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. /“ महाभागानाम्‌, प्रथम मतं श्रीवेदान्तदे शि ऋमहाभागानामिति तत्र विवेक:

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_ तखमुक्ताकलापः, न्‍्यायपरिशुद्धि, न्यायसिद्धाउ्जनं

< विमशप्रोद्धा | प्रोढ्या विवेचतस्य च॒ प्रामाण्येत मूर्धाभिषिक्त पभिषित्त

इदमधुना महामहोपाध्यायपण्डितगड्धानाथशाग्रन्थमालायां द्वितीयपुस्तकरूपेण प्रकाश्यमान... लक कस हिन्दीभाषानुवादसंवलितं श्रीवेदाल्तदेशिकविरचित॑ 'न्यायसिद्धाञ्जनम्‌र नाम पाण्डित्यमण्डितं.._ | पुस्तक श्रीवष्णवदशनतत्वजिज्ञासुनामुपहारीक्रियते भ्रस्य ग्रन्थरत्तस्थ मुललेखकः संवंतत्ब-

पे _ स्वतस्त्र: श्रीमद्वेदास्तदेशिको नामाचार्ये श्रीरामानुजदशनस्येतिहासे साविशरय माहात्म्य॑ भजते ८... श्रीवेष्णवदशनस्य धाराहयं प्रवहति--यत्‌ खलु 'वडकल? “टड्धुले! इति तमिठ्भाषामयमभिषान

_: घत्ते। उभयोरश्टादश्मेदेषु सत्स्वपि प्रपत्तिविषयानुरोधकमेव मुल्य पार्थक्यम्‌ प्रपत्तिविषये _.. विहितकर्मणः कोम्प्युपयोगो वर्तते वेति जागडके सल्देंहे *श्रीमन्नारायणाचरणारविन्दप्रपत्तौ वर्तते ..

| &.... तत्र वेदान्तदेशिकमहाभागानां जनिर्द्वविडदेशे “वडकले'गुरुपरम्परानुसारेण ४३७१ .. < कलिवरें (८ ११९० शाके, अथवा १२६८ ईशवीये वर्ष ) भ्रभवदित्यत्न कश्नित्‌ संशय: » दूर्ण शतवार्षिकमायुः प्राप्प १२९९० शाके (5१३६८ ई० वर्ष ) श्रीमब्चारायणचरणारविन्द- _ _कैड्ूय॑मलभतेति सम्प्रदायविदों वदन्‍्ति | तेन परः्शता प्रत्था विनिर्मिताः, येषु शत्तदूषणी, ला

_) कर्मणः सातिशय माहात्म्यमित्येकः पक्षः 'वडकलै'मतानुयायिनाम्‌। प्रपत्तिस्तु नैंव कर्मणए + कणिकां कामप्यनुरुणद्वीति द्वितीय: पक्ष: “टद्धूले'मतानुयायिनायु तन्र प्रथमपक्षस्तु खसिद्धात्ता- भिव्यक्तये कपिकिशोरस्थाचरणं दृष्टान्तत्वेनोपन्यस्थति कपिकिशोरः सद्धूटाड्रीतः स्वोद्धार- पे “श| कामनया मातरं स्वीयां स्वहस्ताभ्यां ह॒इं बध्नाति, येन सा तमझे आदाय इतस्ततः पलायमाना....... हा निर्भयबहुल स्थान गन्तव्य॑ प्राप्तुं क्षमते ह्वितीयपक्षस्तु स्वाभीश्मतोपन्यासाय मसार्जारकिशोरत्या-_ हु | हा . चरणमुदाहरणत्वेनोररीकरोति नितरां चेष्ठाशून्य॑ स्वकिशोरं मुखेनादाय मार्जारी निर्भीतिभय॑ रा जा : स्थल॑ प्रापयति एवमेव प्रपत्तौ शास्त्रविहितस्थ कर्मणो नैसर्मिकोपयोग इति तु प्रथम मतबू। . + प्रफ्तौ ताइक्लर्मणो लेशतोडपि नावश्यकतैति ह्वितीयं मत तत्र ह्ितीय॑ मत छोकाचार्य-

सककेगलसपलेनन- सका

नस पलक लत कि पी लपतसत परत

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सा _एतदप्रन्थचतुष्टय्यन्त भूंतो महिमसम्पन्नोध्यं न्यायसिद्धाज्ञननामा ग्रत्थो हिन्दीभाषापरिणत: सामान्य रा - बुद्धिनामपि रामानुजीयदशनसिद्धास्तजिज्ञायुनां जनानां महोपकारं विधास्यतीति हुडं॑ विश्वसिमि।

क्‍ न्यायसिद्धाक्षनस्थ रचनाकालोअंपि प्रायः प्रमाणेनोपस्थातुं क्षम्यते वेदान्तदेशिकन क्‍ ... बृन्नापि स्वीयय्रसथेषु तेषां रचवाकालः कण्ठेनोद्योषित इति तु सत्यमू; तथापि संकल्पसूर्योदये रा | समुपलब्धं पद्यमेतत्‌ तन्निर्माणकालविषये काश्चित्‌ सूचनिकामिव दातुं प्रयतते-- क्‍

विशत्मब्दे. विश्वुतनानाविधविद्यः: निशद्वार श्चावितशारीरकभाष्यः श्रेयः श्रीमान्‌ वेद्धूटनाथ:ः श्रुतिपथ्यं ताथप्रीत्य वाटकमथ्य व्यधिततत्‌ ॥॥ पच्स्येद तात्पयय यद्व वेडूटनाथेन विशतिवर्षात्मके वयसि सर्वा विद्या श्रधिगताः

प्रतिवर्ष शारीरकभाष्यं श्रीभाष्यं तत्तत्वजिज्ञासुम्यश्छात्रेभ्यः समुपदिदिशे तत आरभ्य . तिशद्वारं श्रीभाष्यश्रावणानस्तरं संकल्पसूययोदयास्यं नाटकमेतदु व्यरचि तथा तत््वटीका

. विषये इदमुदटड्ूि--

यतिपतिभ्रुवों भाष्यस्यासन्‌ यथाश्रतचिन्तित-

क्‍ प्रवचनविधावष्टाविशे.. जयध्वजपट्टिका: क्‍ : अर्थात्‌ श्रीभाष्यस्थाशविशे प्रवचनविधो तत्वटीकाया निर्माणं व्यधायि उभयो

..... पद्ययोस्‍्तारतम्थेन श्रबमेतत्‌ प्रतीयते यत्‌ संकल्पसूर्योदयनाटकस्य रचनातो वर्षद्रयात्‌ पूर्व॑मेव ..... तत्त्वदीकाया निर्माण पूर्वोक्तपथप्रामाण्यादनुमातुं चूनं शक्‍्यते इल्थं ११९० शाके . रा . (१२६८ ईशवीये वर्ष ) वेदान्तदेशिकस्य जन्म विशतिवर्षात्मके वयसि तस्य नाचा- रा .. विद्यानामधिगम: १२१० शाके (८ १२८८ ई० व० )। श्रीभाष्यस्थ तिशद्वारमध्यापनकाल .. १२४० शाके (८१३१८ ई० व० ), तथा संकल्पसूर्योदयस्थ रचना १३१८ ई० वर्ष, : तच्वटीकायाश्र निर्माणं वर्षद्यात्‌ प्राक १३१६ ई० वर्ष उत्नेतुं पारयामः नाय॑ तथ्यवादः, : आयोवाद एवेषः इममेव कालमाधारीहृत्य वेडूटदेशिकस्पेतरेबामपि प्रस्थानां रचनाकालः

[ है ]

: स्यायपरिशुद्धधां प्रमाणस्थैव पुष्ठं विवरणं सत्तकमरण्डितं जरीजूम्भते, प्रमेयस्थ विवरण पक तु तत्र नितात्त॑ संक्षिप्तरूपेणेव दरीहश्यते श्रत एवं विस्तृतविवरणविरचनमेव प्रत्थस्यास्य निमणि5भिव्यक्त कारणबु सर्वार्थसिद्धितं केवल न्यायपरिशुद्धि विनिर्दिशति, श्रपितु स्याय- सिद्धाञ्जनमपि तत्रत्यविषयोल्लेखपुवर्क कटाक्षीकरोति |. तत्त्वमुक्ताकलापस्पास्मिन्‌ू सिद्धाञ्जने .. समुल्लेखोस्योच्तरकालिकतामभिव्यनक्ति इत्थं प्रायः १३३०-३२ ईशवीये वर्ष व्यायसिद्धाज्नं॑.. 5 व्यरीरचत्‌ू तस्मिनू समये पद्चाशदर्षीयोध्यमाचायः स्वपाण्डित्यस्थ प्रक्ृष्ठामून्नति भेजे का . इत्यपि निगदितुं पारयामः क्‍

क्‍ .. ग्रन्थरत्नेईस्मिनू षट परिष्छेदास्तावद्‌ विलसच्ति | ते यथा --जडब्रव्यपरिच्छेद |

.. प्रथमः, जीवपरिच्छेदों द्वितीयः, ईश्वरपरिच्छेंदस्तुतीयः, नित्यविभूतिपरिच्छेदश्नतुर्थ:, बुद्धिपरिच्छेद:...ः है

: पतञ्ञमः, अ्रद्रव्यपरिच्छेदस्तावत्‌ पष्ठोडस्तिमश्ल पष्ठपरिच्छेदस्य प्रारम्से तावद प्रल्थकर्ता क्‍ सत्त्वरजस्तमांसि, शब्दादय: पद्च , संयोग:, शक्तिश्रेति दशवस्तूनां विवरण प्रतिज्ञातम्‌ एवंबिये-

... ्वेवाद्रव्येषु गुरुत-द्रवत्व-सामान्य-साहर्य-विशेष-समवायाभाव-वैशिष्टचादीतां यथासम्भवमत्तर्भावो..... .. विद्यत इत्यप्यभिहितमु, परन्त्वभावनिरूपण नोपलम्यते ग्रल्थांशे तेनेदमनुमीयत्ते बावदुप- .... लब्धों ग्रन्थस्त्रुटित एवं। कारण तन्न नव विद्य: क्‍ मर .... प्रत्यस्यास्थ हिन्दीभाषायामयमनुवाद: पण्डितवरेणात्र विश्वविद्यालये रामानुणवेदान्ता- ध्यापकेन श्रीनीलमेघाचार्यण विस्तरेण प्रोढ्या व्यरचीति सोथ्यमस्माक॑ धन्यवादमहँति हे

... परल्तु हा हन्त ! ग्रन्थस्य प्रकाशनात्‌ पूवमेवार्य महाभागो वेकुण्डलोकमगमदिति निवेदयतों नितरां श्र ५५ . ..._ खिद्यति ममान्तरात्मा। प्रकाशताधिकारिणा दर्शनशास्त्राचार्येण श्रीत्रजवल्लभद्विवेदेन भूमिकादिभि- हब 5 | .. र्नानोपयोगिविषयाणां संयोजनेन भृशमुपक्ृर्त दर्शनतत्त्वजिज्ञासुनायु इत्थें विद्वृृयस्थ ..._ साहचयेंण प्रकाशितोथ्यं ग्रल्थों वेदान्तरहस्यजिज्ञासूनां छात्राणामध्यापकानां महात्तमुपकारं जे _ करिष्यतीति नुन॑ विश्वसति--... हा

वेशासक्ृष्ण १२, है | हे पा, हा ..' मम बलदेव उपाध्याय: रा | 7 का वाराणसेयसंस्कृतविश्वविद्यालयस्थानुस्थान-..

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... भूमिका:

जा अल <४१८८ रस वेरथधाकमत/तनकामम कह सा कट्नशलःञअकलकनक99+कबनकक,

... मानव जाति को घरोहर के रूप में प्राप्त ज्ञ] और विज्ञान का, संक्रीण परिधि. .... को छोड़, निष्पक्षमाव से अध्ययन किया जाना चाहिये। प्राच्य ओर पाश्रात्य देशों के... .... दशनों की अपनी अपनी परम्परा रही है एवं इनकी अपनी अपनी विशेषतायें हैं। इनका . विकास परस्पर निरपेक्ष भाव से हुआ अथवा एक को दूसरे ने प्रभावित किया, इस विषय ... मैंविद्वानों में मतमेद हैं! इस बिवाद में पड़ कर प्राच्य और पाश्रात्त दशनों के ... सिद्धान्तों का यदि ऐतिहासिक क्रम से तुलनात्मक अध्ययन किया जाय, तो वह अधिक .. कल्याणकारी होगा | समय और परिस्थिति के अनुसार मनुष्य के विचारों में परिवतन .. होता रहता है। दशनशाख््र भी इस नियम से मुक्त नहीं है। आपातदृष्या भारतीय दशन इस नियम के अपवाद से प्रतीत होते है रूठिवादी दाशनिकों की कम से कम ऐसी ही घारणा है, किन्तु बात ऐसी नहीं है। सूत्रकार कणाद और गौतम के द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तही आज के नैयायिक को सर्वात्मना स्वीकार हो, ऐसी बात नहीं है। वात्स्थायन, प्रशस्तपाद, _उद्योतकर, वाचस्पति मिश्र, उदयन, गंगेश आदि अनेक आचार्यों का उनके विकास में... ... योगदान रहा है। भारतीय दशनों की यह विशेषता अवश्य रही है कि उनकी एक तम्बी ..._. परम्परा रही है और वह अब भी सुरक्षित है, किन्तु ऐसी बात नहीं है कि उस निश्चित रेखा... ...... पर चलने के कारण उनमें कोई विकास हुआ हो, कोई नवीनता आईं हो भारतीय .... चिन्तकों ने अपने पूर्ववर्ता आचार्यों के मतों का, उनके परस्पर के. मतमेदों का सयुध्य- .... वाद के नाम से उल्लेख किया है। यदि किसी विशिष्ट आचार्य के मत से वे सहमत ...... नहीं हैं, तो उसका श्रनादर नहीं करते, किन्तु ऐसे स्थत्नों पर वे 'प्रौदिवाद! पद का ..... प्रयोग करते हैं। प्रीढिवादमात्रम! पद का प्रयोग कर भारतीय दार्शनिकों ने सूत्रकारों और... ... भाष्यकारों को भी आल्लोचना की है और इस प्रकार अपने पूर्ववर्ता आचार्यों परपूरी .._ श्रद्धा ख्ते हुए भी उन्होंने उनके विचारों को आगे बढाया है। पा मर भारतीय दशनों को आस्तिक और नास्तिक दो विभागों में बांदा जाता है। न्याय, .... वेशेषिक, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा और उत्तरमोमांसा की आस्तिक दर्शन में तथा चार्वाक, ..._ जैन ओर बौद्ध दशन की नास्तिक दशन में गणना की जाती है। आस्तिक दर्शन के समान. . नास्तिक दंशन की भी छु संख्या को पूर्ण करने के ढिये बौद्ध दर्शन के चार उपभेदों-- योगा चार, - सोत्रान्तिक और वैभाषिक--का परिगणन किया. गया है। भारतीय

: से योगदर्शन की अभिन्नवा सी स्थापित हो गईं है। पूव ओर उत्तर भीमांसा की भी अनेक

[.

मान्यतायें समान हैं। परवर्ती काल्न में ब्रह्मयूत्रों पर अनेक भाष्यों की रचना हुई, किन्तु. इनकी प्रमाण ओर प्रमेय मीमांसा पर न्याय-वैशेषिक दशन की प्रक्रिया की छाप अधिक स्पष्ट है। पूव मीमांसा से समानता आज शांकर वेदान्त की है। “व्यवहारे भाइनय:” कहकर शांकर वेदान्तियों ने इसको स्पष्ट मान्यता दी है। बोडदशन की चार धाराओं का प्रथकू परिगणन नास्तिक दशन की भी संख्या को छु। तक पहुँचा देने मात्र के लिये किया गया है, इसका अन्य कोई आधार या उपयोग नहीं है।.. क्‍ . पाल्नि साहित्य से ज्ञात होता है कि बुद्ध के समय में अनेक दृष्टियां प्रचलित थीं दीघनिकाय के ब्रह्मजाह्नसुत्त में अजित केशकम्बतल्,, पूरण कश्यप, पकुंध कच्चायन, मंक्खत्ति गोसाल, संजय वेल्नट्िपुत्त और निगंठ नाथपुत्त आदि के रिद्धान्तोंका वर्णन मित्रता... ..है। महाभारत और जैन साहित्य में मी उस काल में प्रचलित अनेक दृष्टियों का परिचय... .... मिलता है। षडदशन समुच्चय' को गुणरतन कृत टीका में ३६३ दृष्टियों का उल्लेख... .... है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ओपनिषद दशन ओर सांख्यदर्शनकी ... प्रतिष्ठा हो जाने पर मी बुद्ध के समय में भारत में भी अनेक दृष्टियां उसी प्रकार प्रचल्चित.... और विकसित हो रही थीं, जैसे कि यूनान में सूत्रकाल में भारतीय दशन ने नवीन . परिवेष घारण किया | काल, स्वभाव, निवति और यहच्छा तक को जगत्‌ का कारण मानने. .... वाली दृष्टियों का उल्लेख उपनिषदों" में भी मित्रता है। सूत्रकारों के द्वारा विशिष्ट मतों की... ' हे _ स्थापना किये जाने के बाद में दृष्टियां धीरे घीरे लुप्त होने लगीं ओर इनमें से अनेकों का... का .... अब नाम भी उपलब्ध नहीं है। यूनान में भी इसो प्रकार अनेक दृष्टियों का उन्मेष हुआ... .. था, किन्तु प्रीक साम्राज्य और सम्यता-संस्कृति के साथ ही वहां के दशन की घाराभी विच्छिन्त हो गई और उसको ऐसा कोई अवसर नहीं मिल्रा, जिससे कि उसका निश्चि.... : उद्देश्यों और लक्ष्यों को दृष्टि में रखकर विकास होता | प्रकृतिगत वैचवित्य मी इसमें कारण... . हो सकता है। भारतीय मनीषियों में व्यक्तिगत यशोक्षिप्सा की प्रवृत्ति नहीं रही है। . अधिकांश भारतीय बाहुमय में उसके यथार्थ रचयिता का नाम भी उपलब्ध नहीं होता |... . भारतीय साहित्य में व्यक्ति को महत्व देकर परम्परा की महत्ता स्वीकार का गई है। . इसके विपरीत पाश्चात्त्य- साहित्य में व्यक्ति को अधिक महत्त्व दिया गया है। एक व्यवस्थित... . दाशनिक परम्परा स्थापित करने की अपेक्षा उन्होंने व्यक्तिगत विचारों पर ही अधिक बोर.

. दिया है। इसीलिये वहाँ पर नतो गुर-शिष्य की ही कोई लग्जी परम्परा रही है श्रोरन किसी एक दशन या दृष्टि की ही परम्परा पा . *. सूत्रकृदाख्ये द्वितीयेज्ज्ञे परप्रावाहुकानां जीणि शतानि त्रिषष्टटघिकानि परिसंख्यायन्ते।.... ._.. असिइसय॑ किरियाणं अकिरियवाईण होइ चुलसीई | रा * ला .. अन्ञाणिभश सत्तद्दी . वेणइयाणं बत्तीस || ( एृ० १०) .... अशीत्यधिक शर्त क्रियावादिनामक्रियावादिनां सवति चतुरशीतिः .... अज्ञानिनां सप्तषष्टिवनयिकानां _... द्वार्नरिशत्‌ इति च्छाया | ]

२. काल्मः स्वभावो नियतियदच्छा भूतानि योनि पुरुष इ््ति आम दे

|

जिस काल में दाशनिक सूत्ग्रन्थों की रचना हुईं उस समय पाग्चरात्र और पाशुपत _ . परत भी भारतीय साहित्य में पूणण प्रतिष्ठित हो चुके थे। इनकी अपनी दृष्टि थी। परवर्ती .जैत्र शाक्त तथा वैष्णण आगम और दशन का इन्हींसे विक्रास हुआ। भारतीय दर्शन

क्े क्षेत्र में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये जगत्‌ ... की वास्तविक सत्ता को स्वीकार करते हैं, उसको मिथ्या, ज्ञाणक या अलीक नहीं मानते

. दर्शन की यह आगमिक धारा कुछ समय पहले तक यहाँ उपेक्षित सी थी। वस्तुतः इसके .. बिना भारतीय दशन का अध्ययन पूण नहीं माना जा सकता ! भारतीय दश्शान की सभी

...../.. प्रवत्ियों और घाराओं का वर्गीकरण करने के लिये इसका आस्तिक और नास्तिक भेद ...... से किया गया विभाग अप्यात्त है। ईश्वववादी और अनीश्वरवादी भेद से भी भारतीय

.. दर्शनों का विभाग माना गया है। यह विभांग अधिक संग्राइक है। इसमें आगमिक दरनों .. का भी समावेश हो जाता है। सभी दशनों को निकट लाने में भी यह विभाग श्रधिक

..._ सहायक है। इसके अतिरिक्त मारतीय दशन द्वैत, द्वेतादत और अद्वेत दृष्टि में से किसी एक...

.._ का प्रतिनिषित्व करते हैं। भारतीय दर्शन की सभो शाखाओं को इन विमार्भो के अच्तगत . बाँद कर यदि इनका ऐतिहासिक ओर तुलनात्मक पद्धति से अध्ययन किया जाय तो वह

|... अधिक तकसंगत, युक्तियुक्त और यथार्थ होश केवल्न भारतीय दर्शन ही नहीं पाश्रात्य..... .. . दशनों का भी इन्हीं दो वर्गकरणों के अन्तगंत अध्ययन निदान्त उपयोगी हो सकता है|

भारतीय दशन के उपयुक्त वर्गीकरण के साथ ही उसके अध्ययन की रूढिवादी

...- परिपाटी में भी परिवर्तत आवश्यक है। सुवर्ण तैजस है या पार्थिव ! वायु में गुरुत्व हैया.._

.._ नहीं ! आदि अनेक विषयों को विज्ञान ने दशन की परिधि से हटा दिया है। भारतीय... 5... दाशनिकों ने भी प्रत्यक्ष का प्रामाण्य सर्वोपरि माना है। प्रत्यज्ञविरुद्ध तक या युक्ति का 2. .... कोई अथ नहीं होता | यद्यपि नेयायिकों को प्रत्यक्ष की अपेकज्ञा अनुमान अधिक प्रिय है,

2 रा किन्तु अनुमान का उपयोग वे 'प्रत्यक्षसिद्ध अर्थ में ही करते हैं। सांख्य* के मत में ज्ञान...

१... 38 ताक 50/५३५५५०७।

प्र्यक्षसिदुमप्य थम नुमानेन बुभ्ुत्सन्ते तकरसिकरा: दन्ति केचित्‌ ग्रामाण्यमग्रामाण्यसिति स्वत: |

) डभय परतः 5०: प्राहुरक्षपास्पक्षिल्ादय: के |] के मा ..... अपग्रामाण्यं स्वतस्तन्न प्रामाण्य॑ परतों बिंदु: के हर मा मा बोद्धा मीमांसकास्वन्न प्रामाण्यं तु स्वतो विदु रा हा .... अप्रामासाष्य तु परत: लिन लििननन हू...

0 ( मानमेयोद्य, पृ० १७६ ) हल मम परम माण णस्वे स्वतः खांख्या: समाक्षिता। जा

5 (सब ( स्वद्शनसंग्रह, जैमिनिद्शन, पू० १०४७ $- रा रे रा ..ः

में प्रामाण्य ओर अप्रामाण्य स्व5) ग्रहीत होता है। नेयायिक का कहना है कि यह परत;

[७]

..गृहीत होता है। बौद्ध कहते हैं कि अप्रामाण्य स्वतः णहीत होता है और प्रामाण्य परतः | इसके... विपरीत मीमांसक के मत में प्रामाण्य स्वतः तथा अप्रामाण्य परतः गहीत होता है। कुमारिल भट्ट अमिहितान्वय॒बाद मानते हैं तो प्रभाकर अन्वितामिधानवाद | नेयायिक शब्द को अनित्य मानते हैं तो मीमांसक नित्य | इस प्रकार के अनेक विषय हैं, लिन पर एक दाशनिक से दूसरे दाशनिक का मत भिन्न है। जयन्तमद्ट अपने पूर्ववर्ती स्वतः प्रामाण्यवादी दाशनिकों की युक्तियों का खण्डन कर परत: प्रामाण्यवाद की स्थापना करते हैं, उसी...

प्रकार आज का नेयायिक भी परतः प्रामाण्यवाद पर किये गये आक्षेप को. सहन नहीं कर

. सकता। वस्तुतः इस खण्डन-मण्डन की प्रक्रिया में ही भारतीय दशनों का विकास हुआ है। वाचस्पति मिश्र ने न्याय, योग, वेदान्त, मीमांसा, सांख्य सभी दर्शानों पर अपने अन्थ......

_ किखे हैं। इन सभी दशनों के साथ उन्होंने पूरा न्याय किया है। प्रत्येक दर्शन के समर्थन.

उन्होंने अपनी नवीन युक्तियों की उद्धावना की है। यह सह्दी है। किन्तु अब केवल

. इतना ही पर्याप्त प्रतीत नहीं होता नये शास्त्र, नये प्रइन, नये तक॑, नई समस्‍यायें हमारे

सामने हैं। आज हमको अपनी पुरानी थाती का लेखा जोखा कर आगे बढ़ना है आज...

इमको देखना है कि किन किन समस्याओं का समाधान इनमें हो चुका है और कौन दशन अधिक तकसंगत युक्ति से किस वस्तु को उपस्थित करता है| इसके लिये यह...

. आवश्यक है कि कुछ समय के लिये हम नेयायिक और मीमांसक के घेरे से बाहर होकर...

.._ नहीं कर पा रहा है

क्‍ पाश्वरात्र और पाशुपत आगम महाभारत काल में सुपरिचित थे। इनका अपना... .. दशन था। वेद के समान ये भी स्वतः प्रमाण थे। इनके अनुयायी इन शाझत्रों का वेद... से अधिक आदर करते थे। शैव, शाक्त और वैष्णव सभी आगमों में प्रायः यह मान्यता...

.. देखने को मित्रती है। शेव, शाक्त ओर वैष्णव दरशनों के विकास में प्रमुख स्थान इन्हीं...

शात्रों का रहा है। प्रस्थानत्रयी--वेद, उपनिषद्‌ और मगवद्गीता-का सर्वोपरि प्रामाण्व शंकराचार्य ने स्थापित किया अथवा संभवतः इस स्थापना का आधार उनसे कुछ पहले... | ही बन चुका था वैष्णब आचायों को भी अपने मत की प्रतिष्ठा के लिये इसको स्वीकार हर |

4. डा. सातकडि मुखोपाध्याय बोडम्याये प्रामाण्यविसश:” शीषक बिबन्ध में उक्त . |

..._ झ्ञान के परतः प्रामाण्य और स्वतः प्रामाण्य जैसे अनेक विषयों के समथन और खण्डन में... .. दी गई युक्तियों का अध्ययन करें और किसी स्वतन्त्र निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयत्न करे! |... ... अध्ययन और विचार की इस पद्धति से नवीन भारतीय दर्शन का उद्धव होगा, जो कि नये | . प्रइनों, नई समस्याओं को सुल्का सकेगा, जिसको कि आज का नवीन विज्ञान और चिन्तन गा पा]

विभाग से सहमत नहीं हैं। उनके मत में बौद्ों का एक अलग पक्त है।इसमत |.

पे से जैन नैयायिक और वाचस्पति मिश्न भी सहमत हैं। इन पाँचों पक्षों में कौन पच्च 2 रा इसी पद्धति

... अधिक युक्तिसंगत है, इसको बतलाने का यहाँ अयास किया गया है। पक हे भारतीय दर्शन का अध्ययन आज अपेक्षित है। अशव्य--सारस्वती सुषमा, वर्ष

.. अछ्ू १०२) ६० क-१७। .ः

[ ।ै

.. करना पढ़ा | ब्रह्मसूत्र' की बौधायन बृत्ति, द्रमिल्रमाष्य और “श्रीवत्साँंक मिश्र का विवरण आब् | . उपलब्ध नहीं है। विशिशद्वैव दर्शन के प्रेरणाखोत ये ही ग्रन्थ थे। वैष्णय आचारयों ने. : प्रस्थानत्रगी को अवश्य अंगीका' किया, किन्तु शांकर वेदान्त और वैष्णव वेदान्त के

. सिद्धान्तों में मौक्षिक अन्तर है। शांकर वेदान्त “व्यवह्रे भाइनयः” कहकर व्यवहार में

. अम्मत पद्चीस तत्वों को मी वह अपने दर्शन में प्रायः उसी रूप में मान लेता है। इसके विपरीत वैष्णव वेदान्त की प्रमाण-प्रमेय-मीमांसा का आधार पाश्वशत्र संदहिताएं हैं। यहाँ ........ आगम-सस्मत तीन ही प्रमाण माने गये है पच्चीस तत्वों का निरूपण सांख्य को प्रक्रिया _ ... से भिन्न पाश्वरात्र संहिताओं के अनुकूल है। पचीस तत्वों के अतिरिक्त नित्यविभूति, है

: धर्ममूतज्ञान आदि तत्वों का समावेश किया गया है, जिनकी कि सत्ता प्राकृत तत्वमण्डल

हे : प्रतिपादन की शैली पर न्‍्याय-वैशेषिक प्रक्रिया का प्रभाव परितक्षित दोता है। नाथपुनि . का न्‍्यायतत आज उपलब्ध नहीं है। वेदान्तदेशिक ने प्रस्तुत अन्य में अनेक स्थलों पर

आधार यही ग्रन्थ था। नाथमुनि और वेदान्तदैशिक के बीच के काह्न में अनेक आचाय

अनिल “किट हनन 5ड की टन

...._१. यतीस्ट्मतदीपिकाकार भ्रीनिवासदास ने व्यास, बोधायन, गरुहदेव, भाराचि बह्यानन्दी, .

_... ग्रन्थ के झन्‍्त में उन अन्‍्धों के भी नाम उल्लिखित हैं, जिनसे कि इस ग्रन्थ के. या निर्माण सें सहायता ली गई है ( द्ृष्टब्य, ए० ३०१ )। विशिश्वद्वेत दशन में यतीन्द: ....... मंतदीपिका का वही स्थान है. जो कि शांकरवेदान्स में वेदान्त-परिमाषा ओर पशञ्चदशी ......_ का, पूर्वभीमाँसा में सानमेयोदय ओर अथ्संग्रह का, साटय में सांख्यवत्वकौमुदी का ..... ओर न्यायवैशेषिक में तकसंग्रह ओर कारिकावली का आप . २. आत्मसिद्धि के प्रारम्भ में थामुनसुनि ने इस अस्थ की रचना का ग्रयोजन इस प्रकार _

... कुमारित्न भट्ट की प्रप्माणमीमांसा को उसी रूप में स्वीकार करता है। सांख्य-

से ऊपर आगम सम्मत शुद्धाध्व में मानी गईं है। रामानुज ओर माध्व दशन के तत्वों के...

.. इसको उद्धृत किया है। इससे प्रतीत होता है कि न्‍्यायसिद्धा्जन की तत्वप्रक्रिया का मूल...

.. द्वविडाय, श्रीपराक्ुुश ( शठकोप )। नाथ( खुनि ), याम्ुनसुनि और यतीखश्र _ 3 .._( श्रीरामाजुजाचार्य ) के मत के अनुसार अपने ग्रन्थ की रचना की है (डव्य, ए० २)।

..... बताया है--“यद्यपि भगवता बादरायणेनेद्सर्थान्येव सूचाणि प्रणीतानि, वि बतानि च_

..... तानि परिमितगम्भीरभाषिणा द्रसिडमाष्यक्ृता, विस्तृतानिच तानि गस्भीरत्यायताह यू शहर श्रीवस्साइु-भाष्करादि-विरचितसितासितविविधनिबन्धनश्रद्धा विश्रद घल्लुद॒यो ..._ श्रीवत्साह् मिथ्र और उनके विवरण का ेदान्तवेशिक स्टडी में उल्लेख नहीं है।

गे सम क्योंकि उन्होंने रामांचुजाचार्य के वेदा्थसंग्रह <

... भाषिणा श्रीवत्साइमिश्रेणापि; तथापि आचायदड्ड-मतृम्पत्न भर्तृमित्र-मतृदरि-अह्मदतत- _यथावद्‌ अन्यथा प्रतिपच्चन्त इति युक्त: प्रकरणप्रक्म:” (आत्मसिद्धि, ४० १५-१७ )3:.....

हू ( क्रेश ) निश्चय ही इनसे भिन्न हैं। विवरणकार

[. है: |

हुए हैं। यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त है कि न्‍्यायतस्व की रचना में यद्यपि पाशरात आगम-संमत ठत्वप्रक्रिया को प्रधान स्थान दिया गया है; तथापि न्‍्याय-वेशेषिक, भाद्द एवं प्राभ/कर मीमांसा का भी उससें कम हाथ नहीं है। इसको आगे स्पष्ट किया जायरा

_ ब्रह्मयूत्र के तर्कपाद में सांख्य, योग, काणाद, बौद्ध और जैन दशन के साथ पाशुपत और पाश्चरात्र दशन का भी खण्डन किया गया है। यामुनसुनि ने आगमप्रामाण्य में पाश्रात्र के प्रामाण्य की स्थापना का प्रयत्न किया है। रामानुजाचाय ने श्रीमाष्य _ के पाश्वरात्राधिकरण की व्याख्या खण्डनपरक करके भण्डनपरक ही की है और शंकराचार्य. के द्वारा पाश्वरात्र आगम में उद्धावित दोषों का परिहार किया है। भारतीय दशन केक्षेत्र .. में नास्तिक थारा घीरे घीरे शुष्क होने लगी। आस्तिक धारा में भी स्वतन्त्र चिन्तन केस्याम 7... पर प्रस्थानत्रयी का प्रामाण्य स्वोपरि स्वीकार कर लिया गया इसके बाद के भारतीय दर्शन... का विकास प्रस्थानत्रयी के घेरे में ही हुआ भारतीय दर्शन के ज्षेत्र में समन्वय की प्रक्रिया का आरम्म हुआ | जिज्ञासु के ज्ञान के विकास के लिये उसकी बोद्धिक स्थिति के आधार पर दर्शनों की श्रेणियां बना दो गईं। उदयन जैसा प्रसिद्ध नेयायिक भी “अलमाद्रकवणिजों दघ्नचिन्तया” " (अद॒र्ख बेचनेवाला बनिया सामुद्रिक व्यापार की चिन्ता क्यों करे )) कहकर... : बेदान्ती के सामने नेग्रायिक को छोटा मानने लगा था। इस परिस्थिति में यह स्वाभाविक... ... हीथाकि वेद का गौण प्रामाण्य स्वीकार करने वाले आगम ग्रन्थों की स्थिति संदेह में ... .. पड़ जाय | इस क्षेत्र में भी समस्वय की प्रक्रिया काम करने लगी और स्वयं आगमानुयावियों..... ने ही वेद के बाद स्मृति के समान ही आगम के भी प्रामाण्य को स्वीकार कर लिया। ल्‍ बेदाविरो घी स्मृतिबचन ही प्रमाण माने गये हैं। उसी प्रकार आगम के भी वे अंश ग्राह्म नहीं रहे, जो वेदविरोधी थे आवश्यकता के अनुसार उनकी वेदानुकूल व्याख्या करती. गई आगम के अध्ययन में स््री-शूद्ध का भी समान अविकार था। ब्रह्मसूज के अपशुद्वाधि- करण की व्याख्या वैष्णव आचार्य प्रस्थानत्रयी के नियन्धण में ही कर सके जा 8 वेदान्तदेशिक के सामने दक्षिण भारत के सन्त आख़वार्रों तथा उनके अन॒ुयायियों .. की भक्तिभाव से पूरित तमित्न रचनाओं और पाश्रात्र संदहिताओं का विशाल साहित्य... एक ओर था तो बादरायण के ब्रह्मसूत्र के बौधायन एवं द्रमित्थाचाय प्रभ्टति के भक्तिपर . व्याख्यानों के परिवेत्र में उपस्थित संपूर्ण वैदिक वाडमय, जिनमें कि उपनिषदों का प्राधान्य. .. था, दूसरी ओर था। श्रीवैष्णव संप्रदाय में आह्ववारों के उपदेशों का भी वेदों के समान... .. ही आदर है। ये द्रमित्योपनिषद्‌ अथवा तमित्ववेद के नाम से प्रसिद्ध हैं। द्रमिकोपनिषद्‌ .. और वैदिक उपनिषदों में समन्वय स्थापित करने के कारण हई वेदान्ददेशिक की उमय रब : वेदान्ताचाय कहा गया है। के इक रा .. | वेदान्तरैशिक वेक्डटनाथ या वेक्लंगाचाय के नाम से भी परिचित हैं | गुरु-परम्परा के... झनुसार इनका जन्मकाल कल्लि संवत्‌ ४३७१, शक संवत्‌ ११६०, तदनुसार १२६८ 0

लत कि निकजब नितिन लत

दृष्व्य--आत्मतत्वविवेक, ए० २१३

| ह० |

. माना जाता है। माधवाचार्य (१३५० ई० ) ने सर्वदर्शनसंग्रह' में वेझ्टनाथ एवं... क्‍

मे उनके ग्रन्थ तत्वमुक्ताकल्लाप को उद्घृत किया है। वहाँ पर यह >ग्रन्थतत्वम्ुक्तावल्ली के

नाम से उद्धृत है। संस्कृत भाषा में, तमित्न भाषा और उसकी मणिप्रवाल शैज्ञी में वेदान्त- देशिक ने ११९ ग्रन्थ लिखे | इनको मुख्यतः तीन भागों में बांधा जा सकता है-

_ श्रीवेष्णव सम्प्रदाय, विशिष्टाइत दशन और काव्य-नाटक आदि | इनमें श्रीवैष्णव संप्रदाय

.. के धर्म और संस्कार सम्बस्धी छोटे छोटे ग्रन्थ, श्रीवैष्णव संप्रदाय को घार्मिक तथा दार्शनिक आधार प्रदान करने वाले सैद्धान्तिक अन्य, मौलिक दाशनिक ग्रन्थ तथा टीका अन्थ सभी . समाविष्ट हैं। काश्ीपुरी से वेदान्ददेशिक अन्थमाज्ला का प्रकाशन हुआ है। इसमें वेदान्त-

क्‍ मम .. देशिक के संस्कृत भाषा के प्रायः सभी ग्न्धों का उक्त तीन विभागों में प्रकाशन हुआ ..... है| प्रथम विभाग में दाशंनिक अन्थ और टीकाग्रन्य, दूसरे विभाग में श्रीवैष्णव सम्प्रदाय .. के अन्य तथा तीसरे विभाग में स्तोत्र, काव्य, नाटक, आदि का समावेश है क्‍

का वेदान्ददेशिक ने पाञ्वरात्ररक्षा में विरोधी वादों का निराकरण कर पाश्चरात्र का . प्रामाण्य तो स्थापित किया ही है, इस ग्रन्थ में पाश्वरात्र आगम, उसके प्रतिपाद्य विषय

.... ओर साहित्य का भी पूरा परिचय मिलता है। इनके निश्षेपरत्ञा सच्चरिष्र रक्षा, द्रमिक्ोप-

बा : निषत्सार, द्रमिकोपनिषत्ताययरत्नावज्ञी आदि ग्रन्थों में श्रीवैष्णव संप्रदाय, तमिह्वेद ओर उनके सिद्धान्तों का विशद निरूपण हुआ है। वेदान्तदेशिक ने रामानुजाचार्य के. के, सभी अन्यथों पर टीकाग्रन्थ लिखे हैं। इनसे आचार्य के वैदिक साहित्य के बहुमुखी शान का...

ही | हे 8 परिचय मित्रता है | शतदुषणी तत्वमृक्ताकन्नाप न्‍्यायपरिशुद्धि की न्‍्यायसिद्धांजन बदन: क्‍ " .. देशिक के मौलिक ग्रन्थ हैं। शतदूषणोी में शंकर, भास्कर और यादवप्रकाश के मतों के.

... खण्डन के ग्रसंग सें १०१ दोष उपस्थित किये थे। आजकल इनमें से केवल ६६ दूषण 2 उपलब्ध होते हैं। रूग्धरा छुन्द में निबद्ध ५०० इल्नोकों का ग्रन्थ तत्वभुक्ताकल्दाप जड़- ..... द्वव्यसर, जीवसर, नायकसर, बुद्धिसर और अ्रद्गव्यसर नाम के पाँच विभागों में डेटा .... है।इस पर स्वयं आचार्य ने सर्वारथसिद्धि नाम की व्याख्या की है। न्यायपरिशुद्धि में. ..... विशिष्टद्वैत संगत प्रमाणमीमांसा का प्रतिपादन किया गया है इस अन्य के प्रमेयाध्याय ... में ग्रन्थकार ने संक्षेप में प्रमेयमीमांसा भी की है प्रमेयमीमांसा का विस्तार से निरूपण .. .. करने के लिये ग्रन्थकार ने न्यायसिद्धां जन की रचना की? तत्वमुक्ताकत्लाप भी प्रमेयमीमांसा- .. प्रधान अन्थ है। इस अन्थ में कई ऐसे विषयों पर भी विचार किया गया है, जिनका 2 | कि न्यायसेद्धांजन में उल्लेख नहीं है। अभिनवगुप्त के तन्त्राह्रोक में बैसे उनके पूर्ववर्तों . ... अनेक शाज्ञों और आचायों का उल्लेख मित्रता है, उसी तरह वेदान्तदेशिक के इन

. २. द्ृष्व्य--सवदशनसंग्रह, पु०

अन्यों में विशिश्द्देत के आचायौं, उनके ग्रन्थों और मतों की एक ह्म्बी परम्परा सुरक्षित है, जो कि अन्यथा विस्मृति के गर्भ में विज्लीन हो गई होती |

. वश्व्य--सवंदशनसंग्रह, भावनदाश्रम, पूना संस्करण, प्ृ० ४१-४३ पे

है, बन्‍्ल्यायपरिशुदधबन्ते संग्रहेणप्रदर्शिम | || . आर . इनस्तहिस्तरेणात्र.. म्रमेयमभिदध्महे ( प्ृ० २) रा

. न्यायसिद्धाब्जन में परिच्छेद हैं--१ जडद्रव्य परिच्छेद, २--जीव परिच्छेद, ३--इश्वर परिच्छेद, ४--नित्यविभूति परिच्छेद, ५--बुद्धि परिच्छेद और ६--अद्व्य परिच्छेद तत्वप्क्ताकल्लाप में नित्यविभूति का निरूपण नायकसर में ही किया गया है। न्यायसिद्धांजन के इन परिच्छेदों का ग्रतिपाद्य विषय यहाँ संक्षेप में उपस्थित किया जा रहा है १--जड द्रव्य परिच्छेद है सम्पूण चेतन ( चित्‌ ) श्रोर अचेतन ( अचित्‌ ) विशेषणों से विशिष्ट ब्रह्म ही केवल... एक तत्व है। तत्व पुनः द्रव्य और अद्वव्य भेद से दो प्रकार का होता है। द्रव्य ६प्रकार का है, १--त्रिगुण अर्थात्‌ प्रकृति, २--काल, ३--जीव, ४-ईशवर, ५--नित्यविभूति और ६--धर्ममूतज्ञान | कतिपय विद्वान्‌ द्रव्य का तीन प्रकार से विभाजन करते है, यथा १--त्रिशुण, २--जीव और ३--ईइबर जो द्रव्य दुसरे से प्रकाशित होता है, वह जड है। .. प्रकृति और काल्न जड द्रव्य हैं, क्योंकि ये धमभूतजञान से प्रकाशित होते हैं। अजड द्रव्य. में जीव, ईइबर, नित्यविभूत्ि और घमंमूतशान का अच्तर्भाव छोता है, क्‍योंकिये चारों... स्वयंप्रकाश पदाथ हैं| के क्‍ . इस परिच्छेंद में प्रकृति आर काल्न का विस्तार से निरूपण करते हुए ग्रन्थार ने... ... बताया है कि बौद्ध दाशनिक द्रव्य, अद्वव्य आदि विभागों को स्वीकार नहीं करते।इसी .. प्रकार शांकगाचाय के मत में निर्विशेष ब्रह्म ही एक मात्र तत्व है, जगत्‌ भ्रान्तिस्वरूप ... है--इन दोनों ही मतों का खण्डन कर अ्न्थकार ने द्वव्यों की स्थिरता को स्थापित किया... है। इसी प्रसंग में प्रश्न युक्तियों के आधार पर क्षणमंगवाद और शुल्यवाद का निराकरण... ... किया गया है। रा] त्रिगुणात्मिका प्रकृति ही माया और अविद्या के नामसे अमिहित है। प्रक्तिही | . अवस्था भेद से २४ तत्वों के रूप में परिणत होती है। यहाँ प्रश्न उठता है किप्रकृति.. | तो निरबयव है, उसका परिणाम कैसे संभव है, यह कल्पना तो विवतबाद का स्मरण... . दिल्लाती है, किन्तु बात ऐसी नहीं है। जिस प्रकार निरबयव अंशु एवं विभुद्धव्यों मे... | . प्रदेश-विशेष में संयोग और शब्द इत्यादि की उत्पत्ति मानी जाती है, उसी प्रकार | . निखयव प्रकृति में भी प्रदेश-विशेष में विकार उत्पन्न हों सकते हैं। इसमें कोई विरोध... . नहीं है। वस्तुतः वेदान्ती प्रकृति को सावयव मानते हैं। सांख्य-संमत प्रकृति से इनकी. | प्रकृति का स्वभाव मिन्न है। इस सावयब प्रकृति से ही निखिल जगत्‌ की सृष्टि होगी॥।.. .. अतः इसके लिये परमाणु के उपादान की आवश्यकता नहीं है। जिसमें सत्त, रण और... | . तम ये तीनों गुण साम्यावस्था में हों, वही मूलप्रकृति है। गुणसाम्यावस्था के बने रहते |. ही मूल्प्रकृति को स्वह्प अन्तरात्वी अवस्थाएँ होती हैं। इनके नाम अव्यक्त, अक्षर . विभक्त तम और अविभक्त तम हैं मा, ... महत्‌ , अइज्लार, इन्द्रिय आदि का निरूपण करते हुए अन्यकार ने एतत्सम्बन्धी _ सांख्य और शैवागम-के मनन्‍्तव्यों की आलोचना को है। वरदविष्णु मिश्र, भट्टपराश्ष

(११२: |

है गया है कि इन्द्रियां भौतिफ है। वेशेषिक कमन्द्रियों की घत्ता स्वीकार नहीं करते

. विनाश होता रहता है। इन मतों का खण्डन करने के बाद सौगत, चार्वाक आदि के .. ह्वारा प्रस्तुत इन्द्रिय सम्बन्धी मतों की आलोचना को गई है

का खण्डन कर इनका विशिशक्वेत संगत स्वरूप स्पष्ट किया गया है। प्रसंगवश आकाश .... आराबरणामाव झुप है, इस बौद्ध मत की आल्लोचना की गई है वी के निरूपण के ... अवसर पर तम को पार्थिव द्रव्य माना गया है। यहाँ पर न्‍्याय-वैशेषिक तथा प्राभाकर ... मत की युक्तियों का खण्डन कर अ्न्थकार ने यह दिखलाया है कि तम का द्रव्यत्व आगम

... सेमी सिद द्वोता है।

.. खण्डन करके विशिष्टाद्रेत संमत काछ-स्वरूप का निरूपण करने के बाद ग्रन्थकार ने

0 . है। अन्त में पुनः ब्रह्मांड के निरूपण के प्रसंग में नेयायिक-संमत शरीर-छ्क्षण का रे ईश्वरशरीरता किस प्रकार निष्पन्न होती है श्स सम्बन्ध में कई भरता है उल्लेख है ... यह परिच्छेद समाप्त किया गया है क्‍

२--जीव परिच्छेद्‌

.... ग्रन्थकार ने बौद और शांकर अद्वेतवाद का निराकरण करके आत्मस्वरूप के विषय

नि.

.... / उप्स्थापित कि .... प्रतिपादन करने के प्रसंग में भास्कर के मेदामेदबाद की आल्लोचना की गई है

.. और अचिरादि गति का निरूपण किया _

इसी प्रकार आचार्य यादवप्रकाश मानते हैं कि कर्मेन्द्रियों का प्रत्येक शरीर में उत्तति और

पंच तन्‍्मात्रा और पंच महाथूत की सृष्टि के प्रसंग में सांख्य और वैशेषिक मत.

5 प्रकृति ओर प्राकृत तत्वों का निरूपण करने के बाद ग्रन्थकार ने शेवागम संगत . घटत्रिशत्तत्ववाद का खण्डन करते हुए शुद्ध तत्वों का ईइवर में तथा अन्य तत्तों का प्राकृत _ तत्वों में ही अन्तर्माव दिखाया है। शैवागम और वैशेषिक संमत काज्न स्वरूप का.

.. पुनः तत्वों की संख्या के सम्बन्ध में महाभारत का प्रमाण प्रस्तुत किया है। पंचीकरण 2 - पे प्रक्रिया और ब्रह्मांड का निरूपण करने के बाद दिकतत्व का निरुषण किया गया. ... है। विशिशद्वैत संगत पंचीकरण प्रक्रिया में नैयायिक घातिसंकर दोष की उद्धाबना ... करते हैं। इसके परिह्वर के प्रसंग में नेयायिक-संमत अवयविवाद का खण्डन किया गया.

...._ खंडन कर शरीर के मेदोपमेदों का वर्णन क्रिया गया है। व्यष्टि जीवों के शरीर में .

या प्रारम्भ में जीव का लक्षण दिया गया हैं। इसके बाद इसकी देह, इन्द्रिय, मन, रा या प्राण, ज्ञान आदि से भिन्नता सिद्ध की गई है। शानात्मवाद के खण्डन के प्रसंग में...

-... में याघुनमुनि के वचनों को उद्धृत किया है। आत्मा में स्थिरता, ज्ञातृत्व, कठृत्व, -.. स्वयंप्रकाशत्व, नित्यलल, नानात, और अणुत्व की सिद्धि के प्रसंग में श्रुति, स्वत और यों पर श्राभृत यामुनयुनि, वरदनारायण, विष्णुचित्त, वरदबिष्णु आदि के मन्तव्य किये गये हैं। जीव ईश्वर से मिन्न है तथा परस्पर भी भिन्न है, इसका...

.. मोक्षपप्राप्ति के उपाय चर्चा के प्रसंग में भक्ति और न्यासविद्या अर्थात्‌. .._ प्रपत्ति का निरूपण किया गया है। न्यासविद्या के महत्व को बतल्ाने के बाद उत्करानति ' गया है। मोक्ष के साथुब्य आदि भेदों के प्रसंग...

[३३६

में भगवर्वैंकर्य की परम पुरुषार्थता सिद्धकर मोक्षविषयक मतान्‍्तरों का निराकरण

किया गया है। याघुनसुनि ने कैवल्य मोक्ष का प्रतिवादन किया है। कुछ आचायों के झनुसार श्रीमाष्यकार रामानुज भी इससे सहमत हैं। ग्रन्थकार ने इस सम्बन्ध में

अपना विशिष्ट मत स्थापित किया है।.रररः

३--४श्वश परिष्छेद हल इजबर का लक्षण बताने के बाद प्रधान, ब्रह्मा, रुद्र आइददे ईंश्वरत्व का खण्डन . करके केवल नारायण को ही यहाँ पर बैश्वर माना गया है। भगवान्‌ सर्वत्र अपने पूर्ण रूप में विशनमान रहते हैं। इस प्रसंग में उपस्थित अनेक शंकाओं का समाधान

करने के बाद प्रन्थकार ने शांकर वेदान्त-समत निशुण ब्रह्मवाद और अध मे अधके

भ्रध्यासवाद का खण्डन किया है। शंकर, भास्तर और यादवप्रकाश के मत में ब्रह्म में जगत्‌ का उपादानत्व सिद्ध नहों हो सकता, साथ ही इनके मत में ब्रह्म और जगत्‌ू का सामानाधिकरण्य भी सम्भव नहीं है, इसका विस्तार से प्रतिपादन करने के बाद अन्यकार ने भेदामेदवाद का खंडन किया है ओर कहा है कि हमारे मत में ब्रह्म त्रिविध परिच्छेद (देश, काल एवं वस्त ) से रहित है। पातंजल योग, शैव और वैशेषिक दर्शन में ईश्वर को जगत्‌ के प्रति कंवल्ल निमितकारण माना जाता है. इसको अस्वीकार करते हुए ग्रन्थकार ने नेयापरिक समत ईश्वर थी अनुभेयवा का खण्डन किया है। इस प्रकार

. डुँर में जगत्‌ की अभिन्ननिमित्तोपादानकारणता स्थापित करने के बाद अन्त में भ्रीक्‍त्वत... .. का संक्षेप में निरूपण हुआ है। साथ ही पाश्वरात्र आउम में प्रतिपादित इइबर सम्बन्धी...

उल्लेखनीय विषयों का भो दिग्दशन कराया गया दे ४--नित्यविभूति परिच्छेद

हे इदवर की नित्यविभूति क्‍या है! इसमें क्‍या प्रमाण है! आदि दांकाओं को. 5 | . समाधान इस परिच्छेद में किया गया है। ईश्वर की नित्यविभूति के अनन्त भेद हैं।

..यह अचेतन होते हुए, भी स्वयंप्रकाश है। मुक्त जीव, नित्य सूरि और ईव्वर से कादाचित्क _

इच्छा और संकल्प इत्यादि की उसतत्ति किन्‍्हीं विशेष कारणों से ही दोती है| पाश्च- ]

नित्यविभूति के कारण ही अवस्थित होते हं। 0 0 ..... ५-“जुद्धि परिच्छेद

. अनुमित मानते हैं। विशिष्टाद्दती इस मत को स्वीकार नई करते | भटपराशर ने _ .. तखरत्नाकर में संवित्‌ को स्वयंप्रकाश माना है। झ्ञान में संकोच और विकास इनको. मान्य हैं। धारावाहिक ज्ञान के विषय में विशिष्टाह हैं,

रात्र आगम में प्रदर्शित यूहम, व्यूइ और विभव इत्यादि मेंद ईश्वर के शरीर में

विशिष्टाह्ेत दर्शन में बुद्धि अथवा शान घमगरतद्षान के नाम से अभिदित है। यह स्वयंप्रकाश है। भाइमीमासक शान गे प्राकल्य से अर्थात्‌ विषयप्रकाश से .

[ १४ -]

लट इसका प्रतिपादन करने के बाद ग्रन्थकार ने बुद्धि से संबद्ध बारह प्रश्नों को उपस्थापित

.. करके विस्तार से उनका समाधान किया है। सुखदुःखादि बुद्धि के ही विशेष प्रकार हैं . यह बतखाते हुए. ग्रन्थकार ने नेयायिकोँ के इस मत का खण्डन किया है कि ये आत्मा . .. क्ेगुण हैं। ईववबर का ज्ञान इच्छादि के रूप में किस प्रकार परिणत हो जाता है, यह . बतल्ञाने के बाद ग्रन्थकार ने सिद्ध किया है कि अदृष्ट ईश्वर के प्रति ओर कोप से भिन्न

.. कोई अल्वग वस्तु नहीं है| अन्त में बतत्ञाया गया है कि भरत के नाथ्यशासत्र एवं अल्ंकार-

. शान के ग्रन्थों में प्रतिपादित ख्यादि स्थायी भाव इत्यादि भी बुद्धि के परिणामविशेष ही हैं क्‍ से ६--अद्वव्य परिच्छेद क्‍ विगत पाँच परिच्छेदों में द्रव्य पदार्थ का प्रतिपादन किया गया है। अब इस

.._ अन्तिम परिच्छेद के प्रारम्भ में अ्रद्वव्य का बक्षण बतताते हुए उसके १० भेदों का. . परिगणन ऊिया गया है। वे हैं- सत्व, रज, ओर तम; पाँच शब्दादि विषय, संयोग ओर

शक्ति दस प्रकार के इन अद्रव्य पदार्थों का विस्तार से वणन करने के प्रसंग में प्न्थकार

[ .. मे शब्द के विषय में अनेक पक्षों की उपस्थापना की है। यहीं पर वण और मन्त्र का

. विचार भी किया गया है। इन सभी- पदार्थों का प्रतिपादन यहाँ पर विशिष्ठाद्नत की

... इृष्टि से हुआ है। नैयापिकों और वैशेषिकों की दृष्टि से यह नितान्त भिन्न है। इनकी पाकज ... प्रक्रिया न्‍्यांय-वैशेषिक प्रक्रिया से विज्ञक्षण है। शक्ति को नेयायिक और वैशेषिक प्रथक्‌ पदाथा

.... नहीं मानते | प्रबल युक्ति और शाजत्रवचनों के आधार पर यहाँ शक्ति की स्थापना की गई है। हा

.. साथ ही शैव और शाक्तदशन-संमत शक्ति के स्वरूप का खण्डन फिया गेया है। शक्ति के... ... विषय में विशिष्टाद्वेत के आचारयों में मतमेद है। ग्न्थकार ने इनका भी निरूवण किया... .... है। इस प्रकार १० अद्व्य पदार्थों का निरूपण करने के उपरान्त अन्यकार ने गुरुत्व,.... ..... द्रवत्व, स्नेह, वासना ( संस्कार ), संख्या, परिमाण, प्रथक्‍त्व, विभाग, परत्वापरत्व, कमे ... ओर सामान्य का पूव प्रतिपादित अद्वव्य पदार्थों में समावेश किया है क्‍

ग्रन्थ इसके आगे उपलब्ध नहीं होता अन्थकार ने अद्रव्य परिच्छेद के आरम्भ

.. में गुदत्वादि बिन पदार्थों का अभी उल्लेख हुआ है, उनके साथ साइश्य, विशेष, समवाय,

... अभाव और वैश्षिष्य्य का भी उल्लेख किया है। भ्रन्थकार को अवश्य ही इन विषयों

..._ का भी निरूपण अमीष्ट था, किन्तु इस अन्थ को वे पूरा कर सके। यद्यय्ि न्‍्याय-..... .. परिशुद्धि के अन्त में अन्यकार ने संक्षेप में प्रमेय-मीमांसा प्रस्तुत की है। वहाँ पर विशेष. ...._ और अभाव का संक्षिप्त विवेचन मित्रता है। इसी प्रकार तत्वपरुक्ताकल्लाप के अद्रव्यसर..... ... नाम के पाँचवें प्रकरण में वेशिष्थ को छोड़कर और सभी पदायों का संक्षित निरूषण ... हुआ है; तो भी ग्रन्थकार की प्रमेय-निरूपण शैज्ञी न्यायसिद्धाउजन में एक वर |

... से विकसित हुई है। उस शैली में इन विषयों का विवेचन हम देख सके, यह ने

..._ हमारा दुर्भाग्य है।

. वेदान्तदेशिक स्टडी!

संस्कृत विभाग के अध्यक्ष डा० आर, 3४०६ शिशिक नाम के अपने अन्य में वेदान्तदेशिक की जीवनी, साहित्य, पा दिष्टाह्टत को परम्परा ओर दशशन पर पर्यात प्रकाश डात्ना है। न्यायसिद्धाउ्नन में...

[२३ |

वेदान्तदेशिक ने प्रसंगवश नाथमुनि के न्‍्यायतत्व यामुनभुनि के आगमप्रामाण्य ओर हे हज

आत्मसिद्धि: राममिश्र द्वितीय के विवरण, वेदाथसंग्रहव्याख्यान, पंडथरसंद्षेत ( पडर्थरात्रह हर पराशर भट्ट के तत्वस्नाकर, अध्यात्मखण्डब्यव्याख्या; वरदविष्णु मिश्र के मान- याथात्यनिर्णय; विष्णुचित्त के प्रमेयसंग्रह, संगतिमाला; वरदनारायगभद्वारक के न्याय- सुदर्शन, प्रज्ञापरित्राणफ; वात्स्थवरद के तत्वसार, तत्वनि्णय को ओर नारायणाय॑ की नीति- माल्ना को उद्धृत किया है। इन सभी आचार्यों और अन्थों का तथा इनके साथ ही पुण्डरीकाज्ष, राममिश्र प्रथम, भ्रीवत्साक्मृमिश्र॒( कूरेश ), छुंदशनभद्दाकर ख्रादि बेदान्तदेशिक के पूर्ववर्ती विशिष्टाद्वैत के आचारयों का ऐतिदाासिक परिचय वेदान्त-

देशिक ए. स्टडी! में पु० ११४-१३६ में दिया गया है। उसको यहाँ हुराने की आवध्य- ल्‍ <