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पाश्चात्य राजनीतिक विचारों का इतिहास (प्लेटों से माकस )

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आामार

हिन्दी-भाषा में छप्वी सुदचियूर्ों झोर श्रेष्ठ पुस्तकों को भी, अग्नेती के माहोल में, उपेक्षा वी दृष्टि से देखा जा रहा है भौर यहाँ तक फि बई पुस्तकालयों में एक प्रति का भी बिक पाता टेढी खीर है ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों पें भी प्रस्तुत पुस्तक ने अपना नाभ और स्थान कमाया है, पढू सभी हिन्दी-“प्रेमियों के लिए उत्साहवद्धेक है

इस पुस्तक के मवीन सस्करणा ने भ्राज जो रूप घारण किया है उसमें हमें सर्वभी न्यायमूर्ति डॉ. नाग्रेल्दसिहुजी, श्री टी. एस. चतुर्ददी, डॉ प्रवस्थी, डॉ. आर के श्रवत्यो, डा. पी. एन. ससलदात, भो बो. लाल, डॉ के वो राब, डॉ वो एस. चुद्धराज, डॉ. वी पो. वर्मा, डॉ. हरद्वार राप, डॉ श्रार एन त्रिवेदी, डॉ श्रार सी. प्रछ्ताद, डॉ. सुभाष काश्यप, डॉ. वो. शझ्रार. पुरोहित, डॉ एम डी शिश्ना, डॉ. एल पी छिन्‍्हा, डॉ. वीरकेश्यर प्रसाद सिह, डॉ वी एन. श्रोदास्तव, डॉ एम एम. पुरी, डॉ. डी पस्त, डॉ जे एस बेन्स, डर रघुदीरामह, डॉ डो. एन. पाठक, डॉ आर पो भोबात्तव, डॉ एन, झार, देशपाण्डे, डॉ लक्ष्मखसिहू, डॉ यी एन सेठ, डॉ हरि मोहन जैन, डॉ आर एन छर्मा, डॉ आर मी दुदे, डॉ एल. डी. झाकुर, डॉ एस एस सोधी, डॉ एस सो तिदाडी, डॉ. श्रार एस. गौतम, डॉ एन एम ऊफ्रा, डॉ एन एन श्रीवास्तव, डॉ वो सी शाह, डॉ पी एल जोशी, डॉ रणवीर शर्मा, डॉ म्रलोघर भगत, डॉ डी थो. सिह डॉ. प्राई एन. लिवाड़ो, डॉ. क्षो पो. गोदल एवं प्रत्प विद्वानों से ग्राशीर्याद एवं सक्तिप सहयोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्राप्त हुप्ता है, हम उनके हृदय से भाभारो हैं

प्रकाशक

पाश्चात्य राजनीतिक विचारों इतिहास

(प्लेटो से मार्क्स)

(पिभिन्न विश्वविद्यालयीं द्वारा स्वीकृत पाठ्य-पुस्तक)

डॉ. प्रभुदत्त शर्मा एम. ए. (राजनोति एवं इतिद्वास), पी एच. डी. (प्रमेरिता) एम. पो. ए. (प्रमेरिका), स्वर्ण-पदक विजेता

प्रोफेसर एवं भ्रध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

प्रावक्रथत श्रो, एं. बी. लाल भूतपूर्व कुलपति राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

कॉलेज बुक डिपो 83, त्रिपोलिया बाजार (भातिश गेट के पास) जयपुर-2 (राजस्थान)

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प्राककथन

«पश्चिम के राजनीतिक विचारकों ने ग्राज की सम्यता के मूल्यों श्रौर राजनीतिक व्यवस्थाप्रों को जन्म दिया है। इन महान्‌ चिन्तको की दाशंनिक उपलब्धियाँ झाज के बुद्धि-जगत्‌ को सुरक्षित रजनी हैं

माध्यम की कठिनाई के कारण प्राज की युवा पीढी इस ज्ञान-भण्डार का उपयोग करने में ग्पने को अ्शक्त पा रही है विश्वविद्यालयों के शिक्षकों से यह श्रपेक्षा की जाती है कि वे द्विभाषी होने के कारण संक्रमण की इस समस्या का ग्रच्छी स्तरीय पाठ्य- पुस्तकों द्वारा हल करेंगे

प्रस्तुत पुस्तक हिन्दी माध्यम से इसी दिशा में एक श्रच्छा प्रयास है। लेखक का परिश्रम सफल रहा है। उनकी शेली पुस्तक को बोधगम्य बनाती है। प्राशा है डॉ. प्रभुदत्त शर्मा का यह प्रयास हिन्दी माध्यम के नए लेखको को प्रेरणा दे सकेगा

कूलपति राजस्पान विश्वविधालय ए्‌. बी. लाल

संदोधित संस्करण को भूमिका

“पाश्चात्य राजनी तिक विच्वारों का इतिहास” (प्लेटो से साकस ) भ्रपने संशोधित नए सस्करण मे ध्ापके सामने प्रस्तुत है। गत दशक में इस पुस्तक का जो स्वागत हुप्ना है झौर इससे लाभान्वित होने वाले जिन विद्याधियों और शिक्षको ने हमें जो भी प्रतिक्रियाएँ और सुझाव दिए है, उन्हें सामने रखकर पुस्तक में कितने ही झ्ामूलचूल परिवर्तन एवं संशोधन किए गए हैं कहना होगा कि विचारों के इतिहास में मूल विचार तो नही बदलते, किन्तु उन पर चलता रहने वाला विचार-मन्थन और व्याख्याएं युग और काल के साथ-साथ नए रूप ग्रहए करती रहती हैं इस सस्करण में हमारा यह प्रयास रहा है कि भारतीय विद्यार्थी को आज की समस्यामों पर सोचने भर समभने के लिए एक ग्राधुनिक विचारभूमि प्रदान की जाएं। ग्रत

दशक में जो नई शीघ सामग्री इस क्षेत्र मे प्रकाशित हो सकी है उसे भी यज्तत्र सर्वत्र छात्रोपयोगी ढंग से इस नए सस्करण में समाहित कर तिया गया है

कागज के प्रथ्ूतपुर्व प्रभाव और छपाई की प्राकस्मिक महँगाई की प्रतिकूल परिस्थितियों मे मी हम अपने नए सस्करण को उसी बलेवर में प्रकाशित कर सके हैं, इसुके लिए हमारे प्रकाशक- बन्घु विशेष बधाई के पात्र हैं

गतिशीलता एवं निरन्तरता विचारों की दुनिया की एक

सहज विशेषता है अतः भागामी सस्करण के लिए झ्ापके विचार एवं सुभाव सादर ग्रामनन्त्रित हैं

प्रभुदत्त शर्मा

दो अब्द

प्लेडो से मास पाश्चात्य राजनीतिक विचारो का इतिहास एक लम्बी बुद्धिवादी कहती है, जिसकी पृष्ठभूमि में यूरोप की जनतान्त्रिक सभ्यता विकसित एवं वद्धित हुई है प्लेटो भौर प्ररस्तू जैसे गम्मीर चिन्तक, अगस्तीन, थॉमस और लूधर जैसे घमेवादी तथा भेकियावली, वोदों, ग्रोशियत और हॉब्स जैसे नीति निरपेक्ष दाशेतिकों श्र विचारको ने पश्चिम के राजनौति-दर्शन में उन सभी तत्त्वों का सन्निवेश किया है जो किसी भी दर्शन को भतिशील, व्यावहारिक एवं श्रादर्श बदाते हैं लॉक, रूसो, हम, बके, बेन्थम, मिल, कॉण्ट, होगल, प्रीन, भश्रैंडले, बोसाके एवं मावस प्रादि इस इतिहास के इतिवृत केबल दायक मात्र त्तहीं हैं वरन्‌ उनके विचारों की हन्द्वास्मकवा ही मानव विचारों के दौद्धिक विकास की वह झात्मा है जिसमे समुचा सुग प्रपती समग्र परित्यितियो के साथ प्रतिबिश्वित एवं प्रतिध्वनित होता म्रुनाई पडता है। पश्चिम के राजनीतिक विधारो का यह इतिहास बुद्धिवादी इन्सान की एक बौद्धिक तीर्थ- यात्रा है ग्लोर पश्चिम की सभ्यता, संस्कृति, राजनीतिक सस्थाएँ एव राष्ट्रीय चरित्र इन्हो विचारो के परिप्रेक्ष्य मे जन्मे शौर मर-मर कर जीपे हैं।

प्रस्तुत रचना पाश्चात्य राजनीतिक विचारों के इतिहास को विद्यार्थियों के हित की दृष्दि से संक्षेप में प्रस्तुत करने के लिए तैयार की गई है बहुत थोडे में स्पष्ट ढय से थे सभी मूल बातें कहते का प्रयास किया गया है जिनका भ्राघार लेकर एक गम्भीर विद्यार्थी प्रपना क्‍्ध्ययन अपने प्राप चला सकता है। भाषा, शेसी एबं विवेबना की दृष्दि से भो सरलता, स्पध्ठता ओर बोभपम्यता की भ्रोर विशेष रूप से सचेष्ट रहा गया है

थ्राशा है विद्यार्थो-जगत्‌ इसे उपयोगी पाएगा प्रौर इसके अनुशीलत से लानान्वित हो सकेगा |

प्रभुवत्त शर्मा

अनुक्रमणिका

हे

9 राजनीतिक चिन्तेन का स्वरूप झौर महत्त्व डा

(र४४0०7९ 9ए१त [090744529 700॥0286॥ 796०20४0) राजनीतिक चिन्तन की प्रमुख समस्याएँ

राजनीतिक परिस्थितियाँ श्रौर राजनीतिक विचारक ब्लड राजनीतिक बिन्तन के प्रध्यपन की उपयोगिता झौर महत्त्व. ...« यूरोपीय एवं प्रयूरोपीय विचार बन राजनोति-का प्राचोन दृष्टिकोण ; प्लेटो का दाशेनिक शादशंवाद

(इ४७९ #एल€्ण १।९क्त | एगापल : 706 एच०5०कशं८शं 6ठ2शॉंधछ ण॑ ९००) प्लेटो : जीवन-परिचय डर

प्लेटो के ग्रन्ष

प्लेटो की शैली सथा प्रध्ययन-पद्धति ि

प्लैटो पर सुकरात का प्रभाव न्ब्न

“रिपब्लिक' : स्वरूप एवं विषय-वस्तु “रिपब्लिक' में न्‍्याय-सिद्धान्त “रिपब्लिक! में शिक्षा-सिद्धान्त /रिपब्लिक' में सास्यवाद का सिद्धान्त ले +रिपब्लिक! में प्रादर्श-राज्य ््े

आ्रादर्श राज्य का पतत झोर शासन श्रण्पालियो का वर्गीकरण -«« कानून का निषेध हर "रिपब्लिक” में लोकतम्न् की भालोचना लेक

ध्लेटो प्रौर फासीवाद ले प्लेटो : “स्टेट्ससेन! घथा लॉज' बन “स्टेट्समेन! मे श्रादर्श शासक एवं कानून सम्बन्धी विचार “स्टेट्समैन” मे प्लेटो का राज्यन्वर्गोकरण

स्टेट्समिन” 'रिपब्लिक' के राजनीतिक विचारो मे भ्रस्तर 'लॉज!

'लॉज' में प्रतिपादित मुख्य सिद्धान्त

नलॉज” का मूल्यांकन तथा देव

प्लेटो की रचनामो मे यूनानी तथा सावंमौम तत्त्व सर

| ]6 ॥7 9 2॥ 26 42 55 73 85 57 88 90 शव 95 0 403 404 07 ]20 324

में अनुत्रमणिका

3 श्ररस्तू का व्ानिक् यथार्थवाद (दाव 5तंरच्थाओप एट्डाइच वी हैतंड(07९) 'फॉलिटिक्स! ; एक अपूर्ण कृति अरस्तु पर 'लॉज' का ऋण अरस्तू के राज्य सम्बन्धी विचार श्ररस्तू के दास-प्रथा सम्बन्धी विचार ग्रस्तू के सम्पत्ति सम्बन्धी विचार अरस्तु के परिवार सम्बन्धी विचार अरस्तृू द्वारा प्लेटो के साम्यवाद की भ्रालोचना अरस्तू के नागरिकता सम्बन्धी विक्ञार अरस्तू के कानून सम्बन्धी विचार प्ररस्तू की न्याय सम्बन्धी घारणा श्ररस्तू के शिक्षा सम्बन्धी विचार अरस्तू एव प्लेटो के शिक्षा सम्बन्धी विचारों की तुलना सबिघान वा अर्थे और सविधानों का वर्गीकरण सर्वोत्तम संविधान श्रादर्श राज्य अरस्तू के क्रान्ति सम्बन्धी विचार अ्रस्तू और प्लैटो श्ररस्तू में यूनानी एवं सार्वभौम तत्त्व और उसका प्रभाव अरस्तू का प्रभाव : अरस्तू राजनीति का जनक 4 रोमन कानून ([00999 [.9क्त) रोप का साँविधानिक दिकास रोमन राजनीतिक चिन्तन की विशेषताएँ रोमन राजनीतिक विचारक--पोलिवियस सिसरो का राजनीतिक देशन सेनेका रोमन कानून रोमन प्रनु्शाक्त वी घारणा रेफर रुप कब योफदाण 5 स्टोइक्स (80००७) प्राइतिक विधियाँ सार्वेभौम विश्वन्जनित राज्य मे सिद्धान्त म्रानव-स्वमाव

क्हमह

425

28 3] 5 6: 22. ]43 व50 ]54 44535 ]58 63 ]67 )70 है 77 78 886 90 १96 204 208 27 25

26 248 220 224 ब्ज्टे 235

239 24]

ख्बठ

243 245 246

ज्‌क

स्टोइक दर्शव की प्रालोचना

स्टोइक दर्शन का प्रभाव

राजनीतिक विचार के क्षेत्र मे यूतान की देन ईसाई सिद्धास्त : सन्त झ्रागस्टाइन एवं प्रन्य (गाल एवाजआाबड ०007७ : 50 #णएट2ए50 7९ 870 00९) ईसाई धर्म का प्रम्युदय भोर विकास ईसाइयत की विजय के परिणाम

ईसाई धर्म का प्रारम्भिक राजनीतिक चिन्तन ईसाई प्राचार्यों का राजनीतिक दर्शन

सन्त अम्ब्रोज

सन्त प्रॉगस्टाइन

ग्रेगरी महान

दो तलवारो का सिद्धान्त

ईसाइयत की देन

अनुकाशिका हे

मध्यकालीन स्कूल : टॉसस एक्वीवास झोर उत्तका विद्यानुराग,

मार्सोलियो भ्रोफ पेड्म्रा। झ्ादि (7७० ##००८चका 500०० 7७0०099$ 4 ९ए७४००३ 8०० 9 85 0ण4॥९5७, ै3/ञ्ञ० 0 9३004 ९९.)

मध्यकालीत राजनीतिक चिन्तन की पृष्ठभूमि दुयूटव (जमंन) जातियो के राजनीतिक विचार सामस्तवाद

पोप की शक्ति का विकास

पवित्र रोमत साम्राज्य

राष्ट्रीयता की भावता का विकास

सध्य युग का प्रनुदाय झौर उसकी विशेषताएँ चर्च और राज्य के मध्य सघर्ष का युग

4थी शत्ताब्दो के विवाद की विशेषताएँ

चर्च तथा राज्य द्वारा प्रपने-अपने पक्ष मे प्रस्तुत दावे मध्यकाल के कुछ विचारक

जॉन श्रॉफ सेलिसवरी

सन्‍्त्र टॉमस एकक्‍्वीतास

एजिडियस रोमेनस

दाँते : आंदशे साम्राज्य

जॉन प्रॉफ पेरिस

भासिलियों प्रॉफ पेडुआा

विजल्लियम प्रॉफ श्रोकम

246 248 248 257

25 252 256 260 267 263 269 थ्7ा 274

276

276 277 279 283 287 290 290

297 308 309 ३37]

3॥॥ 345 328

33

334

33उप 346

# अनुक्रमणिका

8

५0

डा

2

परिषदीय प्रास्दोलर (१६6 (7० क:पांध 8र८ाएचण7

शिद्धान्त, प्रादुर्भाद के कारण एवं उद्देश्य परिवर्दे

आदोत्नन की प्रझफलता

अआत्दोतन का महृत्त्व

परिषदीय प्रान्दोलन के प्रमुख विचारक

(जॉन वाइक्लिफ, जॉठ हस, जोंग गेत, निकोलस प्रॉफ बयूसा )

पमर्भागरण

एएशा॥६ञ 7॥0०४४५३७ ६6 ३३७४६७४७ 48६ " छ९93$58006) पुरर्णागरण : झर्थे एवं परिभाषा

पुनजनि रण की पृष्ठभूमि

पुनर्जागरण के कारण

पुनजमिरण का प्रारस्भ और प्रसार : इठली का पथ-अ्रदर्शन

यूरोप के ग्रन्य भागों में पुनर्जागरश पुनर्जागरण के सामान्य प्रभाव

धर्म सुधारक : सूपर

(ऐेश५१७४४०७ :.006)

परिचयात्मक : धर्म-सुध्ार आरदोलन का स्वरूप

सुधार आन्दोगत के प्रमुख नेता और उन्तके राजनीतिक विचार...

[मादिन लूथर, मेलौकर्या, ज्विगली, काल्वित, जोन मॉक्स) सुधार पग्ारदीलत में निरकुशतावाद और प्रजातम्त्र के बीज अमे सुधार झान्दोतन वी देन प्लोर उसका महत्त्व मरियायलों

(ेजिल्कोबश्ला)

मैक्यावली : जीवनी, प्रध्ययत-्पद्धति एवं कृतियौ मेकियावली युग-शिशू के रूप मे

मानव स्वभाव . सार्वभौस झहवाद

मेक्यावली के धर्म भोर नेतिकता सम्बन्धी विचार मेजियावली के राज्य सम्बन्धो विचार

ग्रस्तदूं प्दि भ्रौर भुटियाँ

मेक्रियाबली भाषुनिक युग का विता, उतकी देव भौर अ्रनाव

जोन बोदां एद हा गो शोशियस

(उ७३ 8०9७ १०4 घरषड० 679॥795)

जीव बोदाँ जौदनी, रचनाएँ एवं पद्धति बोदी दे राज्य और परिवार सथ्वन्धो विचार

हु

हमर

349

349 385 359 360 362

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369 370 जा 375 377 378 380

380 983

397 399 40॥

40] 405 १६8 422 बाप ब्रा 429 434

424 437

33

१]

अनुन्तमशिका

बोर्डां के प्रमुसत्ता सम्बन्धी विचार

बोदाँ के सुव्यवस्यित राज्य सम्बन्धी भ्रन्य विचार शक बोदाँ और में कियावली की आधुनिकता के प्ग्रदूत के रूप मे तुलना ह्ा.गो प्रोशियस ग्रोशियस के प्राकृतिक कानून सम्बन्धी विचार न्‍्डें ग्रोशियस का अन्तर्राष्ट्रीय कानून सम्बन्धी विचार अब:

ग्रोशियस के प्नमुसत्ता सम्बन्धी विचार ग्रोशियस को देन और उसका महत्त्व सामाजिक पनुचन्ध का.युग : टॉमस होंब्स कक (8९ 506 0०090उ९ 8०7४5 000९३)

जीवन-च रित्र, कृतियाँ एवं पद्धति कब हॉब्म का वैज्ञानिक मौतिकवाद

हॉब्स के मानव-स्वभाव सम्बन्धी विचार प्राकृतिक अझ्वस्या के विपय में हॉब्स के विचार हज प्राकृतिक अधिकार श्रौर/ प्राकृतिक नियम ्ू प्रात्म-रक्षा को प्रकृति श्रौर बुद्धिसगत प्रात्म-रक्षा राज्य की उत्पत्ति तथा उसका स्वरूप

प्रमुमत्ता

नागरिक कानून पर हॉब्स के विचार

राज्य तथा चर्च

हॉब्स का व्यक्तिवाद

हॉब्स के विचारों वी श्रालोचना शोर मूल्यॉकन जॉन लॉफ लय (उणा३ 7,0०९४९)

जीवनी, कृतियां एवं पद्धति लक मानब-स्वभावद, प्राकृतिक अवस्था एवं प्राकृतिक अधिकार .... लॉक की सामाजिक सविदा फने सरकार के कार्य और उसकी सीमाएँ लॉक के कुछ अन्य विचार

लॉक को प्रसंगतियाँ

लॉक का महत्त्व और प्रभा:

जोन जेक्स रूसो हर (उ€३७ उ<८बुए८३ ह००३१८३७)

जीवनी, कृतियाँ एवं पद्धति मसानव-स्वभाव तथा प्राइतिक अवस्था पर रूसो के विचार रूसो की सामाजिक सविदा सम्बन्धी घारणा

440 446 450 453 455 458 460 463 ब6व4

465 466 473 475 477 48] 482 485 488 490 492 494 500

500 302 530 545 5]8 322 524 528

528 530 334

४४ पअ्नुक्रमशणिका

6

7

8

रूसों की सामान्य इच्छा सम्बन्धी घारणा इक रूसों की सम्प्रमुता सम्बन्धी घारणा या रूसो के शासन सम्बन्धी विचार रूसोरे के कुछ अन्य प्रमुख विचार रूसो का मुल्याँकन एवं प्रभाव ऐतिहातिक श्नुभववादी * छा झोर बर्के (7॥8 पछाहर002०9] दृएफ्रा।8४5५5 : प्रा शत छै0060) डेबिड हम की जीवती ओर कृतियाँ ब्ल्ल ह्,म का सशयवाद ह्ा,म के राजनीतिक विचार प्राकृतिक विधि का विनाश हा,म का प्रभाव एंडमण्ड बर्क बर्क की समकालीन परिस्थितियाँ और उनका प्रभाव वर्क के राज्य अथवा समाज श्र मामाजिक सविदा सम्बन्धी विचार सविधान, समसदीय प्रतिनिधित्व प्रौर राजनीतिक दल ग्रधिकार, सम्पत्ति, क्रान्ति ग्रादि पर बर्के के विचार बद्ं का मूल्यांकन एवं प्रभाव उपपोगितावा दी : जर्मी बेन्यम (706 ए॥॥॥4048$ 67९७9 0६58७) उपयोग्रिताबाद का विकास उपयोगित्ताबाद के सिद्धाम्त जर्मी बेस्थम के बेन्चप बा उपयोगिताब्द एवं खुखबादी मापक्र यन्त ब्थ देन्यम का राजदर्शन बेम्थम के सिद्धान्तों की आलोचना बेन्यम को राजनीतिक चिन्तन को देन जॉन स्टुप्रद मिल (7000 50४ जा) मिल के उपयोगितावादी विचार मिल की स्वतन्त्रता सम्बन्धी घारणा मिल की राज्य सम्बन्धी घारणा शासन वी सर्व्षेष्ठ प्रणालो मिल की प्रतिनिष्यात्मक घासन-सम्बन्धी घारणा

539 550 552 ईउव 558 56]

56] 562 564 567 570 374 32

कक 577 580 582 586

586 ड्धप 390 593 398 683 6]6 620

625 632 644 6547 547

१9

20

प्रनुक्रक शिका शां

जॉन स्टुआर्ट मिल एक प्रसस्तुष्ठ प्रजातन्व॒वादी के रूप मे-- वेपर के विधार जॉन स्टुग्र्ट मिल का राजनीतिक अरथे-व्यदस्था का सिद्धान्त .... मिल का योगदान (देन) और स्थान ध्कल प्रादशंदादी परम्परा : इमेनुअल कॉण्ड रन] (7९भॉां5। प793009 : 7कछा३9००७॥ छू36)

भ्रादर्शवाद का भ्रभिप्राय और उसकी ऐतिहासिक परम्परा आ्रादशंवाद का सिद्धान्त * अंक जर्मन श्रादर्शवादी कॉप्ड रे कॉण्ट से पूर्ववर्ती विचारघारा कॉण्ट के दार्शनिक विचार कक कॉण्ट के नंतिक इच्छा तथा नैतिक स्वतन्नता सम्बन्धी विचार... कॉण्ट के राजनीतिक विचार डे

कॉँण्ट के दर्शन की आलोचना और उसच्का मूल्यांकन जे जाजं विल्हेलम फ्र डिक होगल बबबन (ए९०णा३९ जराशालत ए्रउल्तातछ प्रल्हरा)

जीवन-परिचय एवं रचनाएँ बल्ब

हीगल की इन्द्वात्मक पद्धति हीगल का व्यक्तिवाद तथा राज्य का सिद्धास्त

हीगल की स्वतन्त्रता सम्बन्धी घारणा हीगल के दर्शन की ग्रालोचना के हीयत का प्रभाव एव मूल्यांकन जे डॉमस हिल प्रीन ब्ग्बन (70०ण३5 परत ठाध्था)

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि केक ग्रोन (जीवन-परिचय एवं रचनाएँ) ३५ भ्रीन के विचार-दर्शन के स्रोत न्क्र ग्रीत का झ्ाध्यात्मिक सिद्धान्त कल ग्रोन का स्वतन्त्रता सम्बन्धी सिद्धान्त ग्रीन्‌ की अधिकार सम्बन्धी धारणा हक

प्राकृतिक कानून पर ग्रीन के विचार सम्प्रमुता पर ग्रीन के विचार प्रतिरोध का प्रधिकार “सामान्य इच्छा” पर ग्रीन के विचार राज्य के कार्यों पर ग्रीन के विचार नल राज्य और समाज ब्न्न

656 660 662 666

666 6568 672 675 676 680 682 हु 92 695

695 698 708 726 733 739 743

743 कब 747 750 754 758 764 765 768 हग्प 774 778

एक अनुक्रमणिका

विश्ववच्धुत्व एवं युद्ध पर ग्रीन के विचार दण्ड पर ग्रीन के विचार सम्पत्ति पर प्रीन के विचार ग्रीन के दर्शन का सूल्याँकन

22. प्रैंडले एवं बोसांके (छ79965 2590 80590व०८) फ्राँसिस हर्ट ब्र डले ब्रॉडले के राजनीतिक विचार श्र डले के विचारों की भ्रालोचना बर्नाई बोसांके दोमांके का इच्छा सिद्धात्त बोसाँके का सस्था सिद्धान्त बोसाँके का राज्य सिद्धान्त

राज्य एवं श्यक्तियत तथा सावेजनिक कार्यों पर वोसांके के विचार

बोसाँके के दण्ड सम्वस्धी विचार बोसांके के दर्शन वी झ्रालोचता और मूल्यांकत ग्रीन भ्रौर बोसाँके 23. काले मार्क्स झ्रोर वेज्ञानिक समाजवाद (गो हाशर 294 55९०० 8005) माक्स वा वेज्ञानिक समाजवाद दन्द्वात्मक भौतिकवाद इन्द्वात्मक मौतिकवाद का मार्क्स का सारांश दम्द्वात्मक भौतिकवाद की झालोचना इतिहास की भौतिकवांदी व्याख्या बर्ग-सचर्प का सिद्धान्त माक्स का भूल्य एवं श्रतिरिक्त मूल्य का विद्धान्त मास का राज्य सिद्धान्त मास का मूल्यांकन प्रश्नावलो (एज्टा४4५ (0०९०४४००७»)

कक

हक प82 785 788 796

796 796 798 800 80॥ 803 804 807 809 840

83

845

822 822 828 830 833 843 86] 866

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जोर महत्व

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राजनीतिक चिन्तन का स्वरूप

मानव-सम्यता की राजनीतिक, सामाजिक, झाधिक, धार्भिक, प्रादि सभी संस्थाभ्रो के स्वरूपो को समझना; उनसे सम्बन्धित समस्याप्तों का मनन भौर समाधान करना एक गम्भोर बोद्धिक चुनोतो है। सनुष्य झ्ादिकाल से ही इस चुनोती को मेलतते हुए भागे चढता रहा है | राजनीतिक चिन्तन के क्षेत्र मे, विश्व फी हर सम्पता मे भ्रपने शंशवकाल से ही राज्य धौर पिविशप्न राजनीतिक सस्याप्रो के विभिन्न पहलुओं पर म्यूनाधिक चिन्तन किया है ! वर्तमान मे भी मह प्रक्रिया निरन्तर चल रही है। राज्य सम्बन्धी मौलिक प्रश्नो पर विचार-विमर्श एवं मीमासा करना ही राजनीतिक चिन्तन है प्लोर यह्‌ चिन्तन उतना ही पुराना है जिंतता स्वय राज्य $ वेपर के अनुसार--“राजनीतिक चिन्तन बहू चिन्तन है जिसका सम्बन्ध राज्य, राज्य के आकार, राज्य के स्वभाव तथा राज्य के लक्ष्य से है इसका मुरुय कार्य 'समाज मे मानव का नैतिक पर्यवेक्षण! करना है इसका उद्देश्य राज्य के भस्तित्व, स्थिरता तथा + त्ूमता ने लिए विवरण प्रतुत करना ही नहीं है, वरन्‌ राज्य कमा है भौर किसी को राज्याजश्ा का पालन वयो करना चाहिए, राज्य का कायं-क्षेत्र क्या है घौर कोई राज्याज्ञा का उललघन कब कर सकता है, तथा राज्य के बिना श्रपुर्णे मानव की शक्ति क्या रह जाती है, प्रादि का उत्तर देने के लिए भी यह चिऱ्ालसे प्रयत्तशील है (7 वस्तुत- राज्य, समाज ग्रौर मनुष्य के पारस्परिक सम्बन्ध राजनीतिक चिन्तन के विशेष शग हैं! ये सुदूर, भशात अतीत से मानव-जीवन को प्रभावित करते रहे हैं “मनुष्य की प्रकृति और उसके कार्य, शेष विश्व से उसका सम्बन्ध जिसमे कि * सम्पूर्ण जीवन का विवेचन प्रन्तरिहित है भौर इन दोनो बातो को परस्पर त्िया- प्रतिक्रिया से उत्पन्न होने वाली मनुष्य की झपनी सह-जातियो से सम्बन्ध की समस्या ही राजनीतिक विन्तन का प्रमुख विषय है घोर इसके प्न्तर्गत राज्य का स्वरूप, प्रयोजन तथा उसके कार्यों का विवेचन--सभी समाविष्ट हैं ॥/3

] बेपर साजदर्शन फा स्वाध्ययत (हिन्दी) पू, ! 2. 25 70797 : & प्राशागड ण॑ एगाच्क प्रफ००ड४, . 45.

2 पराश्चात्य राजनीतिक विचारो का इतिहास

राजनीतिक चिन्तन की विवय-्सामगी का स्पष्ट आभास मिलता है, लेकिन राज्य और उसके सस्थानो तथां उनके विभिन्न पहलुओं से सम्बन्धित प्रश्नों का कोई भी निश्चित ग्रथवा सर्वेसम्मत उत्तर प्राप्त नहीं होता क्योकि राजनीतिक जीबन के उद्देश्य सामान्य जीवन के उद्देश्य से अलग नही हैं “प्रत राजनीतिक चिन्तन तथा राजनीतिक सिद्धान्त के प्रश्वोत्तर, अन्त मे, हमारे उचित भर अनुचित की घारणाओं के धर्मकटे पर ही तोले जाने हैं राजनीतिक विन्तन नैतिक दर्शन (का प्र॥व०५) की एक शाखा है। इसके मौलिक सिद्धान्तो के विषय में सदा मतभेद रहा है और सम्मवत, सदा-सवंदा रहेगा ।””! राजनीतिक चिन्तत इतना

विस्तृत और जटिल है कि युगी से इस पर चिन्तन चला रहा है और इसका कोई छोर नजर नही झ्ञाता विस्तार का ग्राभास प्राचीन, मध्यकालीन एवं अर्वाचीत विचारको की रचना मे प्राप्त होता है और प्रत्येक विचारक की मान्पताएँ उसकी अपनी दार्शनिक घारणाझो से प्रभावित हैं।इन कृतियो में तत्कालीन युग और उसकी प्रमुख समस्याएँ मुखरित हुई हैं राजनीतिक चिन्तन की प्रमुख समस्याएं (फाभुण एकीलशए5 एगापल्यो प्कण०ण्ड्रता)

राजनीतिक समस्याओं प्र विचार-विमर्भ श्रौर मीमाँसा करता ही राजनीतिक चिन्तन है इने समस्याप्रो पर विभिन्न युगो में भौर एक ही युग में विभिन्‍न्त विचारकों ने विभिन्‍न मत प्रकट किए है ये प्रमुख समस्याएँ निम्न॑- लिखित हैं --

(3) राज्य को उत्प त्त को समस्था--राज्य की उत्पत्ति के विष मे इतिहास के पृष्ठो को उलटने पर हमे कोई निश्चित सूचना नहीं मिलती भरत” झनुमान ओर भन्वेषण बा आश्रय लेकर ही हम इस मार्ग पर अब तक बढ थाए हैं। राज्य की रुत्पत्ति के विषय मे आधुनिक युग वे आरम्भ मे दो प्रमुख सिद्धान्तो--देवी-उत्पत्ति सिद्धान्त और सामाजिक सबिदा सिद्धान्त का विशेष प्रचलन था प्रयम सिद्धान्त के प्रनुतार राज्य ईश्वरकृत है झोद द्वितीय सिद्धान्त के भ्नुसार मनुष्यकृत 8वी शताब्दी में सबिदा-सिद्धान्त यूरोप मे तिरकुश देवी राजसत्ता के नियन्नण के लिए बडा सहायक पिद्ध हुप्रा, किन्तु ।9दी शताब्दी मे ऐतिहासिक ज्ञान में वृद्धि हुई। ऐतिहासिल ब्रशुशीलत में ग्लालोचनात्मक पद्धति का विकास हुआ, और विदासवाद के सिद्धान्तों के श्रसार को बल मिला | फलस्वरूप सदिदा सिद्धान्त को /वल्पतिक भौर अमान्य समझा जाने लगा एव विकासवादी पिद्धान्त को लोकप्रियता मिली यह विक्ञासवादी सिद्धान्त ही वर्तमान में शज्य की उत्पत्ति का सर्वाधिक मान्य, उचित और त्व-सम्मत सिद्धान्त है / गानेंर के अनुसार, “राज्य नु तो ईश्वर को कृति है, विसी देवी शक्ति का परिणाम, किसी प्रस्ताद अथवा सविदा की सृष्टि है पौर ही परिवार का विस्तार मात्र कहा जा सकता है। यह विकास और

देवर ; उपयेस्ट, पु

राजनीतिक चिन्तन का स्वरूप श्रौर महत्त्व 3

उन्नति की एक घोमी सतत प्रत्रिया है यह्‌ अवसमात्‌ नहीं बना अपनी प्रारम्भिक अवस्था से घीरे-धीरे विकसित होकर इसने अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त किया है ।” राज्य का प्रादुर्भाव शर्म -शर्न. मानव-समाज में व्यवस्था झौर सरक्षण की झावश्यक्ताओ को पूरा करने के लिए हुआ समझा जाता है (2) राज्य के स्वरूप झौर उसके झादेश के पालन फी सोभा की समस्या-- राज्य के स्वरूप के विषम मे विभिन्‍न विचारबों में मतेक्प्र का अभाव रहा है उन्होने विभिन्‍न युगो मे और यहाँ तक कि एक हर सुग से भो विभिन्‍त एवं परस्पर विरोधी विचार प्रकट किए ' हैं | प्लेटो के पूर्वगामी सोपिस्टो ने राज्य को इृतिम व्यवस्था की संज्ञा दी थी उनके झनुसार मनुष्यों ने राज्य को एक ऐसे लक्ष्य की पूर्ति के लिए बनाया है जिसे हम प्राकृतिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं मान सकते | कुछ उम्रवादी एवं ऋ्ान्तिकारी विचारको ने ठी राज्य को प्रकृति के हो विरुद्ध बताया है वे कहते थे कि प्रपती शक्ति के झनुसार दूसरो को अधीन बनाना तथा उनके ऊपर शासन करना प्रकृति का घर्मं है। राज्य सवल का निर्बल पर शासन सम्भव बना देता है क्योकि राज्य का लक्ष्य है बहुमत वी सेवा तथा सुरक्षा ओर बहुमत सर्दव निर्बेल व्यक्तियों का रहा है क्रान्तिकारी सोफ्स्टो का यह तर्क एक झादर्श जनतन्‍्त्री राज्य पर कुठाराघात करते हुए ग्र॒त्याचारी राज्यो का समर्थन करता है और इसीलिए प्लेटो (740०) ने सोफिस्ट-सिद्धान्तों पर करारा . प्रह्मर करते हुए राज्य को एक स्वाभाविक सगठन माना है। प्लेटो और ग्ररस्तू (#7)६0०॥८) का यह दृदू विश्वास था कि मनुष्य सी सामाजिक भावना से ही राज्य की उत्पत्ति हुई है राज्य का विवास सर्वेया स्वाभाविक है भौर व्यक्ति राज्य में रहते हुए ही अपने विकास के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच सकता है 4 राज्य की प्रकृति के सम्बन्ध में अपना मत व्यक्त करते हुए झरस्तू ने कहा है--“राज्य का जन्म जीवन के लिए हुआ झौर जीवन को श्रेष्ठ सम्पन्त बनाने के लिए झ्राज तक जीवित है ।”” राज्य की प्रकृति के सम्बन्ध मे और भी श्रनेक धारणाएं हैं कुछ विचारको के ग्रनुमार राज्य देविक सृष्टि होने के कारण स्तुत्य है, तो बुद्ध अन्य दाशंनिको के मत में यह एक ऐसा शोषणा-यन्त्र है जो घनिक स्‍ग्लोर सम्पन्न वर्ग के हाथ में खेलते हुए भाधिक रूप से निर्वल व्यक्तियों का शोपण करता है। संगभौताबादियो के विचारानुसार राज्य मनुष्यों के आपसी समझौते का परिणाम है प्ौर राजसत्ता द्वारा अपने दायित्वों का पालन होने पर यह्‌ समझौता खण्डित हो जाता है, और प्रजा राजसत्ता के आदेशों के अनुपालन के लिए बाध्य नहीँ रहती इतिहास मे ऐसे विचारक भी मिलते हैं जो राज्य को मनुष्य के नेसगिक अधिकारों जैसे--स्वतन्त्रता, समानता ओर, सम्पत्ति को सोमित करने वाला यन्त्र समभते हैं। यही नहीं बल्कि ऋुछ प््य चिल्तक राज्य को एक घनावश्यक पाप मानते हैं श्र इसीलिए इसके उन्मूलन पर बल देते हुए झराजक्तावाद का समर्थन करते हैं। झ्राजक्तावादियो ५। यह मान्यता है कि केवल मात्र राज्यविहीन समाज में ही मादव-झीवन का सर्वोत्तम दिवाप्त सम्भद है * इसके एकदम विपरीत उपयोगितावादी विचारक राज्यु को

4 थएदात्य राजनीतिक विचारों का इतिहास

क॒ल्पाणका री संस्था के रूप मे स्वीकार करते हैं। वे उतयोग के झाघार पर राजसत्ता के आदेशों का पालन प्रावश्यक बतलाते हैं। उनकी मान्यता है कि राज्य भधिकतम व्यक्तियों के प्रधिकतम सुल्ल का व्यवस्थापक है और उसको ओऔाज्ञा का पालन करता हमारा कत्त॑व्य है स्पष्ट है कि इन पारस्परिक विरोधी घारणा्ों में से सत्य की माप करता (क कठित कार्य है॥ राजनीतिक चिन्तन का इतिहास इस बिवय में प्रकट किए गए नाना विचारों एवं मत-मतान्तरो का दिग्दर्शन ही प्रस्तुत कर सकता है | (3) राज्य के सक्ष्य को समस्या--राज्य के बारे से ऋधिकतर उठता रहने वाला एक अन्य मौलिक प्रश्द यह भो है कि राज्य का लक्ष्य वया है? राज्य की उत्पत्ति क्यी हुई भौर वह आज तक क्‍यों जीवित है ? राज्य की कार्य-सीमा क्या है ? कुछ दार्शनिक राज्य को मानव की सर्वोच्च कल्थाणकारी सर्वोत्कृष्ट मानवीय संरुषा मानते हैं तो इसके विपरीत भ्रराजकताबादी राज्य को मानव-विनाशक सस्या मानते हुए इसकी शीघ्रातिशी समाप्ति चाहते हैं। वे राज्य को “मानव-मस्तिष्क पर एक चोर कलूंक और उसके दक्ष-यज पर एक मारो भार” उसमे हैं. उसका यह विश्वास है कि राज्य का जितना जल्दी उन्मूलन कर दिया जाएगा समाज के लिए वह उतना ही श्रेयस्कर होगा इन दो परस्पर विरोधी श्रूवों के बोच कुछ ऐसे मध्यमार्गो भो हैं जो राज्य को बुरा मानते हुए भी उसके भरस्तित्व को प्रावश्यक समभते हैं किन्तु ये लोग उसके कार्य-क्षेत्र को सीमित कर देना चाहते हैं। ये लोग जनपालक के रूप में राज्य की समाप्ति चाहते हैं, किन्तु जनरक्षक के रूप में उसे भ्रावश्यक मानते हैं राजनीतिक चिन्तन के इतिहास से हमे इस समस्या पर विद्वानों द्वारा प्रकट विचारों का ज्ञान मिलता है राजनीतिक चिन्तन को ग्राज भी वह एक प्रमुखतम समस्या बनी हुई है कि राज्य का लक्ष्य वा है या बया होना चाहिए ? (4) राज्य के झाझार को समस्या--राजदर्शन का चौथा प्रश्न राज्य के झ्राकार का है प्राचीन यूनानी विचारक राज्य के सीमित झाकार और उसकी सीमित जनसख्या के पक्ष मे ये। प्लेटो ने 'लॉज” में अपने भाद्े मगर-राज्य के निवाधियों की संख्या 5040 निश्चित की थी यूनानी युद्र में छोटे-छोटे नगर-राज्य होते थे जिनमें भ्रावागमन के साधन भ्विकसित थे झौर वर्तमान निर्वाचन-प्रस्याली का अभाव था | शायद इसीलिए प्ूताती विचारकों ने राज्यों की जनसख्या को कम निश्चित करने का प्रयत्न किया रोमन साआ्राज्य की स्थापना के बाद छोटे राज्यो का स्थान विशाल साम्राज्य ने से लिया | मध्य युग के क्‍झन्त मे राष्ट्रीय राज्यो का जन्म दवप्मा भोर महाविनाशक बसों एवं राकेटों से भयाक्रान्त विश्द के अनेक बुद्धिशील विचारक प्ाज विश्व-राज्य की स्थापना चर बल दे रहे हैं पर यह स्दप्न कभी साकार होगा, इसमे सन्देह है विश्व के राज्य अपनी सम्प्रमुता का त्याग सम्भवत्तः कमी नहीं करेंगे। (5) सर्वोच्च प्रभुसता सम्दन्धो समस्या--राजनीतिक दिस्तन का एक महत्वपूर्ण प्र] सोच प्रमुत्त्ता से भी सम्बन्धित है मध्यकालीन शूत्तेप मे निरंकुश

राजनीतिक चिन्तन का स्वरूप और महत्त्व

राजपत्ता (6500० श>यवाणा+) का बोजवाला था, भव: उप्त समय राजा को सर्वोच्च सम्प्रमु माता गया लुई 4वाँ कहा करता था--“राज्य क्या है? मैंही तो राग्य हूं (7.8097 0'८६ ए०) ॥7 उस समय राज्य की सम्पूर्ण प्रमुसत्ता को राजा में निहित समझा जाता था रूसो ने इस विचार पर कठोर प्रहार करते हुए सर्वजनवासिनी लोकप्रिय प्रमुसत्ता (?0फॉए|श $5०४८८४7४४) के सिद्धान्त का भअ्रतिपादन किया उसने इस भाँति यह मान्यता प्रकट की छि प्रमुसत्ता राजा मे नहीं भपितु राज्य की सम्पूर्ण जनता में निहित है। 9वीं शताब्दी में लिखित संविधानों के प्रचलन के फलस्वरूप राज्य के विभिन्न झंगों मे शक्ति-विभाजन के सिद्धान्त को जब बल मिला तब विचारको मे इस प्रश्न पर चिन्तन झारम्भ किया कि राज्य के किस भ्रग मे प्रमुसत्ता का निवास है। आप्टिन, ने अविभाज्य प्रमुसत्ता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया तो बहुलवादियों (2[ए०॥४$$) ने उस पर कठोरतम भाषात करते हुए राज्य की प्रभुसत्ता के प्रस्तित्व को प्स्वीकार्य बतलाया।॥ लास्कफी ने तो यहाँ तक कह डाला कि “'प्रमुत्व-्कल्पना को ह्थाग देना राज्य विज्ञान के लिए स्थायी रूप से उपयोगी होगा।” क्रेब (720७८) ने भी लास्की के साथ सहमत होते हुए कहा है कि “राज्य प्रमुत्व॒ का सिद्धान्त राजनीति शास्त्र से समाप्त कर दिया जाना चाहिए ।”

(6) सरकार सम्बन्धी समस्या--सरकार सम्बन्धी प्रश्न भी राजनीतिक चिन्तन का विशेष केन्द्र रहा है प्रौर भाज भी है सरकार राज्य के कार्यों की पूर्ति का यन्त्र है। यह वह मशीन 'है जो राज्य की इच्छा को कार्यान्वित करती है यह राज्य का क्रिप्रत्मक रूप है झौर उसकी आत्मा मानी ज। सकती है। ये प्रश्त विचारको के मन-मानस को सर्देव से मथते रहे हैं सरकार का संगठन बसा होना चाहिए ? सरकार के तीतो झग कार्यंप्रालिका, व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका में परस्पर कौन से सम्बन्ध वाँछनीय हैं ? सरकार की शक्ति का केन्द्रीकरण एक उपयुक्त स्थिति है भ्रयवा उसका विकेन्द्रीकरएा किया जाना लाभदायक होया ? ये सभी प्रश्त भ्राज पहले की ग्रपेक्षा प्रधिक महत्त्वपूर्ण बन गए हैं

(7) कानून के स्वरूप को समस्या--राज्य-व्यवस्था को संचालित करने के लिए कानून का निर्माण किया जाता है। कानून राज्य की ध्येय-पूर्ति भौर उसके कार्य पालन हेतु -एक झनिवाय संस्थान है कानून के सम्बन्ध मे उठने वाले विभिन्न प्रश्नों में विशेष ये हैं कि कानून का स्वभाव क्‍या है? कानून बनाने का अधिकार किसे होना चाहिए ? कानून शासक की इच्छा की प्रभिव्यक्ति है या जनता की सामान्य इच्छा को ? कानून का स्वतन्त्रता एवं व्यक्ति से क्‍या सम्बन्ध है? कानून को मांगरिको के भधिकारो एवं का व्यो के सन्दर्भ मे किस प्रकार मूल्याँकित,किया जाए ?

भारतीय विचारको ने कानून के मूल स्रोत धर्मशास्त्रों की व्यवस्था एवं रीति- रिवाजो को माता है रोमन विचारक भी रीति-रिवाज को कानून का प्रधान खोत सानते थे 3वो शताब्दी से वहाँ इस नवीन विचार का आरम्भ हुआ कि वाजून राजा द्वारा प्रजा के प्रतिनिधियो के साथ परामशे करके बनाई गई व्यवस्था है

6 पाश्चात्य राजनीतिक विचारों का इतिहास

वंमाव काल की राजनीतिक व्यवस्थाएँ कानून को राज्य की इच्छा की अभिव्यक्ति मानती हैं जिसका निर्माण सर्वसाधारण द्वारा निर्वाचित व्यवस्थापिका सभाग्रो द्वारा होना चाहिए भौर जिसमे सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप समयानुकुल सशोधन होने की गुजाइश आवश्यक है स्पप्ट है कि यह विचार आधुनिक लोकतन्व्ात्मक विकास का फल है।

(8) नागरिकता के प्रधिकार एवं कत्त ब्यो को समस्पा--कानून से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित विषय है 'नागरिकता के अधिकार एवं कत्त व्य,' नागरिक के प्रमुख अधिकार कौन-कौन से हैं ? नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के श्रेष्ठ साधन क्या होने चाहिए ? झादि महत्त्ववूर्स प्रश्न राजनीतिक चिन्तन की विशेष सामग्रियाँ हैं

(9) राज्य के विभिन्न प्रकारो की समस्था--राजनी तिक चिन्तन का एक पन्य प्रमुख अत राज्य के विभिन्न भ्रकारों का है। प्लेटो और अरस्तू के समय से ही पाश्चात्य विद्वान्‌ राजतन्त्र, लोक्तन्त्र ग्रादि शासन के विविध प्रकारों कौ विवेचमा 2032 ्‌ हैं। भारतीय ग्रन्यों मे भी विविध प्रकार की शासन-प्रणालियाँ का उल्लेख

मिलता है

सक्षेप मे, राजदीतिक चिन्तन की समस्याएँ वहुमुखी और अगरित है। एक प्रमुख समस्या के साथ भअ्रनेक प्रमुख उप-समस्याएँ और फिर उनकी भी उप-समस्याएँ जुडी हुई है। इसके अतिरिक्त रामस्याओ पर युग-विशेष के साथ चिन्तन का स्वरूप

गया है राजनीतिक परिस्थितियाँ और राजनीतिफ विचारक (एगा।स्बा टगावा।0०5 उत्ते एगापत्य वशछड) राजनीतिक चिन्तन के विकास पर सामाजिक वातावरण एवं राजनीतिक परिस्थितियों तथा अनुभवों का गहरा प्रभाव पडता है। राजनीतिक विचारक्ते

के निरीक्षण एवं अनुभव के ग्राधार पर भी गम्भीर तिकाले हैं। ये परिणाम परिवतंनशील परिस्थितियों से निरन्तर हप मे प्रभावित्त होते रहते हैं और साथ ही नवीन परिणामों को जन्म भी देते हैं। एचेन्स के लोक तन्त्र द्वारा सुक्रात को विषपान कि दण्ड दिए जाने की घटना ने प्लेटो को बड़ा मर्मान्तक झ्राघात पहुँचाया था इस| लए उसने अपने ग्रन्य “रि ब्लिक' पे तीन लोकतन्श्र की कठु भालोचना की गौर एवं ऐसी आदर्श जगर्यव्था अल्तत हो जिसमे गण एक सुनियोजिय एवं निश्चित ढंग से प्रशिक्षित दार्शनिकों का कुलीन वर्ग होगा इसी प्रवगर वालें-माक्स की विचारघारा के भनेक सिद्धान्त उसके अपने व्यक्तियत पेट भनुभवों से जन्मे हैं। उसने स्वय औद्योगिक युग के पूजीपतियो द्वारा जिधन श्रमिकों का भसाहनीय शोषण देखा था। यदि उसने यह सब कुछ देखा होता प्रषवा उसका उन्म थे शताब्दियों पूर्व हुमा होता तो भ्नवरत वर्ग-सघएँ के

राजनीतिक चिन्तन का स्वरूप और महत्त्व 7

विवादपूर्ण सिद्धान्त पर सम्भवतः वह नहीं पहुँच पाता ।॥ प्रतः यह कहना सर्वधा युक्तिमंगत है कि राजदर्शन की रूपरेखा हग्लरौर उसके विकास पर बाह्य जगत की गहुरो छाप पड़ती रही है गहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि यद्यपि सामान्यतः राजनीतिक विधारकों के विचार अपनी समक्यलीन सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों के कारण सीमाबद्ध रहे हैं, किन्तु कुछ विचारकों ने इन सीमाओं को तोडने का भी प्रशसनीय प्रयास किया है 4 उन्होंने कुछ ऐसे सिद्धान्तों एवं-विचारों का प्रतिपादन किया हैं जिनका महत्व एवं प्रभाव सार्वकालिक एवं सावंदेशिक है। गाँधी के सत्य एवं भ्रहिषा के सिद्धान्त इसी श्रेणी में ग्राते है दर राजनीतिक सिद्धान्त सर्देव परिस्थितियों की उपज ही नही होते अपितु ये नवीन राजनीतिक परिस्थितियों को भी जन्म देते है। रूसो ने फ्रांस की राज्य- कऋान्ति को उत्प्रे रित विया उसने अपनी पुस्तक “5000 (एणाएप्वश” मे सामाजिक संविदा-सिद्धास्ल के प्रतिपादन द्वारा फ्रॉय की राजयक्त, के विरुद्ध व्याप्त असन्तोष को वाणी दी जो क्रॉस को राज्य-क्रासिति मे विस्फोटित हुई इस विचार-वेविध्य का एक प्रमुख कारण परिस्थितियाँ तो है हो, जिन्‍तु एक अन्य प्रधात कारण भावात्मकता भी कहा जा सकता है| विचारको के बौद्धिक स्वर में विभिन्नता द्वोता एक स्वाभावियता है / परिस्यितियों वातावरण को समभतर सही परिणाम निकालने की क्षमता भो अलग-ग्रलग होती है| साथ ही व्यक्तिगत झूचि एव संस्कार भी एक से नही होने, श्रत वस्तु-परक अन्तर होते हुए भी जिचारकों में भाबात्मक अस्तर छी विद्यमानता एक सहज अनिवायता है परिणामस्वरूप एक ही वस्तु-स्थिति अलग-ग्रलग व्यक्तियों मे झलग-झलंग एवं परस्पर जिसेधी प्रविक्रियाग्रो के रूप मे प्रस्कूटित होती है उपयुक्त कारणों के फलस्वरूप राजदटीतिक चिन्तन कभी हिन्‍ही प्रश्नों के अन्तिम उत्तर प्रस्तुत नहीं कर सकता। राजनीतिक चिन्तन अपने श्राप में सर्देव सापेक्ष और अपूर्ण होता है। झ्ाज के समाधान श्रथवा निष्कर्ध कल बी नवीन परिस्थितियों में अपूर्ण एवं आन्त सिद्ध हो सकते हैं साथ ही समस्याग्रो के सापक्षित्र महत्त्व मे भी अ्रन्तर जाता है ऐसी अ्रवस्था मे यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि फिर राजनीतिक जिन्तन वे अध्ययन की उपयोगिता क्या है राजनीतिक चिन्तन के भ्रध्ययन को उपयोगिता और महत्त्व (एप 26 5छह॒फ्लीस्था7०४ जे एग0०॥ पश्रृ०ापड0) राजनीतिक चिन्तन के अध्ययन की उपयोगिता पर विचार करते समय सर्वप्रथम ऐसे विचारक सामने झाते हैं ज़ो इसे एकदम निरथंक, ग्रनावश्यक और हानिकारक मानते हैं | इस सम्बन्ध मे कुछ भमुख मत उल्लेखनीय माने जाते हैं-- (१) “राजनीतिक चिन्तन भगवान्‌ को अधित की हुई कुमारी के समांत बाँफ है ॥/? ++बेकन (84200)

*बु६इ 3 शाह्वाप >ै०55०टाडा८टत ॥40 009, श॑ ॥$ 987९0-"--82८97, (२००८6 ॥०व अब्जएथा, ०७ ला , 9. 3.

8 वाध्चात्य राज्मीतिक विचारों का इतिहास

(2) "वे देश सोभाग्यशाली हैं, जितके पास कोई राजनीतिक दर्शन नहीं है। राजद्शन या तो झभिनव कान्ति की सन्तान है या भावी क्रान्ति का चोतक ३”

+लेस्लो स्टोफेन (.,€ञञां€ 80शशा)

(3) "लोगों मे राजनीतिक सिद्धान्त बनाने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो तो यह कुशासित राज्य का एक निश्चित तक्षण् है " _-च् (809७)

(4) “राजनीतिक तत्त्वनचिन्तत करने वाले दाशंनिक उन व्यक्तियों के समान हैं जो पहले तो पैरो से धूल उडाते हैं झौर फिर यह शिकायत करते हैं कि उन्हे छुछ दिखाई नही देता ॥” -+उरफलो (805)

राजनीतिक विल्तन के भ्रध्ययन के ये प्रालोचक अपने पक्ष में झनेक युक्तियाँ देते हैं। इनवा बहना है कि यह दर्शन कोरा विचारात्मक और काल्पनिक है | यह बस्तु-स्थिति की उपेक्षा करता है इसके द्वारा जटिल प्रश्नों के कोई भन्तिम भौर पूर्ण उत्तर नही दिए जा सकते | समाज की परिस्थितियों में निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं और इस कारण इन पुराने राजनीतिक विचारों की उपयोगिता घटती रहती है झत. कोई भी दर्शन हमारा सही मार्गदर्शक नही हो सकता राजनीतिक चिन्दत की इस प्रकृति पर वार्कर ने इन शब्दों में व्यण किया है--“राजनीतिक विचार का प्रत्येक प्रोफेसर यह श्रनुभव करता है कि उसके अतिरिक्त भन्य सभी प्रोफेसर कुछ सन्देहभद बातों को स्वय-सिद्ध तथ्य मानकर उनके झ्राघार पर तर्क कर रहे हैं, उनके युक्तिक्रम की सत्यता रुन्देहप्रद है-भौर उनके द्वारा इनसे निकाले जाने वाले परिणाम निश्चित रूप से गलत हैं ।”

उपयुक्त तबों में सत्य का पर्याप्त अश विद्यमान होते हुए भो यह कहना सत्य से कतराना होगा कि राजनीतिक चिन्तन के भध्ययत की उपयोगिता भौर महत्त्व झाधुनिक युग मे घट रहा है। पक्ष के तकों को सक्षेपर में निम्नलिखित सकेतो में प्रव॒ट किया जा सकता है--

(3) राजनीतिक विचार मानव-इतिहास पर गहरा प्रभाव डालते हैं। ये व्यक्ति को सामाजिक क्रन्तियाँ करने की प्रेरणा देते हैं। 8वी शताब्दी की फ्रंच राज्य-क्रान्ति भौर 20वी सदी वी बोल्शेविक क्रान्ति इसके सुन्दर उदाहरण हैं। इस प्रकार की ज्ान्तियाँ मानव-समाज को झ्रागे बढाने वाली सिद्ध हुई हैं। इनसे प्राधुनिक जीवन में स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व को भावनाभो को बल मिला है

(॥) राजतातिक चिन्तन का भ्रध्ययन करते समय राज्य एव सरकार पर “चार वमण किया जाता है राजकीय नियमे। द्वारा आज प्रधिकांश कार्य निमन्त्रित होते हैं। समाज मे भनुशासन प्रौर व्यवस्था वनाएं रखने का सर्वोत्तम यन्त्र भाज सरकार है जो राज्य वा एक झनिवायें भंग है

(7) इस दर्शन के चिन्तन से हमे भूतकालीन बौद्धिक वातावरण का ज्ञान होता है भतीत वी राजनीतिक घटनाप्नो भोर प्रान्दोलनो के कारणो तथा परिणामों का पता लगता है भौर हम उत विचारों को जान पाते हैं जिनसे इन घटनाप्ों को

राजनीतिक चिन्तन का स्वरूप और महत्त्व 9

प्रेरणा मिली थी इन विचारों को समझे बिता इतिहास का वास्तविक ज्ञान ब्राप्त नही हो सकता और अतीत की घटनाओं और ग्यान्दोलनो की सही व्याल्या भी सम्भव नही बनती इतिहास को पूर्ण रूप से देवते समय राजनीतिक बिन्तन के इतिहास की उपेक्षा करता एक भझात्मविरोधी कार्य होगा

(५) राजनीतिक चिन्तन के झ्नध्ययन द्वारा देनिक व्यवहार मे प्रयुक्त होते बाली राजनीतिक परिमावाओ्रो का ज्ञान मिलता है। साथ ही राजनीतिक शब्दों के यथार्थ स्वरूप का भो बोघ होता है। हम लोकतन्त्र, साम्यवाद, राष्ट्रीयता, संप्रभुता झादि शब्दों के सही झर्यों को जान पाते हैं। हमे पता लगता है कि इन विभिन्न परिभाषाम्रो एवं प्रवधारणाग्रो के पीछे कोन-कौनसी भावनाएँ रही हैं और इनमे कब, कंसे एवं किन अर्यों मे कितने यरिवर्तत होते रहे हैं तथा बतंमान काल मे इसका बया प्रर्थ लिया जा सकता है।

(५) राजनीतिक परिमापाझों और शब्दो के ययाथ्थंस्वरूप को जानने का एक झौर भी बड़ा लाभ है इनके द्वारा राजनीतिक क्षेत्र मे हमारा ज्ञान परिपक्व

होता है जनतन्त्र के युग मे यह ज्ञान राजनीतिक वक्ताओ्रो के भ्रामक प्रचार से नागरिको की रक्षा करता है

(शं) राजदशंन के भध्ययन में हम प्राचीन राजनीतिक दाशेंनिकों की विचारधाराशो को जानने का प्रयास करते हैं। इनको जानकर चाहे हम अधिक विद्वान, कुशल भौर दूरदर्शी बन सवेरे, किन्तु इसमे कोई सन्देह नहीं कि ये हमे अनेक गलतियों से बचाने मे सहायक प्रवश्य सिद्ध होती हैं। राजवीतिक विन्धन के इतिहास का यह ज्ञान हमे सचेत करता रहता है और नए ढंग से समस्याग्रो को देखने, समभने एवं सुलभाने की प्रेरणा देता है।

(भां)) इस दर्शन के अध्ययन से वर्तमान इतिहास न्‍की घटनाओशों और - सर्मस्याग्रों के समझने मे भी पर्याप्त सहायतज्ञा मिलती है वर्तेमान समस्याएँ भ्रतीत