आचार्य रजनीश .

ओतीलाल वनारसीदास दिल्ली :: वाराणसी :; पढना

मोतीलाल बनारसीदास गो रोड, जवाहर बाहर नगर, दिल्‍ली-७ चौक, वाराणसी (उ० प्र०)

अद्योक राजपब, पदना (विहार)

प्रधान कार्यलिय : वंयल घाखाएं : ह््प

हा

संझोधित एवं परिवर्द्धित संस्करण, १९७१

*

सचदरलाल जैन, मोत्तीसाल बनारसी दास |

सुच्दरलाल ऊन, मातावचाल बनाससादास, बंगला राठ,

जवाहर नगर. इदिल्ली-७ द्वादा प्रकाशित तथर वित्त पल डिय पटना कार अधि

विष्णु पंत्राइय, पटना-४ द्वारा मुद्रित

जल

आचार्य श्री रजनीश तर्त्बाचितक हैं आध्यात्मिक अनुभूति संपन्‍न हैं

वर्तमान युगद्रप्टा हैं

नए ढंग की विचार-दृष्टि प्रस्तुत करते है धर्म का नया मूल्यांकन बताते हें

आप उनके विचारों को अवदय सुरतें

शिक्षण के संबंध में उनके क्रांतिकारक विचार मननीय हूँ

आजार्य रजनोश : एक परिचय

आचार्य रकनील अर्तेमान ग्रग के युवा-द्रष्श, करतिकारी विश्ार्, आपुनिक संत, रहत्यदर्णी ऋषि क्षीर जीवन-सर्जक हैं

ब्रैस तो धर्म, अब्यात्म और साधना में ही इनकी जीवन-वाह है; लिकिन अत्ा, साहित्य, दर्शन, राजनीति, समाजभारत्र आध््निक विजान आदि में भी

जो भी थे बोलते हैं, करते हैं, वह सब जीवन की आत्यंतिक गहराहया कर गता है। थे हमेशा जीवन-समस्याओं की गहनतम जड़ों को स्पर्य करते हैं। जीवन को उसकी समग्रता में जीनत जीने और प्रध्ोग करने के ये जोवन्त प्रतीक हैं

जीवन की चरम अंबाहयों में जो फूछ खिलने सभच हू उन सबका दर्शन इसके व्यक्षितत्व भें संभव है

११ दिसम्बर, १९६१ की सब्यप्रदेश के एक छोटे-से गाँव में इनका जम हुआ | दिन-द्रगती और रात-बौगती इतकीं प्रतिभा विकसित होती रही सन ११५४ में इन्होंने सागर-विश्वविद्यालय स्त ठईनि: शास्त्र में एम० ए० का उपाधि प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ अ्रप्त की। थे अपने पूरे विद्यार्थी- जीवन में बड़ें ऋंतिकारी और बह्वितीय जिन्नास तया प्रतिभाग्याली छात्र रहें बाद में रायपुर और जबलपुर के दो महाविद्यालयों में मश्ः एक और का ६६ के लिए आचार्य (प्रोफेसर) के पद पर मिक्षण-कार्य करते सह। बीच इनका

पूरे देश में घूम-घुमकर, प्रवचन देने और साधना-शिविर आयोजित करने का कार्य भी चलता रहा

बाद में अपना पूरा समय प्रायोगिक साधना के द्विस्तार और धर्म के एुनद- त्वान में लगाने के उद्देघ्य से थे सन्‌ १९६६ में तौकरी छ&र्द है: आचायपद मुक्त हार इनके, प्रवचनों थौर साधना-दिविरो से मे रणा पाकर बनेक प्रमुख शहरों में उत्साही प्रेमियों ते जीवन-जागृति-वेंख के चीड से एक मित्रो $ साधकों का मिलन-सथल (संस्थान) रवापित बिया है। वे आवायल्री के अदेदत

(ख) जौर शिविर आयोजित करते हैं तथा पुस्तकों के प्रकाशन की व्यवस्था करते हैं जीवन-जायृति आन्दोलन का प्रमुख कार्यालय वम्बई में लगभग आठ वर्षो से कार्य कर रहा है अब तो आचार्यश्री भी अपने जबलपुर के निवास-स्थान के छोड़ कर जुलाई, १९७० से स्थायी रूप से बम्बई में गए हैं, ताकि जीवन- जागृति आन्दोलन के अन्तर्राप्ट्रीय रूप को सहयोग मिल सके

॥१

पु जीव: ट्रक

जीवन-जागृति आन्दोलन की ओर से एक मासिक “पत्रिका “युक्रान्दोँ (युवक क्रांति दल का मुख-पत्र) पिछले दो वर्षो से तथा एक त्रैमासिक पत्रिका “ज्योतिबिखा” पिछले पाँच वर्षो से प्रकाशित हो रही है। आचायंश्री के प्रवचनों के संकलन ही पुत््तकाकार में प्रकाशित कर दिए जाते हैं। अब तक

लगभग २६ बड़ी पुस्तकें तथा २१ छोटी पुस्तिकाएँ मूल हिन्दी में प्रकाशित हुई हैं। अधिकतर पुस्तकों के गुजराती, अँग्रेजी ओर मराठी अनुवाद भी प्रकाशित हुए हैं। १३ नई अप्रकाशित पुस्तकें प्रेस के लिए तैयार पड़ी हैं। अब तक

बाचार्यश्री प्रवचनमालाओं में तथा साधना-शिविरों में लगभग २००० घंटे . जीवन, जगत और साधना के सूक्ष्ततम तथा गहनतम विपयों पर सविस्तार चर्चाएं कर चुके है

अब भारत के बाहर भी अनेक देशों में इनकी पुस्तकें लोगों की प्रेरणा और आकर्षण का केनद्र बनती जा रही हैं। हजारों की संझया में देशी तथा विदेशी साधक इनसे विविव गढ़तम सावना-पद्ध तियों एवं प्रक्रियाओं के सम्बन्ध में प्ररणा पा रहे है योग और जव्यात्म के संदेश एवं प्रश्ोगपात्मक जीवन-कान्ति के प्रसार-हेतु विभिन्‍न देशों से इनके लिए आमंत्रण आने शृरू हो गए है शीत्र ही भारत ही नहीं बरन्‌ अनेक वादचात्य देशवासी भी इनके व्यक्तित्त से प्रेरणा और सुजन की दिशा पा सकेंगे

२५ सित्तम्वर, १९३० को मनाली में आयोजित एक दस दिवसीय साधना- शिविर में आचायंली के फीवन का नया आयाम सामने आया इन्होंने

नह छः

कहा कि संस्यार जीवन की सर्वोच्च समुद्धि है, अतः उसे पूर्णता में सुरक्षित रुगया जाना चाहिए उन्हें वर्हा प्रेरणा हुई कि थे संस्यास-जीवन को एक नबा मोट देने में सहयोगी हो सकेंगे और नाचते हुए, गीत गाते हुए, आनंदमग्न, समस्त जोवन को आालिगन करने वाले, सशस्त्र और स्वावलम्धी संन्यासियों के साक्षी घन सकेंगे शिविर में तथा उच्तके बाद भी अनेक व्यक्तियों ने सीदे परमात्मा से संन्यास की दीक्षा ली आाचायंली इस घटना के साक्षी रहे।

(ग)

इस “नव संन्यास अन्तर्राष्ट्रीय-संस्था (]१९०-$कगराए३४ पालिावराणाव) अब तक ४३२ व्यक्तियों ने संन्यात-जीवन में प्रवेश किया है। कुछ ही वर्षो में इनकी संध्या हजारों की होने वाली है ये संनन्‍्यासी-जीवन की पूर्ण सघनता और व्यवहार में सक्रिय ,भाग लेने के साथ ही साथ विशिष्ट साधना-पद्धतियों में रत हैं। इस दिल्ञा में संन्यासियों का एक कम्यन “विश्वनीड” के नाम से पोस्ट आजोल, तालुका-वीजापुर, जिला-महेसाणा (गुजरात) में कार्यरत हो चुका है। ये संन्‍्यासी आचारय॑श्री रजनीश की नई जीवन-दृष्टि, जीवन-सजन जीवम-शिक्षा एवं प्रायोगिक धर्म-साधना के बहु-आयामों में निपुण एवं सक्षम होकर भारत तथा विद्वव के कोने-कोने में धर्म और संस्कृति के पुनरत्वान तथा “धर्म-चक्र-प्रवर्तन”' हेतु बाहर निकल रहे हें

आचार्यश्री का व्यक्तित्व अथाहु सागर-जंसा है। इनके सम्बन्ध में संकेत- सात्र हो सकते हें। जो व्यक्ति परम आनंन्‍्द, परम शांति, परम मुक्ति, परम निर्वाण को उपलब्ध होता है उसके श्वास-इवास से, रोएँ-रोएँ से, प्राणों के कण-कण से एक संगीत, एक गीत, एक नृत्य, एक आह्वाद, एक सुगंध, एक आलोक, एक अमृत की प्रतिपल वर्षा होती रहती है और समस्त अस्तित्व उससे नहा उठता है इस संगीत, इस गीत, इस नृत्य को कोई प्रेम कहता कोई आनंद कहता है और कोई मुक्ति कहता है। लेकिन ये सब एक ही सत्य को दिए गए अलग-अलग नाम हैं

एसे ही व्यक्ति हे--आचार्य रजनीश, जो मिट गए हैं, शून्य हो गए हैं, जो आस्तित्व और अनस्तित्व के साथ एक हो गए हैँ, जिनका इ्वास- श्वास अंतरिक्ष का दवास हो गया है, जिनके हृदय की धड़कनें चाँद-तारों की धड़कनों के साथ एक हो गई हैं, जिनकी आंखों में सूरज-चाँद-सितारों को रोशनी देखी जा सकती है, जिनकी मुस्कराहटों में समस्त पृथ्वी के फूलों की सुगंध पाई जा सकती है, जिनकी वाणी में पक्षियों के प्रातः गीतों की निर्दोपता और ताजगी है और जिनका सारा व्यक्तित्व ही एक कविता, एक नृत्य और एक उत्सव हो गया है।

इस नृत्यमय, संगीतमय, सुगंधमय, आलोकमय व्यक्तित्व से प्रतिपल'

निकलनेवाली प्रेम की, करुणा और लहरों के साथ जब लोगों की जिज्ञासा' और मुमुक्षा का संयोग होता है तब प्रवचनों के रूप में ज्ञान-गंगा वह: उठती है।

(घर. )

इनके प्रवचनों में जीवन के, जगत के, साधना के, उपासना के विविध रूपों और रंगों का स्पर्श है इनमें पाताल की गहराइयाँ हैं और विराट अंतरिक्ष की ऊंचाइयां हैं। देश और काल की सीमाओं के अतिक्रमण के बाद जो महाशून्य और निः:शब्द की अनुभूति शेप रह जाती है उसे शब्दों में, इशारों में, मुद्राओं 'में व्यक्त करने का सफल प्रयास इनके प्रवचनों में रहता है

इनके प्रवचन सूत्रवत्‌ हैं, सीधे हैं, हृदय-स्पर्शी हैं, मीठे हैं, तीखे हैं और साथ ही पूरे व्यक्तित्व को झकज्ोरने और जगानेवाले भी हैं। इनके प्रवचनों आर ध्यान के प्रयोगों से व्यक्ति की निद्रा, प्रमाद और मूर्च्छा ट्ढती है और वह अन्त: तथा बाह्य रूपान्तरण, जागरण और क्रांति में संलग्न हो जाता है

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अन्तर्व॑स्तु

मैं कौन हें ? धर्म क्‍या है ?

विज्ञान की अग्नि में धर्म विद्वास

मनुष्य का विज्ञान

विचार के जन्म के लिए विचारों से मुक्ति जीयें और जानें

शिक्षा का लक्ष्य जीवन-संपदा का अधिकार समाधि योग

जीवन की क्षदृध्य जड़ें वहिसा क्‍या है ?

आनन्द की दिया

माँगो और मिलेगा

प्रेम ही प्रभ है

नीति, भय और प्रेम बहिसा का अर्थ

मैं मृत्यु सिखाता हूँ

५१ 2

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में कोन हूँ !

एक रात्रि की बात है। पृणिमा थी, मैं नदी तट पर था, अकेला आकाश को, देखता था। दुरदूर तक सच्चादा था। | फिर किद्ती के पैरों की आहट पीछे सुनाई पड़ी लौटकर देखा, एक युवा साधु खड़े थे। उनसे बैठने को कहा | बैठे तो देखा कि वे रो रहे हैं। आँखों से क्र-झर भँयू गिर रहे हैं। उत्हें मैंने निकट से लिया। थोड़ी देर तक उनके कर्धे पर हाथ रखे में मौन बठा रहा। ने कुछ कहने को था, कहने की स्थिति ही थी, किन्तु प्रेम से भरे मौन ने उन्हें भाश्वस्त किया ऐसे कितदा समय वीता कुछ याद नहीं। फिर बन्ततः उन्होंने कहा: “में ईश्वर के दर्शव करता चाहता हूँ कहिए क्या ईश्वर है था कि मैं मगतृष्णा में पढ़ा हूँ ?” में क्या कहता ? उन्हें भौर निकट ले लिया। प्रेम के अतिरिक्त तो किसी और परमात्मा को मैं जानता नहीं हूँ प्रेम को खोजकर जो परमात्मा को खोजता है, वहू भ्रूल में ही पड़ जाता है। प्रेम के मन्दिर को छोड़कर जो किसी और मन्दिर की खोज में जाता है, वह परमात्मा से और दूर ही निकल जाता है। किन्तु, यह सब तो मेरे मत में था वैसे मुझे चूप देखकर उन्होंने फिर कहा : “कहिए--हुछ तो कहिए मैं बड़ी आश्या से आपके पास आया हूँ। क्या आप मुझे ईश्वर के दर्शन नहीं करा सकते १” फिर भी मैं क्या कहता ? उन्हें और निकट लेकर उनकी आँथसुओं से भरी आँखें चूम लीं। उन आँसुओं में बड़ी आकांक्षा थी, बड़ी अभीष्सा थी। निश्चय ही वे आँखें परमात्मा के दर्शन के लिए बड़ी आाकुल थीं। लेकिन, परमात्मा क्या बाहर है कि उसके दर्शव किए जा सके ? परमात्मा इतता भी तो पराया नहीं है कि उसे देखा जा सके ! अन्ततः मैंने उनसे कहा : “जो तुम मुझसे पृदधते हो, वही विसी ने श्री रमण से पुछ्धा था। श्री रमण से कहा था : “ईइवर के दर्शन ? नहीं, नहीं, दर्शन पहीं हो सकते लेकिन चाहों तो स्वयं ईप्वर अवश्य

झाग्य # खोज स्वयं से ४. कहीं भी री आओ - भाग्य हैं। क्योंकि जो खोज स्वयं से पलायन है, वह कहीं भी नहीं लेर जा सकती है |

और दो ही विकल्प हैं: स्वयं से भागो या स्वयं में जागों भागने के

लिए बाहर लक्ष्य चाहिए और जागने के लिए बाहर के सभी लक्ष्यों की

|

०8 ईटवर न्स्द्र्ल अल्ट्रा 28% तब ड्स््ट् अल्टल वतन “4 संसार 3 >> २. ईदवर जब तक बाहर है, तव तक वह भी संसार हैं, वह भी माया है, वह [. ी-

मूर्छा है। उसका आविप्कार भी मनुप्य ने स्वयं से बचने और भागते के

मित्र, इसलिए पहली वात तो मुझे यही कहना हू क्रि ईदवर, सत्य, निर्वाण, मोक्ष----बह सब खोजें। खोजें उसे जो सब खोज रहा हैं। उसकी वर की, सत्य की और निर्वाण की खोज सिद्ध होती है।

आत्मानुसंधान के अतिरिक्त और कोई खोज धामिक खोज नहीं है

लेकिन, आत्म पान, आत्म दर्शन, आदि शब्द बढ़े श्रामक हैं। क्योंकि स्वर्थं का जान कस हो सकता है ? ज्ञान के लिए द्वेत चाहिए चाहिए।

रु

जहाँ दो नहीं हैं, वहाँ ज्ञान कैसे होगा ? दर्शन कैसे होगा ? साक्षात्‌ कैसे

खोज ही अत्ततः

हि

होगा ? वस्तुतः ज्ञान, दर्णनादि सभी झब्द द्वत के जगत्‌ के हैं। और जहाँ अद्वैत है, जहाँ एक ही है, वहाँ वे एकदम अर्थहीन हो जाते हों तो कोई आइ्चर्य नहीं मेरे देखे, “आत्मदर्शन” असम्मावना है| वह घब्द ही बसंगत है।

मैं भी कहता हूँ : स्वयं को जानो सुकरात ने यही कहा है। बुद्ध और

महावीर ने भी बही | ऋराइस्ट और कृष्ण ने भी यही फिर भी स्मरण रहे कि जो जाना जा सकता है, वह स्व कंसे होगा ? वह तो पर ही हो सकता है। जानना तो पर का ही हो सकता है। स्व तो बह है जो जानता है। स्च' अनिवार्य रूप से ज्ञाता हैं। उसे किसी भी उपाय सेजेय नहीं बताया जा सकता लो फिर उसका ज्ञान कैसे होगा ? ज्ञान तो ने का होता है। ज्ञाता का ज्ञान

कैसे होगा ? जहाँ जान है, वहाँ कोई ज्ञाता है, कुछ भय है वहाँ कुछ जाना.

जाता है और कोई जानता है। अब ज्ञाता को ही जानने की नेप्टा क्या आँख

0, 2 हु

को उसी भाँख से देखने के प्रयास की भाँति नहीं है ? क्या ढुत्तों को स्वयं अपनी ही पूंछ को पकड़ने की असफल चेप्टा करते आपने कभी देखा है? वे

जितनी तीब्रता में झपदते हैं, पूंछ उतनी ही झीघत्रता से हट जाती है। इस प्रयास में वे पागल भी हो जायें तो भी वया उन्हें पूंछ की प्राप्ति हो सकती है ? किस्नु

है

उनसे कहा : “रिक्त रथ्ान आपके घर में पर्याप्त है। वह यहीं है, और कहीं गया नहीं, केवल सामान से आपने उसे ढाँक लिया है। कृपाकर सामान बाहर करें तो आप पायेंगे कि वह भीतर गया है। वह तो भीतर ही है। सामान के टर से दृुवक गया है। सामान हटा वें और वह अभी और यहीं है ।” आत्म-नान की विधि भी यही है मैं तो निरंतर हैं। सोते-जागते, उठते-बैठते, सुख में दुख में--मे तो हूँ ही। न्लान हो, अमान हो, में तो हूँ ही। मेरा यह होना असंदिग्ध है। सब पर संदेह किया जा सके, लेकिन स्वयं पर तो संदेह नहीं किया जा सकता है। जैसा कि देकात॑ ने कहा है : “संदेह भी करूँ तो भी में हूँ, क्योंकि संदेह भी बिना उसके कौन करेगा ?” लेकिन, यह “में कौन हें ?” यह “मे! क्या है ? कैसे इसे जातूँ ? हें सो तो ठीक, लेकिन, क्या हूँ ? कौन हूँ ? में है, यह असंदिग्ध है और क्या यह भी असंदिग्ध नहीं है कि मैं जानता हँ-पम्श्नमें ज्ञान है, चेतना है, दर्शन है ? यह हो सकता है कि जो जानूँ, वह सत्य हो, असत्य हो, स्वप्न हो, लेकिन मेरा जानता--जानने की क्षमता--तो सत्य है इन दो तथ्यों को देखें, विचार करें। मेरा होना--मेरा अस्तित्व और मेरी जानने की क्षमता--मुझमें जान का होना, इन दोनों के आधार पर ही मार्ग खोजा जा सकता है मैं हैँ, लेकिन ज्ञात नही कीन हैं ? अब क्या करें ? ज्ञान जो क्रि क्षमता है, ज्ञान जो कि थक्ति है, उसमें झँकूँ और खोजूं। इमके अतिरिक्त और कोई विकल्प ही कहाँ है ? ज्ञान की थक्ति है, लेक्नि वह जय से--विपयों से--छेकी है। एक विपय हटता है, तो दूसरा जाता है। एक विचार जाता है तो दूसरे का आगमन हो जाता है। ज्ञान एक विपय से मुक्त होता है तो दूसरे से बंध जाता है, लिकिन रिक्त नहीं हो पाता | यदि ज्ञान विपय-रिक्‍त दो तो क्या हो ? कया उस अंतराल में, उस सितता में, उस बून्यता में ज्ञान स्वयं में ही होने के कारण रबय॑ की सत्ता का उद्घाटक नहीं बन जायगा ? क्‍या जब जानने को कोर्ट बिपय नहीं होगा तो ज्ञान स्वयं को ही नहीं जानेगा ? ज्ञान जहाँ विपय-रिकत है, वही बह स्वप्रतिष्ठ होता है।

है

-“ ज्ञान जहाँ ज्ञेय से मुक्त है, वहीं वह शुद्ध है। और वह शुद्धता--शयून्यतः '--ही आत्मज्ञान है | चेतना जहाँ निविषय है, निविचार है, निविकल्प है, वहीं जो अनुभूति है, वही स्वयं का साक्षात्कार है किन्तु, यहाँ इस साक्षात्कार में तो कोई ज्ञाता है, ज्ञय है। यह अनुभूति अभूतपूर्व है। उसके लिए शब्द असंभव है लाओ से ने कहा है : "सत्य के संबंध में जो भी कहो, वह कहने से ही असत्य हो जाता है।” फिर भी सत्य के संबंध में जितना कहा गया है, उतना किस संबंध में कहा गया है ? अनिवंचनीय उसे कहें, तो भी कुछ कहते हो हैं ? उसके संबंध में मौत रहें तो भी कुछ कहते ही हैं ? ज्ञान है शब्दातीत किन्तु प्रेम उसके आनन्द की, उसके आलोक की, उसकी मुक्ति की खबर देना चाहता है, फिर चाहे वे इंगित कितने ही अधूरे हों और कितने ही असफल वे इशारे हों गूंगा भी गुड़ के संबंध में कुछ कहता है? वह चाहे कुछ भी कह पाता हो लेकिन कहना चाहता है, यह तो ' कह ही देता है किस्तु, सत्य के संबंध में किए गए अधूरे इंगितों को पकड़ लेने से बड़ी ' भ्रांति हो जाती है आत्मज्ञान की खोज में जो व्यक्ति आत्मा को एक ज्ञेय पदार्थ की भाँति खोजने निकल पड़ता है, वह प्रथम चरण में ही गलत दिशा में चल पड़ता है। आत्मा ज्ञेय नहीं है और ही उसे किसी आकांक्षा का लक्ष्य ही बताया जा सकता है, क्योंकि वह विषय भी नहीं है वस्तुतः उसे खोजा भी नहीं जा सकता क्योंकि वहु खोजनेवाला का ही स्वरूप है। उस खोज में खोज और खोजी भिन्‍न नहीं है इसलिए आत्मा ' को केवल वे ही खोज पाते हैं, जो सब खोज छोड़ देते हैं और वे ही जाव पाते हैं जो सब जानने से शून्य हो जाते हैं खोज को---सब भाँति की खोज को---छोड़ते ही चेतना वहाँ पहुंच जाती है, जहाँ वह सदा से ही है दौड़ को--सब भाँति की दोड़ को--छोड़ते ही चेतना चहीं पहुँच जाती है, जहाँ वह सर्देव से ही खड़ी हुई है समाधि के बाद तथागत बुद्ध से किसी ने पूछा : “समाधि से आपको क्‍या

१७०

मिला ?” तो बुद्ध ने कहा था : “कुछ भी नहीं खोया बहुत कुछ, पाया कुछ भी नहीं। वासना खोई, विचार खोए, सब भाँति की दौड़ और तृष्णा खोई भौर पाया वह जो सदा से ही पाया हुआ है ।”

मैं जिसे नहीं खो सकता हूँ, वही तो है स्वरूप

मैं जिसे नहीं खो सकता हूँ, वही तो है परमात्मा

और सत्य क्या है ? जो सदा है, सनातन है, वही तो है सत्य इस सत्य को, इस स्वरूप को पाने के लिए चेतना से उस सवको खोना आवश्यक है जो कि सत्य नहीं है। जिसे खोया जा सकता है, उस सबको खोकर ही वह जान लिया जाता है, जो सत्य है स्वप्न खोते ही सत्य उपलब्ध है

मित्र, में पुनः दोहराता हूँ : स्वप्न खोते ही सत्य उपलब्ध है स्वप्न जहाँ नहीं हैं, तव जो शेप है, वही है स्व-सत्ता, वही है सत्य, वही है स्वतंत्रता

धर्म जप में क्या है !

मैं धर्म पर क्या कहूँ ? जो कहा जा सकता है, वह धर्म नहीं होगा जो विचार के परे है, वह वाणी के अन्तर्गत नहीं हो सकता है। शास्त्रों में जो हैं, वह धर्म नहीं है। शब्द ही वहाँ हैं शब्द सत्य की ओर जाने के भले ही संकेत हों, पर वे सत्य नहीं हैं शब्दों से संप्रदाय बनते हैं, और धरम दूर ही रह जाता है। इन शब्दों ने ही मनुष्य को तोड़ दिया है मनुष्यों के बीच पत्थरों की नहीं, शब्दों की ही दीवारे हैं

मनुष्य और मनुष्य के बीच शब्द की दीवारें हैं। मनुष्य और सत्य के बीच भी शब्द की ही दीवार है असल में जो सत्य से दूर किए हुए है, वही उसे सबसे दूर किए हुए है शब्दों का एक मंत्र घेरा है और हम सब उसमें सम्मोहित हैं। शब्द हमारी निद्रा है, और शब्द के सम्मोहक्क अनुसरण में हम अपने आपसे बहुत दूर निकल गए हैं

स्वयं से जो दूर और स्वयं से जो अपरिचित है वह सत्य से निकट और सत्य से परिचित नहीं हो सकता है। यह इसलिए कि स्वयं का सत्य ही सबसे निकट का सत्य है। शेष सब दूर है। बस स्वयं ही दूर नहीं है

शब्द स्वयं को नहीं जानने देते हैं। उनकी तरंगों में वह सागर छिप ही जाता है। शब्दों का कोलाहल उस संगीत को अपने तक नहीं पहुँचने देता जो कि मैं हें। शब्द का धुआँ सत्य की अग्नि प्रकट नहीं होने देता है, और हम अपने वस्त्रों को ही जानते-जानते मिट जाते हैं और उसे नहीं मिल पाते जिसके वस्त्र थे, और जो बस्त्रों में था, लेकिन केवल वस्त्र ही नहीं था

मैं भीतर देखता हूँ | वहाँ शब्द ही शब्द दिखाई देते हैं विचार, स्मृतियाँ, कल्पनाए” और स्वप्न, ये सब शब्द ही हैं, और मैं शब्द के पत॑-पतं घरों में बेंधा हूँ क्या मैं इन विचारों पर ही समाप्त हूँ, याकि इनसे भिन्‍न और अतीत भी मुझमें कुछ है ? इस प्रइन के उत्तर पर ही सब कुछ निर्भर है। उत्तर विचार से आया तो मनुष्य धर्म तक नहीं पहुँच पाता, क्योंकि विचार, विचार से अतीत को नहीं जान सकता विचार की सीमा विचार है उसके पार की गंध भी उसे नहीं मिल सकती है

साधारणतः लोग विचार से ही वापिस लौट आते हैं। वह अदृश्य

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दीवार उन्हें वापिस कर देती है। जैसे कोई कुआँ खोदने जाय और कंकड़- पत्थर को पाकर निराश हो रुक जाय, वैसा ही स्वयं की खुदाई में भी हो जाता है। बाब्दों के कंकड़-पत्थर ही पहले मिलते हैं और यह स्वाभाविक ही है। वे ही हमारी बाहरी पर्त हैं। जीवन-यात्रा में उवकी ही धूल हमारा आवरण बन गई है |

आत्मा को पाने को सव आवरण चीर देने जरूरी हैं। बस्त्रों के पार जो नग्न सत्य है, उस पर ही रुकना है। शब्द को उस समय तक खोदे चलना है, जब तक की निःथव्द का जलम्रोत उपलब्ध नहीं हो जाय विचार की धूल को हटाना है, जब तक कि मौन का दर्पण हाथ था जाय यह खुदाई कठिन है यह बस्त्रों को उतारना ही नहीं है, अपनी चमड़ी को उतारना है यही तप है

प्याज को छीलते हुए देखा है ? ऐसा ही अपने को छीलना है। प्याज में नो अन्त में कुछ भी नहीं बचता है, अपने में सब कुछ बच रहता है। सब छीलने पर जो बच रहता है, वही वास्तविक है। वही मेरी प्रामाणिक सत्ता है बही मेरी आत्मा है

एक-एक विचार को उठाकर दूर रखते जाना है, और जानना है कि यह मैं नहीं हट

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, और इस भाँति गहरे प्रवेण करना है। थुभ या अशुभ को नहीं चुनना वसा चुनाव वैचारिक ही है, ओर विचार के पार नहीं ले जाता यहीं नीति और धर्म अलग रास्तों के लिए हो जाते हैं। नीति अथ्ुभ विचारों के विरोध में घुभ विचारों का चुनाव है | धर्म चुनाव नहीं है बहु तो उसे जानना है, जो सब चुनाव करता है, और सब चुनावों के पीछे है। यह जानना भी हो सकता हैं, जब चुनाव का सब चुनाव सून्य हो और केवल वही भेष रह जाय जो हमारा चनाव नहीं है वरन हम स्वत्रयं हैं विचार के तटस्थ, चुनावयून्य निरीक्षण से विचार-बून्यता आती है। विचार तो नहीं रह जाते, केवल विवेक रह जाता है। बिपय-वस्तु तो नहीं होती, केवल चैतन्य मात्र रह जाता है। इसी क्षण में प्रमुप्त प्रजा का विस्फोट होता है, और धर्म के द्वार सुल जाते हैं इसी उद्घाटन के लिए मैं सबको आमंत्रित करता हें भास्त्र जो तुम्हें नहीं दे सकते, वह स्वयं तुम्दी में है, ओर तुम्हें जो कोई भरी नहीं दे सकता, उसे तुम अभी और दसी क्षण पा सकते हो। कैवल शब्द को छोटते ही सत्य उपलब्ध होता है

विज्ञान की अग्नि में धर्म और विश्वास

मैं स्मरण करता हैं मनुष्य के इतिहास की सबसे पहली घटना को कहा जाता है कि जब आादम ओर ईव स्वर्ग के राज्य से बाहर निकाले गए तो आादम ने द्वार से निकलते हुए जो सवसे पहले शब्द ईव से कहे थे, वे थे : “हम

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एक बहुत बड़ी क्रांति से गुजर रहे हैं ।” पता नहीं पहले आदमी ने कमी बह कहा था या नहीं, लेकिन भी कहा हो तो भी उसके मन में तो थे भाव रहें ही होंगे। एक बिलकुल ही अज्ञात जगत्‌ में वह प्रवेश कर रहा था। जो परिचित था वह छूट रहा था, और जो विलकुल ही परिचित नहीं था, उस अनजाने और अजनवी जगत्‌ में उसे जाना पड़ रहा था। अजात सागर में नौका खोलते समय ऐसा लगना स्वाभाविक ही है ये भाव प्रत्येक युग में आदमी को अनुभव होते रहे है, क्योंकि जीवन का विकास तो निरंतर अज्ञात से ज्ञात में द्ठी है जो ज्ञात हो जाता है उसे छोड़ना पड़ता है, ताकि जो अज्ञात है वहू भी ज्ञात हो सके। ज्ञात की ज्योति, ज्ञात से अज्ञात में चरण रखने के साहस से ही प्रज्वलित और परिवर्तित होती है जो नात पर रुक जाता है, वह अजात पर ही रुक जाता है। ज्ञात पर ढक जाना ज्ञान की दिशा नहीं हैं जब तक मनुप्य पूर्ण नहीं हो जाता है तब तक निरंतर ही पुराने और परिचित को विदा देती होगी और नए तथा अपरिचित का स्वागत करना होगा नए सूर्य के उदय के लिए रोज ही परिचित पुराने सूर्य को विदा दे देनी होती है। फिर संक्रमण की वेला में रात्रि के अंधकार से भी ग्रुजरना होता है विकास की यह प्रक्रिया निन्‍चय ही चहुत कप्टप्रद है। लेकिन बिना प्रसव-पीड़ा के कोई जन्म भी तो नहीं होता है। हम भी इस प्रसवन्यीड़ा से गुजर रहे हैं। हम भी एक अभूतपूर्व क्रांति से गुजर रहे हैं। आायद मानवीय चेतना में इतनी आमूल क्रांति का कोई समय भी नहीं बाबा था। थोडे-बहुत वर्षो में तो परिवर्तन सदैव होता रहता है, क्योंकि परिवर्तन के अमाव में कोई जीवन ही नहीं है। लेकित परिवर्तत की

णह

सतत प्रक्रिया कभी-कभी वाष्पीकरण के उत्ताप-विन्दु पर भी पहुँच जाती है औरः तब आमूल क्रांति घटित हो जाती है। यह वीसबीं सदी एक ऐसे ही उत्ताप' विन्दु पर मनुष्य को ले आई है इस क्रांति से उसकी चोतना एक बिलकुल ही' नए आयाम में गतिमय होने को तैयार हो रही है हमारी यात्रा अब एक बहुत ही आज्ात मार्ग पर होनी संभावित है ।. जो भी ज्ञात है, वह छूट रहा है और जो भी परिचित और जाना-माना है, वह॒विलीन होता जाता है सदा से चले आते जीवन-मूल्य खंडित हो रहे हैं और परंपरा की कड़ियाँ टूट रही हैं। निश्चित ही यह किसी बहुत बड़ी छलांग की पूर्व तैयारी है अतीत की भूमि से उखड़ रही हमारी जड़ें किप्ती नई भूमि में स्थानान्तरित होना चाहती है और परम्पराओं के गिरते हुए पुराने भवन किन्‍्हीं नए भवनों के लिए स्थान खाली कर रहे है ? इन सब में मैं मनुष्य को जीवन के विलकुल ही “अज्ञात रहस्य-द्वारों पर चोट करते देख रहा हूँ। परिचित और चत्रीय गति से बहुत चले हुए मार्ग उजाड़ हो गए हैं और भविष्य के अत्यंत अपरिचित और अंधकारपूर्ण मार्मों को प्रकाशित करने की चेष्टा चल रही है यह बहुत शुभ है, और मैं बहुत आशा से भरा हुआ हूँ | क्योंकि यह सव चेप्टा इस बात का सुसमाचार है कि मनुष्य की चेतना कोई नया आरोहण करना चाहती है | हम विकास के किसी सोपान' के निकट हैं। मनुष्य अब वही नहीं रहेगा जो वह था। कुछ होने को है, कुछ नया होने को है जिनके पास दूर देखनेवाली आँखें हैं वे देख सकते हैं, और जिनके पास दूर को सुननेवाले कान हैं वे सुन सकते हैं बीज जब टूटता है और अपने अंकुर को सूर्य की तलाश में भूमि के ऊपर भेजता है तो जैसी उधलन-पुथल उसके भीतर होती है, वैसे ही उथल-पुथल का सामना हम भी कर रहे है इसमें घवड़ाने और चिन्तित होने का कोई भी कारण नही है | यह अराजकता संक्रमणकालीन है इसके भय से पीछे लौटने की वृत्ति आत्मघाती है फिर पीछे लौटना तो कभी संभव नहीं है जीवन केवल आगे की ओर ही जाता है। जैसे सुबह होने के पूर्व अंधकार और भी घना हो जाता है, ऐसे ही नए के जन्म के पूर्व भराजकता की पीड़ा भी बहुत सघन हो जाती है हमारी चेतना में हो रही इस सारी उथल-पुथल, अराजकता, क्रांति औरः

च्फप

नए के जन्म की संभावना का केन्द्र ओर आधार विज्ञान है विज्ञान के आलोक ने हमारी आँखें खोल दी है और हमारी नींद तोड़ दी है। उसने ही हमसे हमारे बहुत से दीर्घ पोषित स्वप्न छीन लिये हैं और बहुत से वस्त्र भी और ऋहमारे स्वयं के समक्ष ही नग्न खड़ा कर दिया है, जैसे किसी ने हमें झकझो रकर अर्ध॑रात्रि में जगा दिया हो | ऐसा ही विज्ञान ने हमें जगा दिया है।

विज्ञान ते मनुष्य का बचपत छीन लिया है और उसे प्रौढ़ता दे दी है। उसकी ही खोजों और निप्पत्तियों ने हमें हमारी परंपरागत और रूढ़िवद्ध 'चिन्तना से मुक्त कर दिया है, जो वस्तुत: चिन्तना नहीं, मात्र चिन्तन का 'मिथ्या आभास ही थी; क्योंकि जो विचार स्वतंत्र हो वह विचार ही नहीं होता है | सदियों-सदियों से जो अंधविश्वास मकड़ी के जालों की भाँति हमें 'घेरे हुए थे, उसने उन्हें तोड़ दिया है, और यह संभव हो सका है कि मनुष्य का 'मन विश्वास की कारा से मुक्त होकर विवेक की ओर अग्रसर हो सके

कल तक के इतिहास को हम विश्वास-काल कह सकते हैं। आनेवाला समय विवेक का होगा विश्वास से विवेक में आरोहण ही विज्ञान की सबसे 'बड़ी देन है। यह विश्वास का परिवर्तन मात्र ही नहीं है, वरन्‌ विश्वास से मुक्ति है। श्रद्धाएँ तो सदा बदलती रहती हैं पुराने विश्वासों की जगह नए विश्वास लेते रहे हैं। लेकिन आज जो विज्ञान के द्वारा संभव हुआ है, वह वहुत अभिनव है। पुराने विश्वास चले गए हैं और नयों का आगमन नहीं हुआ

है। पुरानी श्रद्धाएं मर गई हैं, और नई श्रद्धाओं का आविर्भाव नहीं हुआ है यह रिक्तता अभूतपूर्व है

श्रद्धा बदली नहीं, शून्य हो गईं है। श्रद्धा-शून्य तथा विश्वास-शून्य चेतना का जन्म हुआ है विश्वास बदल जायें तो कोई मौलिक भेद नहीं पड़ता है एक की जगह दूसरे जाते हैं अर्थी को ले जाते समय ज॑से लोग कंधा वदल लेते हैं, वैसा ही यह परिवर्तन है विदवास की वृत्ति तो बनी ही रहती है। जवकि विश्वास की विपय-वस्तु नहीं, विश्वास की वृति ही असली वात

है। विज्ञान ने विश्वास को नहीं बदला है, उसमे तो उसकी वृत्ति को ही तोड़

डाला है

विद्वास-वृत्ति ही अंधानुगमन में ले जाती है और वही पक्षपातों से चित्त को बाँधती है। जो चित्त पक्षपातों से वेंधा हो, वह सत्य को नहीं जान सकता नै जानने के लिए निष्पक्ष होना आवश्यक है

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जो कुछ भी मान लेता है, वह सत्य को जानने से वंचित हो जाता है।' वह मानना ही उसका बंधन बन जाता है, जबकि सत्य के साक्षात्‌ के लिए: चेतना का मुक्त होना आवश्यक है विश्वास नहीं, विवेक ही सत्य के द्वार तकः ले जाने में समर्थ है और विवेक के जागरण में विश्वास से बड़ी और कोई बाधा नहीं है। यह स्मरणीय है कि जो व्यक्ति विश्वास कर लेता है, वह कभी खोजता नहीं खोज तो सन्देह से होती है, श्रद्धा से नहीं समस्त ज्ञान का जन्म संदेह से होता है। संदेह का अर्थ अविश्वास नहीं है अविश्वास तो विश्वास का ही निपेधात्मक रूप है। खोज तो विश्वास से होती है, अंधविश्वास से उसके लिए तो संदेह की स्वतंत्र चित्त-दद्ा चाहिए संदेह केवल सत्य की खोज का पथ प्रद्ास्त करता है विज्ञान ने जो तथाकथित ज्ञान प्रचलित और स्वीकृत था, उस पर संदेह किया ओर संदेह ने अनुसन्धान के द्वार खोल दिए। संदेह जैसे-जैसे विश्वासों या अंधविश्वासों से मुक्त हुआ वसे-वैसे विज्ञान के चरण सत्य की ओर बढ़े विज्ञान का तो किसी पर विश्वास है अविश्वास, वह तो पक्षपातशून्य' अनुसन्धान है प्रयोग-जन्य ज्ञान के अतिरिक्त कुछ भी मानने की वहाँ तैयारी नहीं। वह तन तो आस्तिक है, नास्तिक | उसकी कोई पूवव मान्यता नहीं है। वह कुछ भी सिद्ध नहीं करना चाहता है। सिद्ध करने के लिए उसकी अपनी कोई धारणा नहीं है। वह तो जो सत्य है, उसे ही जानना चाहता है। यही कारण है कि विज्ञान के पंथ और संप्रदाय नहीं बने और उसकी निप्पत्तियाँ सार्वलौकिक हो सकी जहाँ पूर्वधारणाओं और पूर्वपक्षपातों से प्रारंभ होगा वहाँ अंततः सत्य नहीं, संप्रदाय ही हाथ में रह जाते हैं। अज्ञान और अंधेपन में स्वीकृत कोई भी धारणा सावंलौकिक नहीं हो सकती सावंलीकिक तो केवल सत्य हो सकता है। यही कारण है कि जहाँ विज्ञान एक है, वहाँ तथाकथित धर्म अनेक और परस्पर विरोधी हैं। धर्म भी जिस दिन विश्वासों पर नहीं, णुद्ध विवेक पर आधारित होगा, उस दिन अपरिहाय रूप से एक ही हो जायगा। विश्वास अनेक हो सकते हैं, पर विवेक एक ही है। असत्य अनेक हो सकते हैं, पर सत्य एक ही है

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धरम का प्राण श्रद्धा थी श्रद्धा का अर्थ है विना जाने मान लेता श्रद्धा नहीं तो धमे भी तहीं। श्रद्धा के साथ ही उसकी छाया की भाँति तथाकथित प्वर्म भी चला गया धर्मविरोधी वास्तिकता का प्राण अश्नद्धा धी अश्नद्धा का अर्थ है : बिता “जाने अस्वीकार कर देना वह श्रद्धा के ही सिक्के का इसरा पहलू हैं। श्रद्धा -गई तो वह भी गई। आस्तिकता-वास्तिकता दोनों ही मृत हो गई हैं। उन दो इन्द्रों, दो अतियों के बीच ही सदा से हम डोलते रहे हैं विज्ञान ने एक तीसरा विकल्प दिया है यह संभव हुआ है कि कोई व्यक्ति आस्तिक नातिस्क दोनों ही हो और वह स्वयं को किन्‍्हीं भी विद्वासों से “बाँधे जीवन-सत्य के सम्बन्ध में वह परम्परा जौर प्रचार से अवचेतन में डाली “गई धारणाओं से अपने आप को मुक्त कर ले। समाज और संप्रदाय भ्रत्येक के चित्त की गहरी परतों में अत्यन्त जअवोध अवस्था में ही अपनी स्वीकृत मान्यताओं को प्रवजश्ञ कराने लगते हैं हिन्दू, जैन, बोद्ध, ईसाई, या सुतललमान अपनी-अपनी सान्यताओों और विद्वासों को बच्चों के मत में डाल देते हैं निरंतर पुलरुक्ति और प्रचार से वे चित्त की अवचेतन परतों में बद्धघूल हो जाती हैं और वैसा व्यक्ति फिर स्वतंत्र :चिन्तन के लिए करोब-करीब पंगु-ला हो जाता है| यही कम्युनिज्म या तास्तिक प्घर्मं कर रहा है। व्यक्तियों के साथ उनकी अबोध अवस्था में किया गया यह अनाचार मनुष्य के विपरीत किए जानेवाले बड़े से बड़े पापों में से एक है। चित्त इस भाँति 'परतंत्र और विश्वासों के ढाँचे में कैद हो जाता है फिर उसकी गति पटरियों 'पर दौड़ते वाहनों की भाँति हो जाती है पटरियाँ जहाँ से ले जाती हैं, वहीं 'वह जाता है, और उसे यही श्रम होता है कि मैं जा रहा हूँ दूसरों से मिले विश्वास ही उसके विचारों में प्रकट या प्रच्छन्न होते हैं, लेकिन भ्रम उसे यही कहता है कि ये विचार मेरे हैं। विश्वास यांत्रिकता को जन्म देता है और चेतना के विकास के लिए यांत्रिकता से घातक और क्या हो सकता विश्वासों से पैदा हुई मानसिक गुलामी और जड़ता के कारण व्यक्ति की गति कोल्हू के बैल की-सी हो जाती है। वह विश्वासों की परिधि में ही घमता “रहता है और विचार कभी नहीं कर पाता

पृद

विचार के लिए स्वतंत्रता चाहिए। चित्त की पूर्ण स्वतंत्रता में ही प्रसुप्त विचार-शक्ति का जागरण होता है और विचार-शक्ति का पूर्ण आविर्भाव ही सत्य तक ले जाता है

विज्ञान ने मनुप्य की विद्वास-वृत्ति पर प्रहार कर बड़ा ही उपकार किया है। इस भाँति उसने मानसिक स्वतंत्रता के आधार रख दिए हैं। इससे धर्म का भी एक नया जन्म होगा

धर्म अब विश्वास पर नहीं, विवेक पर आधारित होगा श्रद्धा नहीं, ज्ञान ही उसका प्राण होगा धर्म भी अब वस्तुतः विज्ञान ही होगा | विज्ञान पदार्थों का विज्ञान है। धर्म चेतना का विज्ञान होगा वस्तुत: सम्यक्‌ धर्म तो सदा से ही विज्ञान रहा है।

महावीर, वृद्ध, ईसा, पातंजलि या लाओत्से की अनुभूतियाँ विद्वास पर नहीं, विवेकपूर्ण आत्मप्रयोगों पर ही निर्भर थीं उन्होंने जो जाना था, उसे ही माना था। मानना प्रथम नहीं, अंतिम था। श्रद्धा आधार नहीं, शिखर थी आधार तो ज्ञान था। जिन सत्यों की उन्होंने वात की है, वे मात्र उनकी 'धारणाएँ नहीं हैं, वरन्‌ स्वानुभूत प्रत्यक्ष हैं। उनकी अनुभूतियों में भेद भी नहीं है उनके दाव्द भिन्न हैं, लेकिन सत्य भिन्न नहीं सत्य तो भिन्न-भिन्न हो भी नहीं सकते लेकिन ऐसा वैज्ञानिक धर्म कुछ अतिमानवीय चेतनाओं तक ही सीमित रहा है। वह लोक धर्म नहीं बना लोक धर्म तो अंधविश्वास ही वना रहा है। विज्ञान की चोटें अंधविद्वास पर आधारित धर्म को निप्प्राण किए दे रही हैं। यह वास्तविक धर्म के हित में ही है। वित्रेक की कोई भी विजय अन्ततः वास्तविक धर्म के विरोध में नहीं हो सक्रती विज्ञान की अग्नि में अंधविश्वासों का कूड़ा-कचरा ही जल जायगा, धर्म और भी निखर कर प्रकट होगा धर्म का स्वर्ण विज्ञान की अग्नि में गुद्ध हो रहा है, और धर्म जब अपनी 'पूरी शुद्धि में प्रकट होगा तो मनुप्य के चेततवा-जगत्‌ में एक अत्यन्त सौभाग्यपूर्ण सूर्योदय हो जायगा प्रजा और विवेक पर आझूढ़ धर्म निश्चय ही मनुप्य को अतिमानवीय चेतना में प्रवेश दिला सकता है। उसके अतिरिक्त मनुप्य की चेतना स्वयं का अतिक्रमण नहीं कर सक्रती, और जब मनुप्य स्वयं का अतिक्रमण ऋरता है तो प्रभु से एक हो जाता है

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मनुष्य का विज्ञान

मैं सुनता हूँ कि मनुप्य का मार्ग खो गया है। यह सत्य है। मनुष्य का मार्ग उसी दिन खो गया, जिस दिन उसने स्वयं को खोजने से भी ज्यादा मूल्यवान किन्‍्हीं और खोजों को मान लिया

मनुष्य के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और सार्थक वस्तु मनुप्य के अतिरिक्त ओर कुछ भी नहीं हैं। उसकी पहली खोज वह स्वयं ही हो सकता है खुद को जाने विना उसका सारा जानना अन्ततः घातक ही होगा

अज्ञान के हाथों में कोई भी ज्ञान सृजनात्मक नहीं हो सकता, और ज्ञान के हाथों में अजआान भी यूजनात्मक हो जाता है

मनुप्य यदि स्वयं को जाने और जीते, तो उसकी शेप सब जीतें उसकी ओर उसके जीवन की सहयोगी होंगी | अन्यथा वह अपने ही हाथों अपनी क्र के लिए गड्ढा खोदेगा

हम ऐसा ही गड्ढा खोदने में लगे हैं हमारा ही श्रम हमारी मृत्यु वनकर खड़ा हो गया है। पिछली सम्यताएँ वाहर के बआक्रमणों और संकटों से नष्ट हुई थीं। हमारी सम्यता पर बाहर से नहीं, भीतर से संकट है बीसवीं सदी का यह समाज यदि नप्ठ हुआ तो उसे आत्मघात कहना होगा और यह हमें ही कहना होगा क्योंकि वाद में कहने को कोई भी बचने को नहीं है

संभाव्य युद्ध इतिहास में कभी नहीं लिखा जायगा बह घटना इतिहास के बाहर घटेगी, क्योंकि उसमें तो समस्त मानवता का अन्त होगा पहले के लोगों ने इतिहास बनाया, हम इतिहास मिटाने को तैयार हैं

ओर इस आत्मघाती संभावना का कारण एक ही है। बह है, मनुष्य का मनुप्य को ठीक से जानना पदार्थ की अनन्त ज्क्ति से हम परिचत हैं-- परिचत ही नहीं, उसके हम विजेता भी हैं पर मानवीय हृदय की गहराइयों का हमें कोई पता नहीं उन गहराइयों में छिपे विप और अमृत का भी कोई ज्ञान नहीं है

पदार्थाणु को हम जानते हैं, पर बात्माणु को नहीं | यही हमारी विडम्बना

२०

है]

है। ऐसे शक्ति तो भा गई है, पर शान्ति नहीं। अश्ञान्त और अप्रवुद्ध हाथों से आई हुई शक्ति से ही यह सारा उपद्रव है। अक्ञान्त और अप्रवुद्ध का वक्तिहीन होना ही शुभ होता है। शक्ति सदा शुभ नहीं वह तो शुभ हाथों में ही घुभ होती है। हम द्क्ति को खोजते रहे, यही हमारी भूल हुई। भव अपनी ही उपलब्धि से खतरा है। सारे विश्व के विचारकों और वैज्ञानिकों को आगे स्मरण रखना चाहिए कि उनकी खोज मात्र शक्ति के ही लिए हो। उस तरह की अंघी खोज ने ही हमें इस अंत पर लाकर खड़ा किया है शक्ति नहीं, शान्ति लक्ष्य बने स्वभावत: यदि शान्ति लक्ष्य होगी, तो खोज का केन्द्र प्रकृति नहीं, मनुप्य होगा जड़ की बहुत खोज और शोध हुई अब मनुष्य का और मन का अन्वेषण करना होगा विजय की पताकाएँ पदार्थ पर नहीं, स्वयं पर गाड़नी होंगी भविष्य का विज्ञान पदार्थ का नहीं, मूलतः मनुष्य का विज्ञान होगा समय गया है कि यह परिवर्तन हो। अब इस दिशा में और देर करनी ठीक नहीं है कहीं ऐसा हो कि फिर कुछ करने को समय भी शेप बचे जड़ की खोज में जो वैज्ञानिक आज भी लगे हैं, वे दकियानूसी हैं, और उनके मस्तिष्क विज्ञान के आलोक से नहीं, परम्परा और रूढ़ि के अंधकार में ही दूबे कहे जावेंगे। जिन्हें थोड़ा भी बोध है और जागरूकता है, उनके अन्वेपण की दिद्या आमूल बदल जानी चाहिए। हमारी सारी शोध मनुष्य को जानने में लगे, तो कोई भी कारण नहीं है कि जो शक्ति पदार्थ और प्रकृति को जानने और जीतने में इतने अभूतपूर्व रूप से सफल हुई है, वह मनुष्य को जानने में सफल हो सके मनुष्य भी निश्चय ही जाना, जीता और परिवर्तित किया जा सकता है में निराश होने का कोई भी कारण नहीं देखता हम स्वयं को जान सकते हैं श्रौर स्वयं के ज्ञान पर हमारे जीवन और अन्तः:करण के बिलकुल ही नए आधार रखे जा सकते हैं एक बिलकुल ही अभिनव मनुष्य को जन्म दिया जा सकता है। अतीत में विभिन्‍न धर्मो ने इस दिशा में बहुत काम किया है, लेकिन वह कार्य अपनी पूर्णता और समग्रता के लिए विज्ञान की प्रतीक्षा कर रहा है। धर्मों ने जिसका प्रारम्भ किया है, विज्ञान उसे पूर्णता तक लेजा ,,

सकता है। धर्मो ने जिसके वीज वोए है, विज्ञान उसकी फसल काट सकता है

पदार्थ के सम्बन्ध में विज्ञान और धर्म के रास्ते विरोध में पढ़ गए थे, उसका कारण दकियानूसी धाभिक लोग थे वस्तुतः धर्म पदार्थ के सम्बन्ध में कुछ भी कहने का हकदार नहीं था वह उसकी खोज की दिशा ही नहीं थी। विज्ञान उस संघर्ष में विजय हो गया। यह अच्छा हुआ। लेकिन इस विजय से यह समझा जाय कि धर्म के पास कुछ कहने को नहीं है धर्म के पास कुछ कहने को है और बहुत मूल्यवान सम्पत्ति है। यदि उस सम्पत्ति से लाभ नहीं उठाया गया तो उसका कारण रुढ़िग्रस्त पुराणपंथी चैज्ञानिक होंगे एक दिन एक दिशा में धर्म विज्ञान के समक्ष हार गया था, अब समय है कि उसे दूसरी विश्ला में विजय मिले और धर्म और विनान नसम्मलित हों उनकी संयुक्त साधना ही मनुप्य को उसके स्वयं के हाथों से चचाने में समर्थ हो सकती है

पदार्थ को जान कर जो मिला है, आत्मज्ञान से जो मिलेगा, उसके समक्ष वह कुछ भी नहीं है धर्मो ने वह सम्भावना बहुत थोड़े लोगों के लिए खोली है। वैज्ञानिक होकर वह द्वार सबके लिए खुल सकेगा धर्म विज्ञान बने और विज्ञान धर्म बने, इसमें ही मनुष्य का भविप्य और हित है

मानवीय चित्त में अनन्त झक्तियाँ है और जितना उनका विकास हुआ है, “उससे बहुत ज्यादा विकास की प्रसुप्त संभावनाएं हैं। इन शक्तियों की अवस्था :और अराजकता ही हमारे दुख के कारण हैं, और जव व्यक्ति का चित्त अब्य- वस्थित और अराजक होता है तो वह अराजकता समष्टि चित्त तक पहुँचते ही अनन्तगुणा हो जाती है।

समाज व्यक्तियों के ग्रुगणणफल के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है वह “हमारे अंतर्से वंधों का ही फैलाव है। व्यक्ति ही फैलकर समाज बन पाता है। इसलिए स्मरण रहे कि जो व्यक्ति में घटित होता है, उसका ही वृहत् रूप समाज में प्रतिध्वनित होगा सारे युद्ध मनुप्य के मन में लड़े गए है और सारी विकृतियों की मूल जड़ मन में ही हैं

समाज को बदलना है तो मनुष्य को बदलना होगा; और समष्टि के नए -आधार रखने हैं, तो व्यक्ति को नया जीवन देना होगा

भनुप्य के भीतर विप और अमृत दोनों हैं शक्तियों की अराजकत्ता ही

श्र

विप है और शक्तियों का संयम, सामंजस्य और संगीत ही अमृत है

जीवन जिस विधि से सीन्‍न्दर्थ और संगीत वन जाता है, उसे ही मैं योग कहता हूँ

जो विचार, जो भाव औौर जो कम मेरे अंतः संगीत के विपरीत जाते हों,

ही पाप