध वह, जल उठा था आझाग-सा जो लोचनों में भीम के ?

कायरों-सी बात कर मुझको जला मत ; आज त्तक है रहा आदर्श मेरा वीरता, वलिदान ही; जाति - मन्दिर में जलाकर शूरता की आरती, जा रहा हूँ विद्व से चढ़ युद्ध के ही यान पर।

त्याग, तप, भिक्षा ? बहुत हूँ जानता मैं भी, मगर, त्याग, तप, भिक्षा, विरागी योगियों के धर्म हैं; याकि उसकी नीति, जिसके हाथ में शञायक नहीं ; या मृषा पापण्ड यह उस कापुरुष बलहीन का, जो सदा भयभीत रहता युद्ध से यह सोचकर ग्लानिमय जीवन बहुत अच्छा, मरण अच्छा नहीं

त्याग,

तप, करुणा, क्षमा से भीग कर,

व्यक्ति का मन तो बली होता, मगर,

ह्स्रि काम

और

पशु जब घेर लेते हैं उसे, भ्रावा है वलिष्ठ दारीर हो।

तू कहता मनोबल है जिसे,

इस्त्र हो सकता नहीं वह देह का;

क्षेत्र

उसका वह मनोमय _ भूमि है,

नर जहाँ लड़ता ज्वलन्त विकार से।

कौम जीत

केवल प्रात्ममल से जूक कर सकता देह का संग्राम है?

पाशविकता खड़ग जब लेती उठा, आत्ममल का एक बस चलता नहीं।

जो निरामय द्ाकति है तप, त्याग में, व्यक्ति का ही मन उसे है मानता; योगियों की शक्ति से संसार में,

हारता

लेकिन, नहीं समुदाय है।

फानने में देख श्रस्थि-पुंज मुनिपुंग्वों का

देत्य - चध का था किया प्रण जब राम ने ;

“मतिश्नप्ट मानवों के शोघ का उपाय एक

शस्त्र ही है?” पूछा था कोमलमना वाम नें।

“हीं प्रिये, सुधर मनुष्य सकता है तप,

त्याग से भी,” उत्तर दिया था घनष्याम ने,

“तप का परन्तु, वश चलता नहीं सदेव

पदितीय सर्ये

पतित समूह की कुवृत्तियों के सामनें।” २५

तृतीय सर्ग

समर निद्य है घमेराज, पर,

कहो, जघान्ति वह क्या है, जो शअनीति पर स्थित होकर भी

वती हुई सरला' है ?

सुख - समुद्धि का विपुल कोष

संचित कर कल, बल, छल से,

किसी क्षुध्रित का ग्रास छीन, घन लूट किसी निर्वेल से।

सब समेट, प्रहरी बिठला कर

कहती कुछ मत बोलो, शान्ति - सुधा बह रही, इसमें

गरल क्रान्ति का घोलो।

हिलो - दुलो मत, हृदय - रक्त

भ्रपता मुभेको पीने दो, प्रचल रहे साम्राज्य शान्ति का,

जियो श्र जीने दो।

सच है, सत्ता सिमट - सिमट जिनके हाथों में श्रायी, शान्तिभकत ये साधु पुरुष

चाहें कभी लड़ाई ?

कुरुक्षेत्र

छुख का सम्पक्‌ू-रूप विभाजन जहाँ नीति से, नय संभव नहीं; वशान्ति दवी हो जहाँ खड़ग के भय से, जहाँ पालते हों भ्रनीति- पद्धति को सत्ताघारी, जहाँ सूत्रघर हों समाज के दे भनन्‍्यायी, प्रविचारी;

नीतियुक्त. प्रस्ताव सन्धिके

जहाँ. भादर पायें; जहाँ. सत्प कहनेवालों के

सीस' उतारे जायें;

जहाँ. खड्ग-बल - एकमात्र

भ्राघार बने शासन का; दबे क्रोध से भभक रहा हो

हँदय जहाँ. जन - जन का;

सहते - सहते प्रनय जहाँ

मर रहा मनुज का भन्र हों; समझ कापुरुष अपने को

पिवक्नार रहा जन-ज़ा हो;

पभरहंकार के साथ धृणा का

जहाँ इन्द्र हो जारी; ऊपर शान्ति, तबादले. में

हो छिन्‍कक रही चिनगारी;

सृतीय सर्य

२७

शर्ट

भ्रायी,

लड़ाई *

सुख का सम्यक्‌ू-रूप विभाणन

जहाँ नीति से, नय से संभव नहीं; अशान्ति दबी हो

जहाँ खद्ग के भय से,

जहाँ पालते हों भनीति - पद्धति को सत्ताघारो, जहाँ सृत्रधर हों समाज के प्रन्यायी, धविचारी;

नीतियुक्त प्रस्ताव सन्धिके

जहाँ. पभादर पायें; जहाँ. सत्य कहनेवालों के

सीस' उतारे जायें;

जहाँ. खद्ग -बल - एकमात्र

आधार बने शासन. का; दबे क्रोध से भभक रहा हो

हृदय जहाँ. जन - जन का;

सहते - सहते झनय जहाँ

मर रहा भनुज का मन हो; समझ कापुरष भपने

घिकार रहा णजन-ज़ हो;

प्रहंकार के साथ घृणा का

जहाँ. इन्द्र हो जारी; ऊपर दान्ति, तलातल में

हो छिठक रही चिनगारी;

तृतीय सर्म

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(चाय फ््यर

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सम हो, हो।

पर आआउम्त ल्डिप्तो स्वत व्काननोज्डिया समछित्ता स्तछ्दाहिध्याष्कत्स सतत १६ न्यू 8 2 हल

बीझान्ता +

प्र,

पर।

आऊश्वाएन

| एटजाज्ात क्षप्पत न्यात का:

जबव॑ंतक न्याय न॒ गाता, जता भी हो, मह॒व शाम्ति का

सुदृढ़ नही रह. पाता

चृतीय राग

कृत्रिम शान्ति सशंक झझाप

झपने से ही डरती है, खड़्ग छोड़ विश्वास किसी का

कभी. चहीं करती है।

झोर जिन्हें इस शान्ति-व्यवस्था

में सुख-भोग सुलभ है, उनके लिए शान्ति ही जीवन-

सार, सिद्धि दुलेस है।

प्र, जिनकी भ्रस्थियाँ चवाकर,

शोणित पीकर तन का, जीती है यह शान्ति, दाह

समझो कुछ उनके संत का।

स्वत्व माँगने से मिले,

संघात पाप हो जायें, ब्रोलो घमंराज, छ्ोषित वे

जियें या कि मिट जायें?

स्यायोचित अधिकार माँगने

से मिलें, तो लड़ के, तेजस्वी छीनते समर फो

जीत, या कि खुद मरके।

किसने कहा, पाप है समुचित

स्वत्व - प्राप्ति - हित लड़ना ? उठा न्‍याय का खड़्ग समर सें

झभय मारना - मरना ?

क्षमा, दया, तप, तेज, मनोचल को दे वृधा दुहाई,

घमेराज, ब्यंजित करते तुम - मानव की कदराई

हिंसा का आघात तुपस्था ने

कब, कहाँ सहा है? देवों का दल सदा दानवों

से हारता रहा है

मनःशक्ति प्यारी थी तुमको

यदि पोसर्ष ज्वलन से, लोग किया क्यों भरत-राज्य का ?

फिर झ्राये क्यों वन से ?

पिया भीम मे विष, लाक्षागृह जला, वनवासी,

केशकपिता प्रिया सभा-सम्मुख

कहलायी दासी

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल,

सबका लिया सहारा; पर नर-्व्याप्त सुयोधन तुमसे

कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष

तुम हुए बिनत जितना ही, दुष्ट कौरवों ने तुमको

कायर समझा उतना ही।

सूतीय सगे

३३१

[ँ

ग्रत्याचारः सहन करने का

कुफल यही होता है, पौर्ष का प्रातंक मनुज

कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को, | जिसके पास गरल हो।

उसको क्या, जो- दन्तहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो ?

तीन दिवस तक पन्य माँगते

रघुपत्ति सिन्धु - किनारे, बैठे पढ़ते रहे. छन्द

प्रनुनय के प्यारे - प्यारे

उत्तर भें जब एक नाद भी

उठा नहीं सागर से, उठी श्रघीर घधक पौरुष की

झाग राम के दर से।

सिन्धु देह घर 'त्राहि-चाहि'

करता श्रा गिरा दरण में, चरण पृज, दासता ग्रहण को,

वेंधा मूढ़ बच्चन में

सच पूछो, तो छशर में ही

वसती हैं दीप्ति विनय की, सन्धि-वचन संपूज्य उसीका

जिसमें शक्ति विजय की।

सहनशीलता, क्षमा, दया को

तभी पूजा जग है, बल का दर्प चमकता उसके

पीछे जब जगमग है।

जहाँ नहीं सामथ्यं क्लोघ को,

क्षमा वहाँ निष्फल है। गरल-घूंट. पी जाने का

मिस है, वाणी का छल है।

फलक क्षमा का भोढ़ छिपाते

जो झपनी कायरता, वे क्‍या जानें ज्वलित-प्राण

नर की पोरुष - निर्भरता ?

वे क्या जानें नर में वह क्‍या

प्रसहनशील प्रनल है, जो लगते हो स्पर्श हृदय से

सिर तक उठता बल है?

जिनकी भुजाम्रों को धिराएँ फड़कों हो नहीं,

जिनके लहू में नही वेग है श्रनल का; शिव का पदोदक ही पेय जिनका है रहा,

चुवखा ही जिन्होंने नहीं स्वाद हलाहल का; जिनके हृदय में कभी श्राग सुलगो ही नही,

ठेस लगते ही श्रहकार नहीं छतका। जिनफो सहारा नहीं भुज के प्रताप का है,

बैठते भरोसा किये वे ही श्रात्मवल का।

तृतीय सर्य

श्३

सेना साज हीन है परस्व हरते फी वत्ति,

लोभ को सड़ाई क्षात्र पर्म के विश्द है। यासना-विपय से नहीं वण्प उद्मूत होता,

वाणिज के हाथ की कृपाण हो परशुद्ध है। चोद खा परन्तु, जब मिंह उठता है जाग,

उठता करान अतिक्ोष हो अश्रबुद्ध हैं; पृष्य सिलता है चर्धहमस को विभा में तक,

पौरुष को जागृति कहाती घर्म-युद्ध है।

घर्म है हुताशन का भधक उठे तुरत्त,

कोई क्यी प्रचण्ड-वेग वायु को बुलाता है ? फूटेंगे कराल कण्ठ ज्वालामुखियों के घुव,

भानन पर बेठ5 विश्व घूम क्यों मचाता है ? फूंक से जलायेगा प्रवश्य_ जेगती को व्याल,

कोई क्‍यों खरोंच मार उसको जगाता है ? विद्युत्‌ खगोल से अवदय ही गिरेगी, कोई

दीप्त प्रभिमान को क्‍यों ठोकर लगाता है ?

युद्ध को बुलाता है श्रनोति-ध्वजघारी या कि

वह थो भ्रनीति-भाल पे दे पाँव चलता? वह जो दबा है श्लोषणों के भीम शैल से या

वह जो खड़ा है मग्न हेँंसता-मचलता? वह जो बना के शान्ति-व्यूह सुख वूदता या

बह जो भ्रगान्त हो श्ुघानल से जलता रे कौन है बु्ाता युद्ध/ जाल जे न्‍

याजों जाल तोड़ने को ऋ्‌

तृतीय सर्ग

दलितों खड ग, दे की आान्ति है )

द्श ही जोशी है, यथाथे जीषण अशारस्ति है मौन दी मत पौष्वप की श्रान्ति हैं.

ईछ की ेंवेशी फआ रण मनुष्णवा « खप्लव है क्रान्ति है!

खड़ा चुद थे डा दुक. अल हैं सी हैं सोचता, अप पु हे हे. (जघांसा 9 दक्स कैले पुं्वी अप ज्रेम, आहिसा

ये मनुज किस भाँतिप हे कर रू भाई, केसे एके प्रदाह को ' शद के लड़ाई सरल हों»

५० जा

दहुतीय से

बहे प्रेम की घार, मनुज को यह प्रनवरत भिगोये,

दूसरे के उर में नर बीज प्रेम के वबोये।

किन्तु, हाय, भाधे पथ तक ही

पहुंच सका यह जग है, भ्रमी घान्ति का स्वप्न दूर

नभ में करता जगमग है।

भूले- भठके ही पृथ्वी पर वह भादर्श उतरता, किसी सरुधिप्ठिर के भ्राणों में ही स्वरूप है धरता।

किन्तु, द्वेष के शिला-दुर्ग से

बार-बार टकरा के, रुद्ध मनुज के मनोदेश के

लोह-द्वार को पा के

घृणा, कलह, विद्वेंप, विविध

तापो से प्राकुल हो कर, हो जाता उड़्डीन एक-दो

का हो हृदय भियों कर।

बयोंकि युधिष्ठिर एक, सुयोधन

भगणित भ्रमी यहाँ हैं, बढ़े प्ान्ति की लता हाय,

ये पोषक द्रव्य कहाँ हैं?

शान्ति-बीन तब तक बजती है

नहीं सुनिश्चित सुर में, स्वरकी शद्ध प्रतिध्वनि जब तक

उठ नहीं उसपर में।

यह बाह्य उपकरण, भार वन

जो आवबे ऊपर से, झ्रात्मा की यह ज्योति, फूटची

सदा विमल अच्तर से।

शान्ति नाम उस दचिर सरणि का,

जिसे प्रेम पहचाने, खड़ग -भीत तन ही न,

मनुज का मन भी जिसको साने।

शिवा-शान्ति की मूर्ति नहीं

बनती कलाल के गृह में सदा जन्म लेती वह नर के

मन:प्रान्त निस्पृह में।

गरल-द्रोह-विस्फोट-हेतु. का

करके सफल निवारण, मवुज-प्रकृति ही करती झीतल

रूप छान्ति का घारण।

जब होती श्रवतीर्ण शान्ति यह,

भय शेष रह जाता, शंका-तिमिर-प्रस्त फिर कोई

नहीं. देश रह जाता।

तृतीय सर्ग

शान्ति! सुशीतल घान्ति! कहाँ

यह समता देनेवाली ? देखो, भ्राज विपमता की ही

वह करती रखवाली।

प्रानन सरल, वचन मधुमय है,

तन पर शुभ्र वसन है, बचो युधिष्ठिर ! इस नागिन का

विप से भरा दशन है।

यह रखती परिपूर्ण नूपों से जरासन्ध की कारा,

शोणित कमी, कभी पीती है “तप्त अशथ्रु की पारा।

कुरुक्षेत्र में जली चिता जिसकी,

वह प्रान्ति मही थी; प्र्जुंन फी घन्वा चढ़ वीली,

वह दुष्करान्ति महीं थी।

थी परस्व-प्रासिनी भुजंगिनि,

वह जो जली समर में, प्रसहनझ्ील थोये था, जो

बल उठा पाये के छ्षर में।

नही हुमा स्वीकार घान्ति को

जीना जब कुछ देकर, टूटा पुरुष काल-सा उस पर

प्राथ हाथ में लेकर।

पापी कौन ? भनुज से उसका

न्याय चुराने. वाला ? याकि न्याय खोजते विध्च का

सीस. उड़ाने वाला ?

कुरुक्षेत्र

अआतु्े सर्म

चतुर्थ सर्म

ब्रह्मचय के ब्रती, धर्म के महास्तम्म, बल के प्रागार,

परम विरागी पुरुष, जिन्हें पाकर भी पा सका संसार।

किया विसर्जित मुकुट घम-हित

भ्रोर स्नेह के कारण प्राण, पुरुष विक्रमी कौन दूसरा

हुप्ला जगत में भीष्म-समान ?

हारों की भोंक पर लेटे हुए गजराज-जैसे, थके, टूटे ग्रड़-से, ख़स्त पन्‍्नगराज-जेसे, मरण पर वीर-जीवन का भगम बल-भार डाले दबाये काल को, सायास संज्ञा को सेंमाले,

पितामह कह रहे कोन्तेय से रण की कया हैं, विचारों की सड़ी में गूंथते जाते व्यथा हैं। हृदय-सागर मधित होकर कभी जब डोलता है, छिपी भिज येदना गंभीर मर भी बोलता है।

“बुराता न्याय णो, रण को बुलाता भी वही है, युधिष्ठिर ! स्वत्व को प्न्वेषणा पातक नहीं है। नरक उनके लिए, जो पाप को स्वीकारते हैं; उनके हेतु जो रण में उसे ललकारते हैं।

४२

“सहज ही चाहता कोई नहीं लड़ना किसी से; किसी को मारना श्रथवा स्वयं मरना किसी से ; नहीं दुःशान्ति को भी तोड़ना नर चाहता है; जहाँ तक हो सके, निज शाच्ति-प्रेम निवाहता है।

“मगर, यह क्षान्तिप्रियता रोकती केवल मनुज को, नहीं वह रोक पाती है दुराचारी दनुज को। दनुज क्या शिष्ट मानव को कभी पहचानता है ? विनय को नीति कायर की सदा वह मानता है।

“समय ज्यों बीतता, त्यों-त्यों श्रवस्था घोर होती, श्रनय की ख्ूंखला बढ़कर कराल, कठोर होती। किसी दिन तब, महाविस्फोट कोई फूटता है, मनुज ले जान हाथों में दनुज पर टूटता है।

“न समभो किन्तु, इस विध्वंस के होते प्रणेता समर के श्रग्रणी दो ही, पराजित झौर जेता। नहीं जलता निखिल संसार दो की प्राग से है, प्रवस्थित ज्यों जग दो-चार ही के भाग से है।

“युधिष्ठिर ! क्‍या हुताशन-शेल सहसा फूटता है ? कभी कया वज्र निर्घन व्योम से भी छूटता है? प्रतलगिरि फटता, जब ताप होता है भ्रवनि में, कड़कती दामिनी विकराल धूमाकुल गगन में

“महाभारत नहीं था द्वन्द्र केवल दो घरों का, प्रनल का पुंज था इसमें भरा श्रगणित नरों का। केवल यह कुफल कुदयवंश के संघर्ष का था, विकट विस्फोट यह सम्पूर्ण भारतवर्ष का था।

कुरुले

च॒तुर्ध से

हि गों से विश्व में विप-वायु बहती शा रही थी, रेत्री मौन हो दावारिन सहती झा रही थीं; परस्पर वर-शोघन के लिए तैयार ये सब, समर का खोजते कोई बड़ा घाघार थे सव।

“कही था जल रहा कोई किसी को शूरता से। कहीं था क्षोम में कोई किसी की करता से। कही उत्कपं ही नृप का नृपों को सालता था। कहीं प्रतिद्योध का कोई भुजंगम पालता था।

“निभाना पार्थ -वध का चाहता राधेय था प्रण। द्रुपद था चाहता गुरु द्वोण से निज वैर-शोघन। दकुनि को चाह थी, कंसे चुकाये ऋण पिता का, मिला दे घूल में किस माँति कुरु-कुल की पताका।

“सुयोधन पर उसका प्रेम था, वह्‌ घोर छल था हितू बन कर उसे रखना ज्वलित केवल भनल था। जहाँ भी आग थी जेसी, सुलगती जा रही थी, समर में फूट पड़ने के लिए शझकुला रही थी।

“सुधारों से स्वयं भगवान के जो-जो चिढ़े थे, नृपति वे क्रुद्ध होकर एक दल में जा मिलेथे। नही शिशुपाल के वघ से मिटा था मान उनका। दुबक कर था रहा घुंघुमा द्विगुण प्रभिमान उनका |

“वरस्पर की कलह से, वैर छे, होकर विभाजित, कमी से दो दलों में हो रहे थे लोग सज्जित। खड़े थे वे हृदय में प्रज्वलित भंगार लेकर, घनुज्या को चढ़ाकर, म्यान में तलवार लेकर।

“था रह गया हलाहल का यदि को रूप. अधूरा, किया युधिष्ठिर, उसे तुम्हारे राजसूय ने पूरा।

“इच्छा सर की और, झऔर फल उसे नियति है, फलता विष पीयूष-वृक्ष में, अकथ प्रकृति की गति है।

“तुम्हें बना सम्राद देश का राजसूय के द्वारा,

केशव ने था ऐक्य-सृजन का उचित उपाय विचारा।

“सो, परिणाम और कुछ निकला, भड़की आझाग भूवन में,

हेंष अंकुरित हुआ पराजित राजाग्रों के मन में।

“समझा पाये वे केशव के संदुद्देश्य निरछल को।

देखा मात्र उन्होंने बढ़ते इन्द्रप्स्थ के बल को।

“पुजततीय को पृज्य. मानने

में जो वाघा-क्रम है, वही मनुज का अहंकार है,

वही मनुज का भ्रम है।

कुरुक्षेत्र

चतुप सर्गे

“हुद्धप्ररथ. का मुकुट -छत्र

भारत भर का भूषण था; उसे नमन करने में लगता

किसे, कोन दृषण या?

“तो भी ग्लानि हुई बहुतों को

इस भ्रकलंक नमन से, अमित बुद्धि ने की इसकी

समता पअभ्रमिसान - दलन से।

"इस पुजन में पड़ी दिखायी

उन्हें विवशता प्रपनी, पर के विभव, प्रताप, समुन्नति

में परवशाता प्रपनी।

“राजसुय. का यज्ञ लगा

उनको रण के कोशल -सा, निज विस्तार चाहने -वाले

चतुर भूपष के छल-सा।

“घमेराज ! कोई चाहता

झहंकार निज खोना, किसी उच्च सत्ता के सम्मुख

सन्‍्मन से नत होना।

“प्भी तुम्हारे ध्वज के नीचे

भ्राये थे भ्रणय से, कुछ आये ये भवित-भाव से,

कुछ कृपाण के भय से।

“मगर, भाव जो भी हों, सबके हे एक वात थी मन में। रह सकता श्रक्षुण्ण मुकुट का के मान ने इस बवन्दन में।

“लगा उन्हें, सिर पर सबके

दासत्व चढ़ा जाता है, राजसूय. में से कोई

साम्राज्य बढ़ा श्राता है।

“किया यज्ञ ने मानव विमदित