(६ (

3 (0 (&

"६ | तं

& . £ ¢

9.

(^

४1

सार = $ इ्योपनिषद्‌ `

- मापा रीकानहिति॥

& नेसमें & कार स्वरूपका प्रतिपादन ब्रह्म योर अत्माकफी 4 अभेदताका निखूषण,जगमःयवैतथ्याख्य, अद्धि -६ ताख्य अलातशान्ताख्य इन चार प्रकरणं

मनं अच्जेप्रकार निरूपण कियागयाहे

एत्म्ते

(9

दै

9

44624248

12८ 24८ ><

{२

(५) रक) 2. पिन

ऋ. $~ ~ | ॥।

ये

श्रीमान्‌ संवैश्वय्ये सम्पन्न श्री मुशीनवलकिशोर्जीने भारतः

चर्पौय जनोके उपकारार्थं वहुतसा धन व्ययकरकं कोलाख्य मगर निवासी परचोकती यमुनाशकग नागर त्राह्मणु से स्रत देश भापामे उत्याकराय स्मयतालय

{&ः

द्वप

2 4 | मे मुद्रित यय प्रकाशित किया ककः रै

1

1 दियं नार

{६}

3

स्‌ (+ 0

सखन मुखी नयलकिशोर ( सा श्रा, ईं ) के दछपिखान दपा सगय सन १६०७ ई० 4

[व + 2 ०४

पठः (554

[01

( (०५.

4. \

0402 { ¢ [१ ग: ~

= * = >

द्रम क्रिताव का हवमहषूव हैः य्ह दम द्योपयानं मे

क्ष % * भमिका

© < + = 8

0 ५४४

स्वसुन्ञ आरमजिज्ञास्च पुटक जनको विदित करि यदसर्ं उपनिवदोका सारभतं महाउपनिपद्‌ सड़क्यनाम ऋषीष्ठवरद्यारा इस मनुष्यलोके पकटहुभाहे अतप्त इसका माड्क्यउषनि- इस नामुसे कहते ! अथवा जेसे दादर (मडक ).भायम्तीन छांग (कुदान ) मारके जलमे परपहीवा्ै, सदी भआकाह्पी मेडम जामदादहि अवश्थारूप पादरूपी स्थाना पते उक्र फे अपने वा- स्तविक निरुपधि ब्रह्मरूप जङकरो प्रा्तहाताह अथात्‌ अन्तः- रण विशि आर्मरूय मेडकः इस उपनिषद कं तिचारर्प्र वलते, परथमं जायदवस्यादि प्रथम पादृरूप्‌ स्थानत "उचरूरकेः स्वधाव . स्थादिरूप द्वितीय पादरूप स्थानको-प्रातहोता दै, पश्चात्‌ उन स्वंभ।वस्थादि पादह्प स्थानसेउख्ट सुखि अवद्थारिरूप तृर्तर- यपाद्ह्प स्यानको प्रांघदोताहै, पनः उत्त तृतीय एषद्प स्यान ~ उछूरके चतु अमाच्रिक्र अपने परव्रह्मदङ्प रको माप्त होता शिवमदधेतं चलथ मन्यन्ते. समरसा सविज्ञ शतिसभा- तमरूपं मडकका प्रतिषेद्क्‌ होनेते इस उपानिपदरको माद्द्य , नामस क्तद्‌ " अरु यह्‌ उपानपद्‌ 4 वहयसस्था.स्रत्खमत्ति + \ एततदालम्बनेभ्रठमेततदालम्यनेपरम्‌, पतदाखम्बनेज्ञत्ा त्रस रोकेमदहीयते इत्यादि" दुतिय प्रमाणसे, सेर्गसिये करे -उाश्य अरु वह्यपा्िमं से्व्वोत्तम भे अ!खम्बन.जे प्रिसाधिकः उअन्कार, केवल तितकाष्ठी परातिषादक अरव आस्माकी अमेददा का घौधकदने> सवं उपनिपदुसं सख्ये ! अञो क्यपि को पिताक कि सदी उपनिषद्‌ बद्धं जास्पाकी यभेदरदाकरे सोधन तध इस क्या विदोपनाह, नो तिश्तका धह समाधान कि जन्यः

( > )

ज्ञे उरनिषद्हं सो बह्म आस्माकी-अभेदताके वाधकंहं परन्तु उन ख्टिक्रण अरु पाणादिकोदी उपासना आदिक अन्य प्रसंगभी अरु इस उपनिषद केवल उभ्कारके श्रतिपादनसे ब्रह्मभाता की अभेदताही प्रकाशित है,तिससे इतर खष्टिकरणादिक न्दी अतप "यष्‌ उपनिषद्‌ केवर व्रह्म आरमाकी अभेदताका वधक होनेते सवे उपानेपदोमें सख्ये 1.अतदेव उक्त हेतुओंकररे इस उपनिषदको मुख्यत होनेते श्रीशकराचास्यै महाराजके परमगुर श्रीमोडपादाचा्यं छत इसफे अर्थवोधक शलोकवद्धं कारिका है, तित काचकेचारध्रकरण नह.प्रथम आगमशध्रकरण, हविती- धं वैतध्याख्वप्रकरण, ठतीय अद्धेताख्य प्रकरण, चतुथं अरातङ्ा- स्ताख्प प्रकरण, इप्तपकार चार्‌ प्रकरण 1 अर्‌ उन च।रोपधरकरण से वाद्य दइमभापा भाप्यकाररृत सव उपनिषदोरमसे संमहकिया प्रणवोपसनः, अरु स्तसि्ान्तियौ के मतानुसार प्रणवोपासना "अरं प्रणवकेडग्यारादिदर्पनामेकि अर्थविवार, अरु अन्यतऋपियोके मतानुलार मात्राञेकिभेदेसेउपासनयिचार,अरु अकारादि माच्रा का कमराः खय चित्तवनविचार, इन सर्वके संयहका, एक संह प्रकरणनाम पचम परकरणभी काहि, सो एतदथेहे कि प्रणवो. समाके जिज्ञासको इस एफदी पुस्तक के अवलोकन से असेक ऋपियेकि मतानुसार उनकारकी उपासना जानने मे अवे अर्‌ श्रीग्तैडपादीय कारिका सहित इस उप्रनिपद्रपर श्रीभंगवस्पाव्‌ पुय श्ीरंकराचास्यजीरृत संस्छृत भाष्य हे अर त्तिसभाप्यपर संस्कृतम आनन्दगिरिक्ृत टीका, अरु तिप्त माप्य अर दीकाके अनुसारी द्विजवर श्रीपंडितरोज पीतीम्बरजी महाराज कृत भाषा दीपिकानामदीकाहे अरु जेते सम्यक प्रकार संस्छरत विद्धाके अभ्यास विना अर फिसीश्रोनिय वह्नि आचार्य्ये अन्ययन क्रिये चिना समाप्य उपनिपर्दीका अर्थं जानने मँ आते नदी, अरु सैत्तदी जो केवर भाप्यके अक्षरानुसारहीं जे पेडित पीनाम्बरजी छत अक्षरे टीका तिसका भी यथार्थं जानना सर्वं

साघाश्णपरुषों को समस नहीं एतदथ नै श्ीपरखिाजाचार्य्यं परमहस स्वामी च्ह्मानन्द-सरस्प्रतीजी मदहाराजका.अतततिभस्पक्ञ शिष्य यमुनादौकर नामक नागरं व्राह्मण, उक्त ' भाष्यकार .अरं टीकाकार के कहे अनुसारही'मापामाप्य नामक्त टीका करता , तिस अपनी अस्प बुद्धिर अनुसार कुछ विदेप भी करदा

„< ५. ८. -सत्वसे साधारण विनय

*" -मुङ् अल्पककस्कं `क हुय .दस - माइक्यडपानपद्‌ कं मापा भाष्यरमजों कृद्ु'जनुचत.कृथन्हाच (तत्तका सवविवेकी पाठ कजने क्षमाकरके 'सुधारखव इत 7. भ. ~

. - सूचना इस भापोमाप्यान्तर चिकी {~ `. इसःचिष्ान्तर मे भापान्तर भर श्चुति, श्टोक -€: इस. चिद्ान्तर मे मांपान्तर श्चतिःश्छोकके अक्षराः ५; इस चिह्कान्तरमेप्रमाणत्रिपयक अन्य श्चति, दखोक 1 {६753 इस विह्णान्तरमें परसाणविषयक श्चुतिश्लोक्रकेअक्तरा्? {इस चिहान्तसम सेक्षेपरसेः जनन्दगिरिका-अक्षराश.॥ {इस चिहान्तर :-भाधाभाष्यकारेद्चत -अधीनुवाद 1 र, +इत्यादि-चहुःसाधारण. विराम ~

ति चिहुस्तचना

(^४)

अध शान्तिपाटः॥ { ॐ” सहनाववतुसहनेभनक्तसहवीय्य करवावहै तेजस्वीनाव तमस्त माविद्धिपतं > उण्डान्तिः शन्तिः शान्तिः शन्तिःपाटगुस्‌ स्तुति

उण्शुच्नोमिन्नः शवरणः शच्ोमवलर्स्यमाशचदन्दोव्हस्पतिः शन्नोविष्ाररुक्रमः नमोव्र्मणनमस्तेवायोतमेवश्रतयक्षबरह्मासि व्यमेव प्रत्यचनह्मवदिप्यानि्तंबदिष्याभिसव्येवदिष्यामितन्माम धतु तद्रक्ारमवतुभवतुमामवतुवक्तारम्‌ शान्तिः, 11 अश््रह्मविद्‌्नोतिपरम्‌ ॥, ~ ॐ” सद्य्नानमनंतब्रह्म “सोयमास्मा” ¶न॑तःपर्ञेन वहिः शरततनोभवतोप्रस्तं नपन्ञानवनेनप्ज्ञं नापन्ञे जदषटमव्यवहा्ममा छमलक्षणम्‌ चिन्त्यमल्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं मरपचोपरास शिवम्द्रैतचत्मुमन्यन्ते? “सआत्मा, अपहतपाप्मा विजसेविभ स्यर्विरोकाविजिघत्सापिपासःसस्यकामः सत्यसंकल्पःसोन्येष्टव्य सविजिक्ञासितव्यः+ “तद्रहेति" “इदेवान्तभरीरे सोम्यसपुरुषः? निदितेगुहा्या१ रदयतखथयाघ्ुद्धधासक्ष्नयासक्षमददिनिः “ञआत्मावाअरेदव्योम्रोतव्यो मन्तव्यो निदिष्यास्तितव्योसाक्षा सञचैति? “सयोह वे तसपरमं ब्रह्मवेद ब्रह्मेव भवतिः” - < { नात-परमस्ति ्रह्यानन्देपरमष्ुखदक्वलन्तानसात्त „+ शद्वहदातीतगगनतसरशतस्रमस्यादिरक्ष्य? ` “एक्रंनिव्यंविमरुमचरंसव्वधीसा्षिमतं" “सावात्तातत्रयुणराहेतखद्गरंतचभामि

#

श्रीपरमासने नमः॥ अथ अथ्वेदीय ~

मांड्क्योपनिषद्‌-

श्रीगोड़पादीयकारिका सहित माङ्क्योपनिषद् भारभ्यते | शरमद्धाप्यकारस्वामी शीश्कराचाय्यंृत-॥ 1

` मगलाचरणम्‌

प्रज्ञनाराप्रतानःस्थरचर्‌नकरठ्यापमिन्याप्यला कान्‌ सुक्काभांगान्‌ स्थष्ठान्‌ -पुनर(वधषणद्धासतन्‌- कामजन्यान्‌ पीत्वासवान्‌ विद्रषान्‌ स्वपित्तिमधरम्‌ उद्राययाभोजयच्चोमायासंख्यातरीय 'परमण्तमजब्रह्यम त्त्तोऽस्मि१॥ ,., ,, = हे सोम्या भाष्यकार शीश्ैकराचाय्यं कहते हैँ किं५परमरत- मभ व्रह्म यत्तन्नतोऽरस्मिः €्ममरत अज जो परत्रह्म हे तिसको मे नमता ( नमस्कारकृरता ) हाः [ अर्थाद्‌, ` श्रीमोडपादाचा्य ` को श्रीनारायणके ( वा श्रीद्चकाचा्य्े ) प्रसाद से प्रा्तट्ये, अरु मांड्क्यङंपनिपद्के अथैको प्रकटकरनेके परायण जो श्रीगोड़पा- वाचारथङ्कत कारिका सक्ञक दरोक तिन सहित मांइक्योपनिषद्के व्याख्यान करनेको इच्छां केरैतेहुये सगवार्न भाष्यकार शरीराङ्करा चास्यै आपकरके करने को इच्रिति भाष्य -तिसकी निर्िष्न समासि के अपेपर देवता के स्वरूप के स्मरणपर्थक लिष्टाचारखूप प्रमाणकरके सिद्ध तिस पर देवाकरे अथं नमस्कार रूप मगखा- चरणकोकरतेद्रये,अर्थस्ेहसभन्यसे आरभ विपे चांधितं षिपयादिक

[1

मांडक्योपनिषद्‌ 1

{अथीत्‌ थन्थकर प्रयोजन, रिषय, सम्बन्ध, अरु अधिकारी चार प्रकारफे अनवधको भी सचित करतहं 1 तिने विधिमुखसे वस्तु का प्रतिपादन, इस पकरिया को देखावतेहं अर यर्हा { ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि (जो पर्रह्म है तिसको मे नमतां ) इस कहने करके मे (इसअहं) शाव्दकेदिपयद्यंपदके सक्षय भथकी तित तत्‌ शब्दके रक्ष्या्भते एकता के स्मरणरूप नमनको सचितकरनेवाले आचाय ने तत्पदके छक्ष्यार्थरूप चद्मका भ्रत्यगास्सापना सचन करके तयप अर त्वैपदके अथेकी एक्रताहप यन्धकरा विषय सचि- किया।भर्““यत्‌ (जो)इस शु्दको प्रसिद्ध अर्थका प्रकारक होनेसे वेदान्तशाचर करके प्रसिद्ध जो व्रह्म हे तिस्तको भें नमता, हौ, इत सवन्ध से मङ्कचरणभी श्चतिकरफेही करते है 1 अर बरह्मको अद्धितीय होनेसे्टी जन्ममरण के अभाव से अथीत्‌ एक अद्वैत परिपणे अखण्डत्रह्म मे जन्ममरणके हेतुरूपद्ेतका सभाव ताते! “अमरतमञ ( असरत अरु अजन्मा ) इस भकार केषा हे अरु जन्म मरणरूप जो बन्ध है सोई ` ससार ठे. अरब्रह्म मँ जन्मरणकूप बन्धलक्षण ससारका अत्यन्ताभाव हे! ताते तिस वन्धके निपेषसे अएरमातरिपे स्वरूपतसेही अससारीभाव्रके देखा- वनेवाे आचार्यने,यहा अनर्थोकी निषृचतिरूप इस मन्थका प्रयोजन प्रकाभित किया हे ] वो परघम कैसंहि 4 पृजनानाज्च पूतनः; पृङ््ं जञएनरूषे अर्थात्‌ [ जन्‌ वेदान्ता उपनि- पट्‌ प्रमाणे सिद्ध, बह्म, स्वरूपप्ने अद्वितीय अरु अस्तसारी तच तान अस्या करक युक भाक जावहं इसपकारका अन्‌भव. यैसेहोतांहे 1 अरु { जीवको दुःखसुखका { भोगावनेवालप-कोरई, वरद इसथकार केसे श्नवणहोताहे \ अरु विषर्ोका समरहरूप भोञ्य ( सोगनेयोग्यसामयी ) { बह्मसते {भिश्च कैसे ₹णभवती स्ये यह्‌ सवपएक अद्वतातप प्वराघक्र प्राप्तकरेमा यह आर्ष काकरके एकञदरेत ्रद्मविपे "जीव, जगत्‌, अरु इश्वर, यह सर्व 1 रञजुमरं सप्वत्‌। कन्पिति सभग हे , इसमभिभ्रायसे यद्कदते

माङ्कयौषानेयद्‌ 1 ७. ] जन्मादि { जायते ¡ अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, बिपक्षीयते विनश्यति, यह पट्भाव्र ¦ विकार रहित पृष्ट ज्ञानस्वरूप जो ग्रह्महे परज्ञानव्रहये "( घक्ञान बद्वह) इसश्चुति पमाणत्ते, ! तिस सूर्यवत्‌ विम्बस्थानी वर्मे किरणरूप, जो स्यैके पतिषिम्ब के तुस्य निरूपण किंयोहै 1 अरु विभ्वे तुस्ये क्षसे थक्‌ वा भेद फरके असत्य चिदाभात्त (चेतन्यत्रह्मकाआमास ) जीवंहे, तिनके घृक्षाटिक स्थिर, अरु मनुप्यादिकचर,' इसप्रारके उद्धिजारि व्वारखानिके स्थिर चर प्राणियों के समूह पिवे व्यापनेवारे वि- स्तरो से रोक जो विषय तिनके अथ व्यात्तहाके [ इख फथनते उक्त िपयोते जीर्योका सस्वन्ध कटा ] देवत्ताकं अन्यह साव ब्यन्द्िर्योद्वाय व॒दिके तिस तिस विपयाकार परिणामसे जन्य- तारूप अतिशय स्थृखतागाङ सुखटुःखके साक्षारसररूप भोगो को भ्ोगिके, अर्थात्‌ [ यदह ' तानूमुच्छा” (तिनको भोयके) इस पसे अर ^ स्वपितीति” { सोवता है { इस आधिमकहने के पदसे सम्बन्ध हे इसत कथनते जाथद्वस्या त्रह्मरिपे कल्पित है, पसा कहाजानना ] पुनः [ यहा तिद ब्रह्मपिपे सस्री छस्पनाको देखावत हें ] बुद्धित्ते घकाशितहये, अरु अविद्या, काम, अर कर्प, से जन्य भोगोको भोगके स्र [ उसघकार्‌ बरह्म विपे { जाप्नत्‌ स्वन्न ¦ दोनों अव्रस्थाकी करपना को डेखायके अव तहांहीं खपक्तिरी कल्पना देखातरर { जाथत्‌ अर स्वभ्ररूप स्थल अर स्नदम षिपर्यो को अन्नञातरूप अपने आद्सा धिपे ङ्य करके जो बरद सोता है, अर्थात्‌ कारणकरे अभाषते ।स्थित "तहि, अरु जी मधरमभक [ सपसिपिपे आनन्ठवी प्रधानता 'इस अभिप्रप्यते व्रद्मको { मघुरथ्क्छ वा आनन्दश्क््‌ { यह विशे- पण देते ] ( आनन्दका भोक्ता ) है, अरु जो च्च पतिविभ्व्रके तुस्यहूमा हमरिरविपे मायात सिभ्यारूपा, तीनो अवस्था सध- ` स्थीपनेवत्‌ सम्वन्धीपनेको सम्पादनकरके दमकोमायासे सोगा- - वता वत्तनाह ¡अस निनमायाकल्पिन मिष्यासंग्याकी्ये-

अ.

स॑ माड्क्यापानपद |

}विर्वाटमा तवन्‌ विषयानपाश्यभोगन्‌स्थवष्ठा नू परचान्चान्यातस्वमात विभवानज्योतिषास्वेनसच्ना सू) सखयानेतानपनर पशन स्वात्मनिस्यपायल्वा हि ल्वासर्वानविदषानावगतयुएगण पाटसानस्तरायः क्वासि तरीय ( चतुय ) {अयात्‌ शुद्ध आातमाका चतु संख्याते कदा है सो मायाकररे कदिपत = जाधदत तीनोंअवस्था तिसकाभपे- क्षातते है नतु सवेसंख्याऽतीत वप सख्या कोई नदी [ तिषषही ब्रह्मकोतीनोभवस्थासे एयकूहानकरक तिसकीक्ञानमाच्र स्वरूप- तातो देखत्र ] मरणरहित्‌ अष्टृत अर जन्मरहित अज, पर [ अथात्‌ व्रह्मकरा मायावी होनेकरके तिस धिपे [नङ नावचग घ्रासिकी आद्धोकाकरे तिस्तके निवारणाय \१२ + यह्‌ पदकरके उरङृ्टताही किये हे, क्योंकि व्र कामाया (आरोप ) दारातत मायासे सम्बन्धक हयेभी स्वरूप करक मायात व्रह्मका सम्वस्य नही क्याकितुर्य जातीय वाचमोप्देकवाला का सम्बन्ध सम्भ वे हे अस बरह्म सस्यनैतन्य आनन्द निगुण पकर अर्‌ माया तितत पिपरीतति अस्तव्य जडटुःख सगुणनानारूप वारा, तात उक्त प्रकारके ब्रह्माका उक्तप्रकारका माया्त्तम्बन्ध स्वरूप सहा सभवे नदीं ¦ प्तदये ब्रह्मवि केसे निर्ष्टताहोवेग। 1 कन्तु सी ख्षार भी नहीं 1 यह अर्थैहे ] ब्रह्मकेअथमं नसस्कागकरता १॥ सोम्याजो [पथमदलेक विपे विधिुसवस्तु* प्रातिगादन की प्रतिक आग्नपकरङे तत्‌' पके छष्य।भथसे आरभ करके {तेसकी * खं ' पदमे, रुच्या भृत भ्रस्यमारमस्त्ररूपता प्रतिपादन किया अरुविपय अरु फलके कथन स्त, सम्वन्य, अरु आधका सचनकरिये ! भव इस द्वितीय ररोकषिपि निपेषमुसद्राया वस्तु मोल्रफे प्रत्तिपादनकी प्रतिक्धाको आश्चय करके * सं, पदुकेवार्यःे ते प्रारम्भकरफे तिसकी ° तत्‌ , पदके लक्यां भ्रतभससारी - दद्ध बश्मरूपनाकी प्रतीति करानने दु तहां प्रथम श्छ, पदं

. सादुक्योपनिषद्‌ &

सक्ष्ार्थरूप स्वतःसिद्ध विदात्माविपे मासेपित जाथददस्थाकों उखहरण करते ] यह परत्यगारमा अधिष्या अर्‌ कासे उसन्न हये जे धमे अधसंरूप विधि तिससे जन्यजे रय्योदेक देवत तिनके अनुयह सहित बाह्यकरण ( चक्रादि इन्दिय ) द्रारादुदि करे परिणाम विषयं होने करके अत्यन्त स्थल अरु भोमने के योग्य होनेकरके भोगदाब्दके वाच्य सोर्योको साक्षात्‌ अनुभवः करफे स्थितम, पवी पंच सहाभरत अरु तिनका कायहप स्थर जगन्मय विराटरूका शुरीरस्प 'विश्च है तित जायत्‌ स्थानरूप विश्वपे अहुमम (मं अर भेरा) यह अभिमाने वानहा पश्व ( विदगणमिसानी ) जीवरूप ह्येता है अरु पश्चात्‌ [ अलतिसही चेततन्य आत्मा दिपै खवस्नावस्थाके आ- रोपप्ते कहते हँ ] जे जायत्‌ के हेतु कर्म तिनके क्षयष्ठोने ते अ~ नन्तर स्वश्रफे हेतुजे कमं है तिनके उद्धव होनेते जाधत्‌के स्थर विपये से इतरः; अर तिसदी हेतुसे सूच्म, भर बाह्य इन्रि्योको विष्यो से निदत्त होनेकरके अविद्य, कामः कम्म, इनसे भरे रणाकरो प्रातं अपसी बुद्धि तिलके श्रभावसेही उत्पच्चहुये अ~ न्तःकरणकी वासनाञ्नय, अर स्वश्चविये भी स्वयीदिकों के प्रकार के [ जो केवर जायत्‌के सय्योदिकों के भकाशके संस्कार यक्त ्ुद्धिकरके कस्पित हं ! अस्तहुये केवल स्व्यज्योतिः } आस्मरूप शकश करकेही श्करशद्धेत हये सयत्र जियें ये जे भोस्यस्द्ः तिनको अन॒भव करके, अपचीह्त तन्मा्राल्प पचमहाभ्त अरु तिनके काथिरूप सक्षम अपचय हिरण्यगम के शरीररूपं स्वप्रावस्थाक ताद्‌ आयसान्‌ { अहसम्‌ (मं मेरा ) भाव {करता हुआ 1 चेतन्यआत्माही { तेजस्ननामक उगीरूप होत्ता हे पुन अत्र तिसद्यी .चिदारमाविपे सप्ति अव्रस्थाकी कल्पना को देखा- वे हे 1 भी स्थूख अरु दुदम उसय शरीररूप उपाधिद्ध(रा जायत्‌ अर स्वप्ररूप उभय अवस्थारूप स्थार्नाविपे घ्रत्ति दोनेते हअ

जो श्रम तिमकी उसचन्तिकते अनन्तर त्ति श्रमके परिस्याग करने

१९ माडकष्योपनिषद्‌ 1

की इच्छाके होनेसे स्थूख अर्‌ सदमके विभागकररके जायत्‌ अह स्वप्रलप उभयस्थानो छिपे 1स्थतः, ईन घसम विपे प्राये सवं भी संप्य्प व्िगे्षो को धीरेसे 1 कमराः वा चनाह क्रमशः सङ्गात कारणरूप अपने स्वरूप धिषे अथात्‌ सपति उठके क्ता है फि पेते सोये जो इछ भी खचर रदी इस अक्षात ल- क्षणवान्‌ कारण अविद्या तिक एद्सन्ताका अभाव हः क्योकि उस अज्ञात अवियाका परिणाम उसके भरकाशक साक्षा अ्ान ज्ञानस्वह्प आत्माविये होत्ता दै जेते कल्पित सुपका रज्ावव अर जिसका परिणाम जिस अधिष्ठनखूप होताहै सो उलहाका स्रूप होतादै, ताते अपनी प्रयद्‌ सत्ताके अभाव्रसे अध्यस्त अ- व्रिज्ञातख्प अविया मी सवपपिएठान आटस्वरूपही हे स्थापन ` करे अव्याछ्ृतरूप उपाधिकी प्रधानतावाखा हआ चाहा = तन्यभास्मा ¦ प्राज्ञनामकः जीवरूप होताहं सो { अव जाघ्दादि तीनों अवस्थारूप स्थानों करके युक्तं, अर “नान्तःप्रसनर्वा क्षे" (अन्तःप्र्ननर्दी, बाह्यप्रज्ञनह) व्यापद्‌ निपधस्ख श्चातवाक्य | श्रवणत्ते उत्यन्नदरमा जो प्रमाणज्ञान तिस जारूढ़हये (तेसहो भ्रत्यगास्साक्ते फाये कारणरूप स्व अनय वदिश्तेषा का श्रुतब्रमाण जन्यन्तानके प्रभाव सेदी स्यागकरके हनेरुपाधि पारेपूण ज्ञानरूप सरी सिद्धदये तको फथन करते { अरु मेगराथं तिसकी राधना कर्वे ] चद सर्वगुणेके समूहका कर्पनासे रहित अर निस्य ज्ञानरूप स्वस्भाववाला- तुरौयरूप परमास्मा सर्य कीरय कारणरूप अन्यके मदोको भी श्चुतिप्रमाण जन्य ज्ञानके प्रभाव सेद परित्याग करके, अरु व्याख्यानके कत्ता होनेकरके अर श्रो. तालेन करे स्थितये दमक पुरुपाथं चिपे विघ्रकारी कारण { अर्थात्‌ पुरुपा वि जे विव्नोंके कारण तिनके { निषेध ( अभाव ) पूवक मोक्षे प्रदानसे अरु तिसकेहेतु ज्ञानके प्रदानं से रक्षणकरो २१

इति भाप्यकारक्रत्तमगलाचरणम्‌ +

मांडुक्योपनिपद्‌ ११

-अथ मष्योपरिदी साक्ारस्वामीजानन्दभिरि

` कतमंगल्ाचरणम्‌ ` उप्पिपभपरिक्ञानपरितृकिमतेतते 1 तिन्णकवाजष्णदतस्सष्घ "हणनामसभतनमः शद्धानन्द्पद्ास्माजद्वन्दमद्न्द्रतास्पर्दम्‌ नमर्ङवैपुरस्कतेन्तच्क्ानमदहोदयष्‌ गोडपादीयभाव्यहिम- संत्रामवरखश्ष्यते ¦ तस्थाऽतगर्मारस्ञ्पाकरमष्यसवराक्ततः परठ्वेययपिषिदांसोव्याख्यानमिहचाक्रिरे तथापनन्रर्द्ानाम-

पकाराययत्यत ४५

ॐ।मत्यतदचरामदशतनतस्पापव्यार्यानमसतभव द्र वेष्यादेतप्तवेमाकारणएय-। यच्चान्याल््रकालातीतत्त ` दप्याोक्रार्एव ३॥ हे सोम्य, | यह [ जिसको उदेश्य करके मंगलाचरण फिया, त्तिसको कथन करने को आदिविपे व्याख्यान करनेयोग्य च्रे प्रतीक [ प्रथमपद्‌ { को भहणकरते हैँ ] इसप्रकारका जो अ- श्षरहै, सो यह्‌ सग्रहे 1 ति्तका उपव्याख्यान वेदान्त [ यह स्था शापन कररे व्याख्यान करने को इच्छित हे, वा प्रकरणपने फरक व्याख्यान करने को इच्छितहै तहां जो प्रथमपक्ष कहो करि शान्नपते करफे उयाख्यान करनेको इच्छित, सो वमे नरह, कुयेफि इसि शाखे रक्षणक अभावे इस भन्यको अडा- ख्रपनाहै ताते अरू एक प्रयोजन से सम्यन्धवाखा सर्वं अर्भका प्रतिपादक शुाख्होतह 1 सो इस अन्यि एक मोक्ष प्रयो- जनेपना तो हे परन्तु सर्वरं अथैका प्रतिपाककपनानहीं 1 एतदर्थे "शाके रुचणके अभावसे इसम्न्यको अणाखपनः युक्तही है ¢ अर'जो द्वितीयपक्ष को करं इसको भ्रफरणपने करकं युक्त होने से व्याख्यान करने को इच्छितदै, तो सो मी वने नह, क्योकि प्रकरणके लक्षण का भी इत्तधिपे अभाव दहै यह आका कर्ते करेहे यहा यह अहै किं इगद्यके एकदेशते सस्वन्धवाला मर

१२ मड्क्योपनिपद्‌ !

"दालक अलन्यच्छायै लिवे स्थित जो होय सो प्रकरण फसा कते हे अरु यह धन्य प्रकरणपने करके व्याख्यान करने को इष्ितहे क्योकि यह निर्युण वस्तुमात्र का भरतिपादकदै ताते, अरु तिनके श्रतिपादन के संततेपरूप अन्यकार्योका भी टोनांहै ताति, इसयन्य चिपे प्रकरण सण्षण सर्वही ताते { यहयन्य व्याख्यान करने फो इचि ! ] शाके अथैकासार सेगृहरूप चारप्रकरणवा- खा 3 नित्येतदक्षरसित्यादि » ( यह इसप्रकारका अपर हे) इत्याद्विरूप अरन्य है त्िसका आरम्भ करते हे [ इसथन्थ यो भकरण रूपहुये भी धिपयादिक अनुबन्ध रदितत्तारप दोपकी की हुई इस सन्धके व्याख्यान करनेकी अयोग्यताहै,यह आदोका करके कहते] याहीते इससे प्रथक्न सम्बन्ध विषयअर प्रयोजन कथनकरनेको योग्य नहीं, किन्तु जो वेदान्तशादधश्रिपे सम्बन्ध विषय अर प्रयोजन सोहं या कथनकरनेयोग्यहै तथापि प्रक रणके ऽयाख्यान करनेकी इच्छावाले पुरुपकरके संपेपते कथन करनेयोग्ये तहं श्नीभाव्यकार स्वासीकरके परयोजनादि अनु- घन्धके कथनी योग्यताके सिद्धहोनेसे शाख्अरं प्रकरणकेमो्त रूप प्रयोजनवानपनेष्भ घरति करते ] प्रयोजनवत्‌ साधर्नोका प्रकादाक होनेकरके विषये सम्बन्धवाङा जो प्राच सो परम्परया ते कन्ठ विषय, सम्बन्ध, अर प्रयोजनवाठा होता प्र०॥ पुनः तिलकाप्रयोजन फपा्, तकत, सेसेरोगकरङे आत रपुरुपको रोगी निदृत्ति होनेसे स्वस्थता हातीहै, तेते अन्तः- करणादि उपाधिवले। दुःखी आतमाको ¡ दुःखकेदेत ¡ दतभ्रपच ची निषत्तिके होने जो अद्धैतभावरूप स्वस्थताहोतरे & सोई्र- योजन 1 अरुदेतभपच अविव्याका क्रिया हे अतएव वियाकरे तिप्तकी निदत्ति होती पतथ बह्मवियाके घकाशनार्थ इसथन्य का आप्‌म्भ करतें “यत्रि द्वेतमिवभवत्ति"। भयन्नवाऽन्यद्विवस्या उनाप्याऽन्यतपश्यदन्वोऽन्यद्विजानीयात्‌" यत्रलस्व स््रमात्मै- याभूचतफेनकंपद्येतुप्रेनकं तद्विजानीयात्‌ , इत्यादि » (जदांही

मांडुक्यो पनिषद्‌ १३

देतवत्‌ हो ताहे, जर्हात्रा अन्यवत्‌ होताहेःतदां अन्य अन्योदेखे, अन्य अन्यको जाने 1 अरु जहांतो इसको सपं अत्माही ह्येता इआ चदं किसकरके किसकोदये किम ररकेिसिरो जाने 1 इत्था. दि अनेक श्वुतियेकि पमाणकरके इसअभकी सिद्धिर तहां [ वि- घय पयोजनादि अनुनन्धके आरमद्वारा चके आरंभके सिथितषटरये आदिषिवे इस कारिकारूपः मेधके चारप्रकरण पकमेएक अमि- जित धिषय, ्ञानकी सुगमताके अथ सृचनकरनेको योग्यहे,इन प्रकार कके प्रथम्‌ प्रकरणे व्रिषयक्रोनिरूपण करतेहै | गिडपा- दीय कारिकाविचे। पथम उन्कारके निर्णयार्थं जगमप्रधान जगत्स तच्वके निदचयका उपायरूप पथम प्रकरण है अरु रन्लञञ- दिको पिष सर्पादिकोङ़ पिकस्पकी निध्त्ति होनेसे रज्ज्ञकेयथाभै स्वरूपकी प्रातिवत्‌, जिस [ अच वैतस्यनामक द्वितीय भ्रकरण के अवान्तर व्रिपयको देखावते हँ ] देत प्रपचकी निचृत्ति हानेसे अद्धेतकरी प्रा्तिरोतीरै, तिस देतके हेतसे मिध्यापनेके परतिषाद- मार्थं द्वितीय प्रकरणै 1 अव सदैव नामक तृनीय घकररणकेअर्थं विश्ेपकेकहनेका आरंभ करतें ] तेपे अद्रेतकोभीद्धितकी सपरिक्ष- तास! प्सस्पापनक्स ्राश्तर्हय युक्तम्‌ तस्क परमार्थपने 'लखावनेके अथै तततीयप्रकरणहे [ अर अलातरान्ति नामक चतु- प्रकरणे अर्थं विरेपमे कतर ] ओद्वेतके परसार्थमावके नि- शुचये विरोधीरूप जे वेद्धिरुद्ध अन्य बद तिनको परस्पर में चिरोभी होनेसे उनके अयथार्यताके कारणा युक्तिकरके्ी तिनके -निराकरणार्ध चत्त प्रकरणे पन्‌ { अन्कारक नणयरू्पदडार्‌ से आरमक्ञान प्रासिका उपायरूप धयम ्रकरणे, इसप्रकारजों कष्ठा-सो अयुक्ते, क्य कि अकारक निर्णयो आत्मन्ञान होनें -की हेतुताकी अयोग्यता हे { अर्थात्‌ आत्मज्ञान होने की हेतुताके यौग्य उकारा विचार नह 1 अरु अन्यं अयकाक्तिनि अन्यभ पे ज्ञानविये उ्यात्िविना उपयोगतामलो पाव्रत्रा नसी, अर्थात्‌ ॐकारे अथक ज्ञान आस्मन्ञानफे जथेत्तानमें अव्वान होनेमे

+

१९ मांडुको पनिषद्‌

उ्कारफे अथकाज्ञान आत्मक्ञानहीनेमे उपयोगी होतनष्ीं 1 अर यहां { ॐँक्ारके विचार अरु आत्मज्ञानकिपे प्रन अरु अग्निवत्‌ उयाति देखते नही, अर ञध्कारको आत्माका कार्यपना युक्षनदीं क्योकि भा राशादिकोंका अवशेषे ताते अरु तिस ऽ्कारको आस्मावत्‌ स्व्वार्मा दोनेकरफे तिसके कार्यपने का ज्याधात्त है तातते इसभ्रकार मानताट्ुजा वादी पूव कहे परमाण प्रथम प्रकर णके अवि आक्षेप करे } उश्कारकं निर्णयविषे आत्मत्छकी प्रा्तिक्ता उपायपना के भ्रतिषादन कर्तेद, इस रौकापर कह- तेः [ हम 1 धूम अग्निवत्‌ { अनुमान प्रमाणके आश्रयसे उण्कारके निर्णयको आस्मक्ञानका उपायनहीं जानते कि जिसकरके च्या- सिका अभावरूप दोप्‌ प्राततहोवि, किन्तु श्ुत्तिवाक्यके शादे प्रमाण से उणकारका निणैय आत्मज्ञानका दहेतुहै, इसप्रकार समाधान करते} “3भिस्येतत्‌ “एतदालम्वनेभे्ठप्‌ > “एतै सव्यकराम परापर यदोंकारः 1 तस्माद्धिदरानेतेमैवायतने नैकतर मन्येति उभ्भित्यारमानेयुज्जीत्तः 1 “उभितित्रह्म > करार प्ेदं स्वम्‌" (ॐ इलथ्रकारका यदह, आरम्बन ध्र दै, हे सरपकाम)यह जो पर अरु अपरसूप ब्रह्मद सो ॐफार हे, ताते विद्धान्‌ इसदही साघनने उभयके मध्य एकको प्रा्हाता है, इसप्रकार आतमा ( बुद्धि ) को योजनाकरे, उभ्यहः व्रसमहै, उध्कार ही यह सवं हे। इस्यादि अनेक श्रुतियेकि प्रमाणे सपदि [नतु अपकरके व्यासहुये भ्नातिवाले सन्मात्र चिदात्माधिये भाणादि विकरपको कदिपत होनेते आस्माको सर्व्रा आश्रयपनाहै परन्त उण्कारको वो सर्वका आश्रयपनाह नहीं क्योकि तिके अनच्य- तपनेका अभावहे ततत, यह आशा होने तहा कहतेहे] प्रिकलप आश्नय्‌ रञञाादकत्रत्‌, जपे अद्वेतरूप आत्मा परमा्थैकरफे मतो (लन्‌ नु तरह को आरमरूप आश्चयवाला होने

सादुक्योपनिषद्‌ ११

करके, अस्ञन्काररूप आश्रयवाङाहोनेकरके, वाणीरूप पूपंचको दोनों आश्रय पाप्तहुये, एसा कहना वनेनही, उसपूकार कदते हँ ] उण्कारं आत्माक्रा स्वरूपही हे, क्योकि उणन्कार आत्माका वाचक ताते अरु उन्कार के विकार शाव्दके उथ्वारणका विपथ प्राणादि सवेआस्माका विकल्पनाससे भिन्ननदीं, क्योकि ध्वाचारम्मणंविकारोनामघेयं" (बाणी से उचारणकिया विकार नाममा हे ) अरु « तदस्येदवाचातन्त्या नामनिदामभिः सव्वं सितम्‌ « सवदीर्दनामानीत्यादि” (सो इसका यह्‌ सव॑वाणी षप तन्तुसे नामरूपा दामे ( रज्जर्ओ ) से ष्ट (यये) हे स्य ही यह नासघिषे हें इत्यादि श्चुति्योके पसाणत्ते उश्कारको सर्च क्य आश्चयपना वनेहै { पथम प्रकरणकरे अथको परातिपादन क~ रकं तिस अथैविवे सूर श्रतिको पकर करतहे] एतदथ यह श्चत्ति ऽमिव्येतदक्षरमिदश्भसव्वं { अश्दरसपूकारका यह अक्षर यहु इसपकारकहे टु जो यहविचयशूप अर्थोका समृहहै तित कोनामसरे अभिन्नहोने करके, अरु नामको उश्कारसे अमिञ्चटो- ने करके अकारी यह्‌ सेहे अरु जो परव्रह्म नामके कथनरूप उपाय पंके जानने आवतादै सो उन्कारहयीहै) [अच तस्य (1तेसका ) इत्याददेरूप मलश्चातफभागको पकटकरके व्याख्यानं करते हे ] 4 तस्योपव्यास्यानंभूर्तं भव्धविभ्यदित्ति सव्वंसोंकारणव { तिसका उपव्यास्यानहैः" भत, वतमान, तरिप्यत्‌'यह सवं अन्कारही है ; अर्थात्‌ तिस उस पर अरु अपर रुप ॐ» इसप्रकार के अचरको ब्रह्मकती प्राक्षिका उपाय होनेसे, असं ब्रह्मके समीप (नाम) होनेकरके विभ्रक्कष्ट कथनरूप भरसंगविषे धात जो उपाख्यान, सरो सम्थक्‌प्रकार जाननके योग्ये अह उक्त न्यायतस्ते * भत, वत्त॑मान, भविष्यत्‌ इन तीनोकारेकरकेप- रिच्छेद ( भेद ) करने के योग्य जो वस्तुदै सोभी सर्वं उ^कारही 14 यच्चान्यलिकालातीतंतदप्योह्ारपव {जो अन्य तीनोका- से अतीत (भिक) है सो भी अकारी है } अरपत्‌ जो अर

१६ माङ्स्योपनिषद्‌ 1 = ~ ` सर््द्चेत्रद्मायमासन्रह्यपसोयमात्माचतुष्पात्‌२॥

तीनोकारों से पथक्‌ कार्यरूप सिगसि जानने योग्य. अरु काठ करफे परिच्छेद करने को अयोग्य { कारणरूप { अव्याकृतादिक हं {वा स्थका कारण परम।त्माहै! सो भी अकारही यात्‌ आक्राशको सर्वत्र पृण दोनेसे उसको देशत परिच्छेद न~, हीं, परन्त॒ “एतस्माद्वाएतस्मादास्मन आकााःसंभूत्त> इरयादि प्रमाणे कशो उत्पत्तिवाखा होनेते बो अपनी उत्पत्ति के परचकार मे अभावरूप हे ताते आरा को कारङृत पर्ष्ठिददे, तति आकाादि स्वकायं भृत, भविष्यत्‌, वत्तेमान, इनकारचय करतत परिच्छेद खाहै, अरु आकाशादि सर्वकार्यौका करण जे सत्‌ चतन्य प्रमासमा त्र यहे सो “अजोनित्यः"" इर्यादि अनेकश्चुति- यो के माणतते उरग ति विनाश से रहित अजन्मा निर्य सत्यै, पत्रय उसविप फारत भी व्यवधान नहीं ) इस्त कहने का अ- निध्राय यह हे क्रि “भृतेभवद्धविप्यदितिसय्यरमोकारणएव ”* इस शयुत्तिते आकाशादि सव्वं सार्य जो उर्पत्ति विनाशबाटाहे सो सव कालत्रय के परिच्छेदवादा उन्कार्‌ग्न वाच्ये “तदेवव्रा्यरप्रण- चोहि याचको" इत्यादिश्रमाणत्ते जरु यव्चान्पच्िकाटातीतं तदप्याकारपदः इम श्रतिवान्यतते, जो सनलन्नरपफ़ [वच्यदूबारे कार्य्यरूप पदाधोते अन्यजो सवरा कारण अपिषठठान सर्गात्मा परतर गरे सो उ्कारकारक्ष्यरे, एेमाजानना{॥ यहां [ वाच्य अरं चाचकॐो एकी सत्‌ वस्नव्रिे त्पिनदोने करके निनकी पकः रूपताको कथनक्रियाहेतात, पुनः (सवयहहमहे) इसदकार पयो हते पा जयां विज्ट्प है, नहा उफ अर्थे जनुवाद्पर्थक आप्रैमवरक्य के फरसदित तारच्य को करतें] नाम (वाचक)

अरु नामी \ वाच्य ) इन एकता के होनेसे भी नामी ध्रा धान्यत्ता से यह निरईश् जयादे १॥

रहेतोस्व.] ^ॐगूवाच्यकतो वाचक्पनेके कयन करफेही निन

माड्क्योपनिपद्‌ 1 १७

वाच्य वाची ¡ एकताकी सिद्धिसत, पूनः वाचक की वाच्य रूपताका कथनरूप उयतिहएर ( उल्लटायके कथन ) करना व्यर्थ है, यह आका करके कहते हैँ यदा यह अर्थे कि वाच्पसे वा- स्वककीं एकरताको कथन करके वाचकसेही वाचक की एकता कै कथन करने से उपाय अर्‌ उपेय की करीं जो एकता, सोः मख्यनही, किन्त गो णहे, इसप्रकारकी आदंका पराप्त होषेगी,ति- सके निवारणं उयतिहारका कथन सपर हे ] « ॐ* भित्येतद- क्षरमिदंसव्ई" इत्यादि नासक्री प्रधानता से तिर्ेदाकरी वस्त॒का पनः नामी क्री प्रधानता सि जो निदेश किये कथन हे, सो नाम श्र नामी की.पकताकरे निश्चयाय हे अरु भन्यथा नासके विपे नामीकरा निचय दोगा, अर नामीकी -नामरूपतता गौणे, इस प्रकरी शंका उखन्न होवेगी अरु वाच्य अरु वाचकलूप ना- मी अर्‌ं नामकी एकता के निश्चया इन दोनोको एकही प्रय ्ञसेएक कालिये खय करताह्आा तिससे प्रिलक्षण वब््मको { कि जिस्षविषे नाम अरु नमी इत्यादि कोड भी कल्पना नही प्रा्त होत्ता है, यदह श्रयोजन-है अरु तेसेही आगे करगे कि धपादामान्नामात्रादचपादा" < पाद्‌ जोहसो मात्रार्हैअरजो मात्रा सो पादह > सोडं { कटेहेये वाचकके वाच्यसे अमेद्त्रिवे वाच्यको प्रकटकरके योजना करते हँ ] कहते 4 सव्वश्द्यनद्रह्मा यसातमा्रङ्ध ( सवेद यह्‌ ह्यह, यह आत्सात्रहर हे अथात्‌ सो स्रका्यं अरु कारणदही बह्महै सर्वं यह अन्कारमात् हे, इसप्रकार श्चतिने कदादहै,सो यह बह्म इसभकार सी परोक्षपने करके कथन्भिये बह्मको प्रत्यक्ष (अपरोक्ष ) त्रिदोष करके निर्देश करते है पह आत्माव्रह्महै यह्‌ «अर्ये यह इस्तक्ररके "विदय, तेस, प्राज्ञ, अरुतुरीय, इन चार पादकवाला हनेसे तिमागफो प्रासहये आत्माको घरत्यगात्मारूप हने करके कथन करने को जो इच्छित अर्भ तिस्के निञ्यया्थकसाधारण द्रारीरके हस्ताय (अगुखै करनं ) को अपने हदय देशुपर्यत्‌ केआबनेनूप

१८ साड्व्योपनिषद्‌

व्यापारमव अभिनय से “अयमात्मा” वह आत्मा है > { अर्थात ५८ अंगछमाच्रपरुपोऽन्तरास्मा- सदाजनानाह्देये सन्निविष्टः इस्यादि श्चतिप्रमाणसे अयुपपरमाण ददयनामक मासाष्ड (जो वक्षस्थलके सध्यंहै, तिस्तके सम्बन्धे तितक्रेमध्य श्वटरमं आका- वत्‌, अगएमात् चेतन्य पुरुप है तिसको ' सवका द्राः होने सें प्ररयतकरफे अदं आस्माहै, इसप्रकार अंगुरि निदेशसे कंहतेहे। "इ सप्रकार कहते 4 सोऽयमात्मा चतुप्पात्‌ { सो आत्मा चीरपाद्व।खा हे } अयौत्‌ सो [ अच “सोऽय” ‹सो यदै, इतया- दिरूप अन्यवाक्य को प्रकरकरके व्याख्यानकरतेहं ] यह उनका रका वाच्य अर्‌ पर ( सर्वाधिठान ) अरु अपर (प्रत्यगारंमा ) रूप दानेकरके स्थितहुंआा आमा चारपादवालाहे तह रणान्त कदत है, कापौपणक्रे पादवत्‌, [ आत्माको स्वाधिएठान रोने परमे अपरोक्वताते पर (श्रे) पनाहै.अर उसको प्ररयगात्मरूप- तास अपर ( अश्रेप्र ) पनाहे, तित देतुकूरफे कायकारण सूपद्ष सर्व का+स्वरूप (अपनाअओप ) होने करके स्थित्तहुभा जो आत्मा तिस ज्ञानकी सुगमताके अर्थं उत्त त्रिप चारपादर की कल्पना परियारै, तितत चि दान्त कत यहां यह अथे कि कोई एक देश धवे पोडशपण अन्नके माप करने के पान्न विरेपका नाम ष्कापौपण, कहते ट, ¦अर्थातत्‌ किसी पकपान्न पिरपमें एकमन्ते प्रमाण अन्न कचश्ष प्रणता आवताह्‌ अरु उम्र पकहांपचम नकमन, पानमन, आधमन, पवमन, इसप्रकारमापने फे चार चिह होने उस पाच्रका चार पाद्या कद्प्ना करते रतस; तहां उस्तपाद्रपिष स्यवषहारकी वाटल्यता सिन्धधर्थ पारक विमेष कस्पना करते ह,। ततदी इस आरमा विपि भी पादो की कस्पना जाननी 1 परन्तु जस गाक्रो चार पाद्रवाट्टी काते ततमे आत्मा वार पादवाला कहनेको लस्य नर्हृ^क्योकषि जात्माक्ाजनोनिष्कट ्िरपयनादवि भप्रसी पत्तिपादक श्त्तिया तिनसे व्रितेध टोषेमा नात } गार पादयत्‌ नहीं [ परिये जदिलेके चसयप्यन्न [चार

माड्श्वोपनिषद्‌ १६

` - जागरितस्थानावहिःत्रज्ञःसप्ताङ्रकननिशतिम्रुलः स्थरभग्वेश्वानरःप्रथमःपाद्‌ः.३॥ `

{. <~ पाद्रूप ।'पटाथाचष जा पाद्‌ इाव्द्‌ हु, सो जव करण उचा वाखा { अयात्‌ साधनरूप अथवाखां होवे तत पिदवाटिकवित्‌ तुरीयकरेभ् साधन कोटिविपे प्रत्रेशके होनेचेद्ियवस्नृकी {अधात्‌ रुञ॒क्षुपुरुष करके श्रदणादे साधनाद्ारा तैराथेजत्मात्म आच्स- ससे जानना हे तिसकी { असिद्धि होवेगी, अरु जव पाद्‌ जब -विञ्वादिक सर्बविषे कर्म व्युतत्ति (वरिषयरूपञर्धं ) वाखादोवे है, तेव सवे को ज्ञेयलूप होने से उनको ज्ञानकते साधनतारी आसि- द्धि होवेगी ! यह आङकाकरके पादश्व्छकी प्रुत्तिकोा विसागक्रर के प्रकट करते हं ] वरिर्वादिक तीनोके मध्य पूवपृयं { पादोक्रेउ्तर + उन्तर.पादा एवेप्र | विख्यकरनं तुरीयाक्रा;{निरचय हाता है! अस्‌ इसप्रकार होनेसे पददाच्द्‌ तुरीयाकरे कारणमावक्ा सलाघन होताहे, अरु प्रहता 1 उपसप्रकार 'हानेसे पादशव्द तुरीयक्रे कम काये ¶ेषय, भावका साधन हाता हं ! परन्तु निरवयवरूप "आत्मा उमयध्रकारके पीरदाक्रो कर्पना वन नहीं २,॥ \ हे सौम्य! [आलसमाकेचारपाद.तो दरस निपेधपिन्येद; उस "प्रकार वादीशेकाकरे हे] प्र० आलमाका चारपादकरके युक्तपना ` फेसेहै, उ० तहां कहते है, ¶जागरितस्यानोघहिःप्रनः<जामरि -तस्थान चहिःश्रज्न है अथात्‌ जायत्‌ अवस्या हे { म्यान अर्धात्‌ निमानका विषय 11 जसक्ता, एसा जागारेनस्थानहं अर चाहर जो आत्मा को अपने आप आस्मलतरसे- भिश्न विषय, -तिन वेप हे धर्ता [ प्रन्ताजो बुद्धः 'तेसस्ते पथस "अन्तर हना प्रासाद्ध स, त्का वाहेःप्रन्तः ~< वाद्य फे पिवयं बान्या2 यह विदेषपण अयुक्त इ; पेसी ओस्माकसके तिप्तका व्यारप्रान करते हं ! यहां यह भावःहे फिमचतन्यख्य जो सषटप भन प्रज्ञा सो जाह्म विपर्यो वि मानती नदी. ्योकि वो दन्ता गिपप

२० माँड्क्योपनिपद्‌ की अपेक्षाते रदित तातते, फिन्तु-वुद्धिरुपजो प्रज्ञा सो वाष्यके (~ "= (~ (९ = [4 धिपयों धिपे भासती ] जिसकी सो किये वाहिःरज्ञ अयात्‌ अविद्याङ्कत [ बाह्य वरिषर्योका वास्तवकरके अभावतसे, वो भत्ता {जो अन्तर है ¦ सो बाद्यविषयों विये केसे मासतीहै, एसी आश्र ` करफे कहते है यहां यहतीस्प्यं है कि, {आत्मविषयिणी।स्वरूप भूत जो भज्ञा दै, सो वास्तवसे वाष्यविपयवाली नह अङ्गीकार किया, परन्तुबुदधिइत्तिरूप जो ्रिपयादिवस्तुविपयिणी निश्च- यारमक ¦ अज्ञानकरके कल्पित प्रज्ञाहै, सो चाद्यविषयेवाखीप्र्ञा दतर \ अरु से बुद्धदधत्विरुप प्तप वास्तव्रसे बाह्य विषय भावको अनुभव नहींकरती क्योकि अज्ञानकरके कल्पित होनेसे वास्तवे उस प्रज्ञाका अभावंह अरुउस ध्िज्ञाका विपय। बाह्य त्रिपय सोभी अन्ञानकरके कल्पित है ताते एतदयं बुद्धित्तिका जो वाद्य विपर्योका परकाशकपना है सो परातिभातिक (करित) हजोबायपरक्ञाईे सोवाद्य के वरिपयवाखी (विपयाकार) दी भाेदे तेसे [अव पूय के विशेपणसे इतर विशेषणको योजनाकरते हें | “तस्यह्येतस्यारमनो वैक्ानरस्यमू्धव - सुतेजादरचशुविरवरूपः प्राणपृथग्बरमीरमा सन्देहोवहखोवासतरेवरपिः प्रथिव्येवपादौ” अभ्निरोत्रकस्पनारोपसेनाग्निमुखलैनाहवनीय उक्तः" तित इतत वैश्वानररूप आरमाका सुन्दरतेनवाङा स्वशखोक मस्तक दै, अर दवेतरक्तादि नानाघ्रकारके गरणोवाला प्ये उसका चक्ष दे, अरु नानाप्रकारकी तिर्यक्‌ गतिते विचरनके स्व्रभाववाया' यागु उसका प्राणै, अरु विस्तृतत्ताषूपगुणवाखा आकाश उसका देदमध्यभाग है, अरु उनका हेतुरूप जल उसका म॒व्रस्थान है, अरु प्रथिवी उसके दो पादह अरु अग्निहोत्री कल्पना विये उपयोगी होनेकरके आहवनीय नामवाखा जो अग्निं सो उसके सुखरूपतते कहाहे1इसप्रकारश्रुतिकरके उक्त यहसातंं यद्गजिस- -क पेखा सांग ातअङ्नवाला है 1 अरुप्कोनरविशतिमुखः{ णक उन धीत सुग्बवालाहे ? अर्यात्‌ तैतेही [ अच अन्य वेप.

साङ्क्थोपनिषद्‌ः! २१

णोवी योजना करत ] पांच ज्ञानेन्द्रिय अर पांचकम्मेन्द्िय; अरि ाणादिमेदतते पाच वायु, अरु'मन वुद्धि, चित्त, अरु अहङ्कार, यह नवार अन्तःकरणकी इत्ति, यह सव मिरके हुये जे उन्नील ९६ सो मुखवत्‌ उसके सुख (इानकेद्धार) [ यहां ज्ञानपदकमकाउप- लक्षण हे, एतदथ ज्ञानके साधन अरु कर्मे साधन इस पिरव नामव्रारे जीवक मुख ज्ञान अरु क्मके साधन ) हे यहां इस प्रकार िवेचनकरने को योग्य है, तहां पंच ज्ञनेन्दियां अरु एक मन अरु एक बुद्धि, इनिसलातक्रो पदा्थोकरि। को ज्ञानविषे साधनः चना प्र्िद्ध है, अरु वामादि कर्मेन्द्रिय को वचनादि कर्म्म विषे साधनपना प्रसिद्ध है पनः प्राणो ज्ञान अरु कम इन दोनो विषे परस्परात्े साधनपना है 1 क्योकि प्राणोकरे होतेसेही ज्ञान अरु कर्मकी उयपत्तिहै, अरु तिनकेभभायसे ज्ञान क्कौअनुप पत्तिहे तति अर अहद्भारको भीं प्राणवत्‌ ज्ञान कर्म दोनोविषे ।साधमपना मानने योग्यी है \अरु चित्तको नी चेतन्याभास के उदयविषे साघनपना कहाहै ] जिसके, इसपरकारका उच्चीकसर १६. सुखनवाला दं 1 अरु 4 स्थूरसचम्वेर्वानरःप्रथमःपाद्‌ <स्थछ भुक्‌ वैश्वानर दै सो प्रथम पादहे > अर्थात्‌ [पदोक्त विपणो करके युक्तःवैद्वानरका “स्थूलभुक्‌ * फेला अन्य विशेषण है तिसका तरिभामकरते इ, यां शब्दादिकं तिपयोका स्थलपना घो दिशादिक देवता फे अनुयह.सषहित श्रोत्रादिक इन्दियो से प्रहणहोनेरूपहै] सो फेस विशेषर्णोबाखा वेद्रवानर उक्त उन्नीस दासे इाब्दादिक स्थत विपयोको भोगता है तते सो स्थुल ह्‌ हे, अरु [ अव वैदरवानर शब्दका धसंग विपे प्राप्त विव वको -ष्रिषय करनेपनां स्पष्ट करते हं ] षिदरवेपांनरा- गामनेकधानयतद्विदवानरः , 1 यद्धाविद्वदचासौ नरदवेति बरेरधानरः व्िद्वानर -एव वैश्वानरः = -८ सर्व ने को अनेक ।कारसे डेजात्ता हे एतद्य विदवानर `हे > अभया विद्व चेन्ना जरसो किये ्रिदवानर विञ्वानरही सर्वं [ व्रिर्व रेस

;

माडक्योपानेषद्‌ 1 २३ पने अतपएव पेते अध्यात्मम अरु अ्रिदैवके अभेदको केदरेउक्त रकारसे चार पादूत्रानूपनेको कहने को इच्छिति.होने से पृते पूव

पादको उत्तरोत्तरं पाटल्प से विख्य करने रो जिज्ञास्तकी तुराय स्वरूप विपे स्थिति.सिद्धदोदीहे ] यद दोपंहे नही, क्योकि अपि दैव सहित सर्प्रपचके इसत्माके स्वरूपसे चारपादपना कह- मे को इच्छितः हानेकररे 1 अरू पस { जवर इसपर जेक्ञासं मसश्चकी तरीय घ्रिषे स्थिति अगीकार करते र, तव तखक्नानके प्रतिवधक मातिभासिक किये कल्पित -दवेतवी निदत्ति के हये ° अदैत परिपणब्रह्ममें हो? इसप्रकार महावाक्या्थङरा साक्तास्कार हीवहेःउसप्रकार फलि तक्तो कहते] सवं पपचवीनिघरत्तिके द्ये, अदेती सिद्धि होतीहै, सो सवं भर्तोविपे स्थित एक आत्मा देखा (अनुभ्वकिया ) होताहे, अरं सव भृत आत्माविप देखेहुये होते हँ 1 इसक्रार यस्तुसत्राणिभ्नतान्याव्मन्येवरीनुपश्यति जो सत्रैभृतों फो आत्माविपेही देखतादे 2 इर्सदेशावास्यरयनि- पटक मन्ब्ररूप श्चतिका अथ समाप्त कियाहोताहे [ अघ्यात्स ` अरु अधिदेवके अभेदक अंमीकरार रूपद्रार से परवोक्तरीत्या त्व जानकर { होनेके { अमीकारचिपे दोप. कहते है ] अन्यथा.अपने देहकरफैः परिच्छिन्नही सव्यगत्मा सांख्याटिमतवादिर्योयत्‌ अनु- भवर क्रियाहोत्रेगा ।'अर चेत्ते [ नन, आत्साकी एकता विपे संखा दि कोभि.भेटमी.उवत्रस्धा>-अमभतर. से. अधात्‌, नो. कद्रीणि. सतर शरीरे मँ एकी आरा मानिये तो एकके सुखते सवही सुखी, भर एकक टुःखते सही दुःखी,-अरु एकके बद्धस सबही अरु पकक मुक्तसे सर्वही सक्त, ठेसा होना चाहिये, परन्तु सोने हके कोड स॒ली हे, कोई, दुःखी हे कोई वद्धे, कोड मुक्त दै, सो स्वको प्रकट अर युक्ती है, अरु शरीर प्रति भिद भिद आत्मा मानने से कोई स॒स्वी जर कोड दुःखी इत्यादि जौ सोक पिचेज्यवस्या हे सो यथाथ जरु सव उरीरोविपे भिन्न भिन्न गात्माका चोधक रिम} जरीरः शरीरकेभनि आसार मेद

=

2; |

,

५.

२६ सांडूक्योपनिपद्‌

स्वप्नस्थानोऽन्तः प्रज्ञ सकताद्गएकोनविदातिमुखः मविविक्तमुकूतेजसोदितीयःपादः . , सका व्याख्यान, करते हें ] स्वमस्थानो स्वस्य स्थान वाखा 2 अर्थात्‌ सन्न हे ममरक्षण अभिमानका विषयहूपस्थान -जिस तैलरूप द्रावक देसा जे सस्वप्नस्भानवासा [ श्वन्न इस पदक निरूपणा तिलके कारणको निरूपण करते हें ] जात्‌ की जो प्रज्ञा (बुद्धि ) हे सो अनेक साधनोवाखी अरुबाद्य (स्थल) को वरिषयकरनेवारी इुयेवत्‌ भासमान, अर मनरूप स्फुरण- भात्रई तिपप्रकारके संस्कारको मनविपे धारणकरे है तैसे संस्कारवाला सोमन, चित्रित [ जाथत्‌की वासनाकरफे युक्त दुभा जो सन सौं स्वभविये जाप्रत्वत्‌ भासते, इस अथे विपे दान्त कहते जैसे चित्रकरके युक्ता जो पट सो चित्रवत्‌ भातत { अर्थात्‌ अनेक रंगेकि सूत्रकरके निर्भित वे चरूटादि घ्ाखा पट चित्रवत्‌ भासतां ! तेते जातू संस्कार करके (जो भनी करके कद्ित्‌ हे ) युक्त इभा जो मन सो जायतवतूही भासते; यह युक्तै, इत्यथः 1 पटवत्ाह्यके साधनकी अपेक्षा जे रहित,अरु.अविवया,काम, कमे, से पूरणा को प्रा्टुआा जाथत्‌ त्‌ भासतादै 1 अरु रेतही बृहदारण्यक श्ुतिविपे कहा भी हे “अस्य "लोकस्य सर्व्वावततोमात्रामपादायेति ^ तथा परे देवे मनस्यकौभवतीति पस्तुत्यत्रेष देवःस्नेमहिमानमनुभवती स्याथव्यैणे? इस सव साधनकी सम्पत्तिवाले रोकंकी माना ( केशरूप वा. सूषेम्‌ वालना ) को यहणकरके सोता है 2 अश एेतेदी अथवेणवेद्के वराञ्जण पूरनोपनिपटूविपेभीकहाहे, तथाच।

< मनरूप परद्व चेष एकवत्‌ होताहे > पसे प्रतगधिवे प्रा्षकरफे नेसे जन्य ृनञाको अन्तर सतो =

तहनिकी तुल्यता से, तेजस का

8

-मांडक्योपनिषद्‌। =. ` .२७--.

प्रज्ञः..<.अन्तुरकी पज्ञावाखाः१-यह्‌ -वेशेषण उ्यादत्तक . .(विदबोदिकोते एथक्‌ करनेवाला ) नही है जहा पे सी दकाहे,तहां कहते } इन्द्रिया की अपेश्तात्तेमनको अन्तर स्थित होनेकरके विपे अन्तर हे, तिस मनकी वासनारूप परज्ञाहे जिसको .एेला जा "“अन्तःघज्ञ.८ अन्तरकी परन्नावराखा है.2 अरः «^ सतताद्घः एकोन . -व्रिशतिस॒खः~ < सात्यग अर उन्नी सं -मुखवाखा -.{ अयात्‌ . -यह तेजस.जो "अन्तर की पक्ना्ाल्ाहे सो 1 पृतं विदवेवत्‌ सात्‌ अंग-अरू-उक्वीस अलवाखाहै.। अरु “भविव्रिक्त्क्तेजसोद्धितीयः पादः 2.८ चा प्तनामय सद्म. मोमवाखा दे तेजस द्वितीयपादहे.2 { अथीत्‌ प्रवित्रिक्तसक्कदिये व्रसनामय सूक्ष्मभोग वा विररु भोागका मोक्ताहे {-(-न; िश्व.अर चैजसका.^पविविक्तश्चक्‌) ` ,८ वासनामयःसक्ष्ममो्गोका मोक्ता 2.यह्‌ विरेषणतु्यंहै, क्योकि {विश्व अरु तेजक्त इन!उमयकी विद्य भर्‌ अन्तरपरज्ञाको भोञ्य- प्रनेकी तुल्यता दे ताते, ठेवा जो.वादीका, कथन सोचने नदीः कयोकि-उक्त उभयकरी धन्ञाको भोज्यपने.की तुल्यता के हुये भी तिक पर्ञाधिवे म्यक मेदत्ते विद्वो भोज्य.(भोगने योग्य> जो. पन्ना, सो विषय सरित होनेसे स्थरुकरके-जानी जातीरै 1 अरु तैनसकी -धर्ञहि.सो. व्रिपयके सस्वन्ध.स रदित केवरूःवाल- नामानन सूपवराटी दैः-इसकररे.तैनस.विपे सृक्ष्ममोग तसिद्धहोते ह, इसभ्रकार कहर -] जायत्‌. चिरे त्रिद्वको.विपयसहित हानेसे स्थल पत्चाक्रा नोग्यपनाहे अरु यहां स्वमधिपे जित्तकरके केर वासनामाघ्र स्वरूपनाखी ज्ञा भोग्यः एतदथ पवित्ि्त (सूचम) भोगे अर .[-स्वभके अभिमानी को तेनके.कायष्ेनेकेः अभाव +से तेजस्पना काटेसे दोगा; यह आका करके कहते 1 श्रिपय रहित केवर. कारास्वर्पं भ्रत्तातरिपे भरकारकपने. करके होत्रे हं {अर्यात्‌ स्वसका अभिमानी -तजकाकार्य.न दी -परन्तु स्वस कां काशक. देः एतद्‌ थे.उसको तेजलपना-दात)हे {~ इसकरके जो तेजसे सो -दितीयपाद है £

२८ मांडूक्योपनिपः्‌

यत्र सुक्तोनकजञ्चनकामेकामयतेनकञ्चनस्वप्लंपश्य तितसपु्म्‌ 1 सुषुप॒स्थानफकीमूतःग्रज्ञानयनएवानन्द मयो्यानन्द मृकचेतोमुखः प्राज्ञस्ठतीयःपाद्‌;

* हे सम्य! [ उक्तप्रकार पिश्व अर तैजसः दोनों पदों की ठयाख्याक्रके अव तृतीयपादके व्याख्यान करतसन्ते उयाख्यान करने के योभ्व श्चुतिविपे ध्नकंचन ङिरगीकोभी नर्द इत्यादि चिोपणो के तार्प्यं को कहते यहा यह्‌ अथे रहे कि स्थर षि- पयवासे ज्ञानकी जहां प्रवृत्ति है पेता जो जाच्रदादिथा सो दर्शन दत्तिकदतेदे अरु स्थल पिपयकेदर्शानते ( ज्ञान ) से इत्तरजे दशनेन { ज्ञान ) सो केवट चासनामाच्र होनेते अदरानदे, तिस्त वासना मंकी वृत्ति जहां हे सो स्व, ति स्व्रको अदनद्रत्ति कहते हं अरु तिन 1 दर्खनघरत्ि, अरु अद शृनदृत्ति ¡ दोनों विये सष- प्तिव्रत्‌ तके अ्रहणरूप निद्राको तुल्यहोने से ^ यत्रसुप्तो

< जहां सोयाह मा > इत्यादि विशेपर्णोकी तिन [उक्तडभय एृत्ति- यो ¦ प्राम्तिकेुये, तिनते भिन्नकरके सुपुष्तिकफेयहणार्थ ^ यत्र

सप्तो जदं सोयाहुआ > इत्यादिरूप मृलश्चतिकरे वाक्यघ्िपे नकंचन °» क्रिसी ङो भी नहीं > इत्यादिरूप विदेपण हँ, सो जाग्रत्‌ अरु स्वस उभयस्थार्ना से एथक्‌ करके सूपुप्तिको दही थ. दण करावता दे } «< यच्नमुप्तेनकचचनकामे कामयतेनकथनस्वभं परयतितत्सुषुप्तम्‌ » > जटां सयाज किसी भी कामकी काम. ना करता नही, किसी भी स्व्रपे टेखततानर्ही, सो सुपुप्तिवाटा है*अथीत्‌ ददीने (ज्ञान ) अर अदगीन्‌ (अज्ञान) दोनो्तिरयावारो जायत्‌ अर्‌ स्वम अवस्थायिपे सपुष्तिवत्‌ तचे अधोधरूयनिदरा को तुर्य हीनेकरके, सन्ति यहणार्थ इसडपनिपदृङे पैचमम- 1

देखना 7 ही इष 1

§ ९६" पए्वण करकं दमनस्विानें ( जायतुस्वप)

1)

मांडक्योपनिषद्‌ २६.

से सपक्षिकमेदका सम्भवहोनेसे. अन्य विशेषण.नोह सो अकि. चित्‌कर” निष्प्‌योजनहे, यह आशकादरके कहते यहां यह अहै कि तखका अप्वोधसरूपजो निद्रारेतिसको जाथदादि तीनों अवस्थारूप स्थानों विषे तुल्यहोनेस { तीनों स्थानों को तमताहे, अतएव जाभत्‌ अर स्वस विभाग करके सुपरतिके लखावनेके अथं अन्य यत्रलप्ता इत्यादि विशेषण हं ] अथवा जासदादि तीनो अवस्थारूप स्थानो शिपि भी तच्छकी अवोधतार्प जो निद्राहै सो समानंहे, एतदयं पूवके जात्‌ स्व्नरूप स्थानो से सपुप्तिरूप स्थानक धिभाग करते है, जिसस्थानका वा कारविपे सोया हुमा पुस्प करिसीमी भोगक्षी इच्छा करतानही,अरु किसी भीं स्रधक्तो देखत नदीं ! [ एकद्दी वि्ेषणको उयावचकपनेका संभव होनेसे, दो विदेष्णोकरा स्या परयोजनंहे, यहभाका करके दोनों विशेषणो को विकल्पकरफे व्यावत्तेपनेका संभवहै, ताते व्यर्थं होयके दोनों ही सप्रयो जनै, एसा मानके कहते, जितत

¦ करके सएप्तिविपे पूवक जायत्‌ अरु स्व्षरूपस्थानोवत्‌ व्रिपरीत गहणरूप स्वन्नका दशन वा कोडमी कामना ति्यमान नहीं है एतदथ सो सुपुप्तक हिये सुपुष्तिदे।सो सुषप्तिह स्थान जिसप्रज्ञा- का फसा सषप्तिस्थानवालाहे 1 अरु स॒यप्तिस्थान एकी मतः प्र-

" कामधन पएनानन्दमया दयानन्द स्रक्‌ चतासखःप्राक्तस्वत,यःपाद्‌ <सति ्ीनद पदशयर रे यस्य मयदे, आनन्दका भोक्ताहै, चतोमुखै, रज्ञा .वृतीयपादेदटभयीत्‌ उक्षप्रकार सषप्तिरूप स्यानवालाहैः अरु एकीभरतहै, [ उक्तदोनो किसी विषय वा भोगको इच्छता नर्ही, अरु किसतीभी स्व को देखत नदी, इन)विशेपणोंकरके विपरीतं हसे रहिंतपना अरु भोगके सम्बत्धसे रदितपना कंहने को इच्छित हे ] अरु जाग्रत्‌ [ इस द्वेतसहित प्राज्ञ जीवका एकीभ्तपनेरूप पिशेषण कैसे सभवे, चह आद्रा करके कते ] अरं स्व दोनों अव- स्थारूप स्थानों पवये त्रिभागकोपाया जो सनका स्फरणरूप दैत

३० मांडक्योपनिषद्‌

कासमह, सो जेते अपनरूप आत्मासे भिन्न है, तेतेदी ति सर्प के अपस्त्यागते, रात्रिके अन्थकारकरके यस्त दिशा वा दित्स वत्‌ अविविककर रे युक्तम अपने विस्तारसाहेत कारण (अन्या कृत) रूप होता हे तिस अवस्थाविपे तिस (अव्याकृत, कारण रूप) उपाधिवाला आत्माको एकीभूत कहते हें [ यद्यपि सपि अव्रस्थाधिपे सवं कार्योका समह कारणरूप हाता ह, तवं तिलकारणरूप उपाधिवाख जा. जालमा- ^एकौभ्चतः ववदपण वाला हतार, तथापि कारणरूप उपाधिवार आत्साका “पर्ता लवन ' वप्रज्ञानघनेहे? यह्‌ षिशेषपण अय॒क्तहै क्योकि {सत्रं उपाध सेरहितः निरूपाधिरूप आत्माकोही श्रज्ञानघ इत्यादि विशे -पणका हाना संभवेहे, यह.्काकरके कहते हं ] एतद्थ,स्वभ अर्‌ जायत्‌विपे मनकरास्फुरणरूप जो ध्रज्ञानहे सो सपुक्तिविपे घनी भूतूयेवत्‌ होता हे। सो इस (सुए्ति ) अवस्थाको अव्रिवेकरूप हनेप्ते घनपरज्ञा “प्रज्ञानघन इस विरेपणसे कदत जसरात्र विपे रात्रके घन अन्वकारसे अप्रिभागको पाया सव पदाय घन चत्‌ हताह ।अथात्‌ जामत्‌, स्वभ्र अनस्थास मनका स्फुरणल्प जो घट पटाद्कोंका नाना विभागयुक्त प्रज्ञनह सा सुपृत्ति अव

रूप होतीहै तव जाय्त्‌स्वर् अवस्याका मनकास्पुरणरूप घट पटादि सर्वं पदार्थं जिसे राचिक्रे घन अंधकरारकरके अतरिभागको पायासता घट पटादि, सव पदाथ घनवत्‌ होता हे 1 तेते आत्मा प्रत्तान घनदी होताहे। [ यहां “एव> राव्द्‌ केपर्याय “ही, दाच्दकः

रके अन्ञानसे इतर जाति सूचत नहा ह्‌, यह अथं होति ] सनको विषय अरु विषयीक्रे आकारे स्फुरण होनेते टमा जो श्रम तञ्जनित्तं दुःखके अभावसे { उस अवस्थां ¡ आनन्दी

वाहुल्यतासे , आनन्दमय दहे, अआनन्दरूपही नही, क्योकि {वो

सतानन्द {-अत्रिनान्ञो आनन्दसे रदित हे ताते { अर्थात्‌ सुषु काजो आनन्द

सा मनकी ;स्मुरणाजन्य श्रमजसित दथ्छक

मा डुक्योपनिषद्‌ 1

असावसे्, ताते बो अतरिनाशी आनन्द होक नाशवान्‌ होनेक- रफे स्वरूपानन्द्‌ नहीं किन्तु आनन्दभ्रयः है ! जैसे रोकाविषे { गमनादि { भ्रमसे रहित्तदोयके स्थितये पुरुपको सखी आनन्द, का भोक्ता कहते हे ¦ तेेही सुप्तिविपे यह †प्रन्ताविशिषट चेतन्यः पुरुष जिसकरके अल्यन्तश्रमराहेत स्थितको अपर्नेविपे अनुभव करतार, तिसकरके इसको आनन्दुक्‌ (आनन्दका भोक्ता )कह्‌- तेहे “एषाऽस्य परमानन्द इतश्चतः ` (यह इस पुरूपका परमं आनन्दहै> इस श्चुत्तिके प्रमाणस, यरं [ प्राज्ञकाही“चतःमुखः * हजो अन्य वरिदोषण दे अवच तिसका व्याख्यान करते हें ] स्र अरं जायतूमय प्रतिबोधरूप चित्तके परतिद्रारभत्त होनेरे चतोमुख' . दहै; बा वोध्ररूप चित्ते स्याटिकोके अगगमनप्रत्ति सुख किये दवार जिसको, फेसाहे एतदर्थं सो चेतोस्ख है ! अरु [ इसं सुपप्ति कै अभिमानीको श्रत अरु भविष्यत्‌ विषयों विपे "ज्ञातापना हे, तेसे सर्व.वर्तमान विषयोविवे भी ज्ञातापना हे एतदथ प्रकथ कर्के जो जानती सो प्रज्ञे, अरु जो प्रज्ञे सोई धाज्ञनामेसे कहाजातादे] श्रतं अरु भविष्पत्‌का क्ञातापना अर सवं -विधर्यो काक्तञातापना इसकाहीहे, एतदथ यह ध्राज्ञ.हे। [ सषसिविपे सवं विंशेषोके ज्ञानके व्िख्यहूुये भ्राज्ञको ज्ञातापना केसे होवेगा, यह" अराकाक्ररकं कर्दत ईः यहां यह्‌ अथेह के यययाप घुघाक्तवाला पुरुष तित अवस्थाचरिपे सवं परिरोषके ्ञानसेरहित्त दो वेहेःतथापि जायत्‌ अरु स्वभ विषे उत्पन्रहुईं सव व्रिप्योके क्ञातापने रूपगाते, तात पकपक्ररके (सम्यकरूपकार ) स्वेच्छा सर्वरस जा- नताहे, एतदयं सो प्राज्ञदाठ्द्ङा वाच्य ( प्रान्ननामबाला नामी) हाते] सपष्तका भराप्वहूुञा परुषा स्वम अर्‌ जायतावप ठ्य- तात्‌ सचकषयाकं ज्ातापनरूप पवंकागात इसकरक 1 सचाप्ते-ः स्थ पुरुषो) प्राक्त कहते हं \ अयथा {तस्त अचस्यातिष्‌ जंसंक- रकं भराप्तमाच्र {अथात्‌ त्तयकं अभाव चातता वराषणरूप धि. शेपतान्ने रहित मिर्विदरेपको प्रज्ञपिमत्र, कहतेहे सहीका रूप

मांड्क्योपनियद्‌ एषसन्धश्वरएपसजञएपोऽन्तस्याम्ेपयोनिः |स ठ्वस्यप्रमवाप्ययोहिभूतानाम्‌

दे, तिक्र यद भाज { एसा कहते { अरु अन्य दोनों अ. वस्थाविये विदिष्टज्ञानभीदेभअरः सुपुत्तिविपे अन्यज्ञानरूप उपाधि से रहितन्नानहेसो ज्ञान सप्ला स्वरूपभ्रतहोनेतेशवज्ञिनाम से कहते, सो यह ।प्रज्ञप्तिनामवाया प्राज्ञ द्रतीयपाद है ५॥

हे सौम्य "एपसर्ववदवर {यदसरवेश्वरह अर्थात्‌ यह पराज्ञही स्वरूप अवस्थावाखा जा सर्वेका ईद्वरदे, अर्थात्‌ अधिदैव स~. हित भेदके समूहका नियन्ताहै, इस देतुसे अन्य नेयायि- कादिकोवत्‌ अन्य जातिरूप नहीं शश्राणवन्धनहि सोस्य सून" ददे स्म्य! श्राणरूप चन्धनवालाही मने ? इस श्चतिताक्यतते 1 [ अव ्राज्ञकेही अन्य व्िशेपणोकरो साधते ] यहदीसरवं अवस्था

भेदवाराहभा सर्वका ज्ञाता अर्थात्‌ जार दवस्याविे स्थूल जगतूको अर